नयी दिल्ली, 24 मई दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) स्वतंत्रता और विभाजन अध्ययन केंद्र स्थापित करेगा, जो देश के बंटवारे से जुड़ी 'हाई वोल्टेज राजनीति' और इस बारे में शोध करेगा कि तत्कालीन केंद्रीय नेतृत्व 'अलगाववाद के रोगाणुओं' को रोकने में किस तरह विफल रहा।
दस्तावेजों के अनुसार, यह "भारत के साथ फ्रंटियर प्रांत को रखने के विषय पर केंद्रीय नेतृत्व के जोर न देने के अलावा इस बारे में भी शोध करेगा कि किस तरह कांग्रेस कार्यसमिति ने (महात्मा) गांधी से परामर्श किए बिना विभाजन के लिए सहमति दी।"
शोध विषयों के लिए ये ‘प्राथमिकताएं’ स्वतंत्रता और विभाजन अध्ययन केंद्र की स्थापना के लिए मसौदा अवधारणा नोट का हिस्सा हैं।
आठ बिंदुओं वाले अवधारणा नोट में इस बात पर जोर दिया गया है कि कैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2021 में "भारत के विभाजन से जुड़ी भयावहता को फिर से याद करने और याद रखने" पर जोर दिया।
आठ-सदस्यीय समिति द्वारा तैयार किए गए अवधारणा नोट को दिल्ली विश्वविद्यालय के वैधानिक निकायों- अकादमिक परिषद और कार्यकारी परिषद के समक्ष रखा जाएगा।
आगामी 26 मई को होने वाली अकादमिक परिषद की बैठक के एजेंडे के अनुसार, सदस्य संबंधित विषय पर समिति की सिफारिशों पर विचार करेंगे।
समिति के प्रमुख एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के निदेशक प्रकाश सिंह ने कहा कि अवधारणा नोट में सुझाव दिये गये हैं, लेकिन शोधकर्ता अन्य विषयों की संभावना का भी पता लगा सकते हैं।
सिंह ने ‘पीटीआई-’ से कहा, ‘‘बहुत कुछ है जिसका अध्ययन करने की जरूरत है और दिल्ली विश्वविद्यालय ने एक मंच प्रदान करने की आवश्यकता महसूस की, जिसका उपयोग विभाजन के कारणों और प्रभाव का अध्ययन करने के लिए किया जा सकता है।’’
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