विदेश की खबरें | राजनीतिक विज्ञापनों को सीमित करेगा यूरोपीय संघ

इन प्रस्तावों का मकसद निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव या जनमत संग्रह सुनिश्चित करना है। इन प्रस्तावों में बड़ी संख्या में दर्शकों तक पहुंचने के लिए उपयोग की जाने वाली तकनीकों पर भी प्रतिबंध लगाने की बात की गयी है, अगर वे किसी नागरिक की अनुमति के बिना जातीय मूल, धार्मिक आस्था या यौन अभिरूचि जैसे संवेदनशील व्यक्तिगत जानकारी का उपयोग करते हैं।

यूरोपीय आयोग की उपाध्यक्ष वेरा योरोवा ने कहा, ‘‘लोगों को पता होना चाहिए कि वे कोई विज्ञापन क्यों देख रहे हैं, इस विज्ञापन के लिए किसने और कितना भुगतान किया... नयी प्रौद्योगिकियां मुक्ति के लिए औजार होनी चाहिए, हेराफेरी के लिए नहीं।"

यूरोपीय संघ की कार्यकारी शाखा, आयोग को उम्मीद है कि यूरोपीय संसद और 27 सदस्य देश 2023 तक राष्ट्रीय कानून में प्रस्तावों पर चर्चा कर उसका समर्थन करेंगे। इसका पालन नहीं करने पर राजनीतिक दलों, संगठनों और कंपनियों को जुर्माना भरना पड़ेगा।

योजना के अनुसार राजनीतिक विज्ञापनों को स्पष्ट करना होगा और प्रायोजक के नाम को प्रमुखता से प्रदर्शित करना होगा तथा यह बताना होगा कि विज्ञापन की लागत कितनी है और इसके लिए धन कहां से आया है।

डिजिटल विज्ञापन क्षेत्र की दो प्रमुख कंपनियों - फेसबुक और गूगल सहित विभिन्न कंपनियों को नियम का पालन करने में विफल रहने पर जुर्माना देना पड़ सकता है।

फेसबुक ने इस कदम का स्वागत किया है। कंपनी को राजनीतिक विज्ञापनों में पारदर्शिता की कमी को लेकर भारी आलोचना का सामना करना पड़ा है। कंपनी ने कहा कि वह लंबे समय से राजनीतिक विज्ञापनों पर यूरोपीय संघ के विनियमन का आह्वान करती रही है और उसे इस बात से खुशी है कि आयोग का प्रस्ताव कई कठिन प्रश्नों को संबोधित करता है। कंपनी ने हाल ही में अपना नाम बदलकर मेटा नाम रखा है।

गूगल ने इस विषय पर टिप्पणी के अनुरोध का कोई जवाब नहीं दिया वहीं 2019 में सभी राजनीतिक विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगाने वाले मंच ट्विटर ने कहा कि उसका मानना ​​​​है कि "राजनीतिक पहुंच प्राप्त की जानी चाहिए, खरीदी नहीं जानी चाहिए।" ट्विटर ने कहा कि उसने भी कई प्रकार के विज्ञापनों को प्रतिबंधित करते हुए उन्हें हटा दिया है।

(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)