देश की खबरें | शीर्ष अदालत के फैसले को निष्प्रभावी करने के लिए जारी किए गए अध्यादेशों में दिल्ली अध्यादेश नवीनतम

नयी दिल्ली, 27 जुलाई केंद्र ने उच्चतम न्यायालय के फैसलों को निष्प्रभावी बनाने के लिए समय-समय पर अध्यादेश जारी किए हैं और दिल्ली सरकार से सेवाओं पर नियंत्रण वापस लेने से संबंधित अध्यादेश इस कड़ी में नवीनतम है।

केंद्र ने उच्चतम न्यायालय के एक फैसले के बाद दिल्ली एनसीटी सरकार (संशोधन) अध्यादेश जारी किया था। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने उस विधेयक को मंगलवार को मंजूरी दे दी जो दिल्ली में समूह-ए अधिकारियों के स्थानांतरण और पोस्टिंग के लिए एक प्राधिकरण के गठन के लिए घोषित अध्यादेश की जगह लेगा। गृह मंत्री अमित शाह अगले सोमवार को इस विधेयक को लोकसभा में पेश करेंगे।

जब संसद का सत्र नहीं चल रहा हो तो महत्वपूर्ण मुद्दों पर न्यायिक घोषणाओं को निष्प्रभावी बनाने के लिए सरकार को अध्यादेश जारी करने का अधिकार है। आजादी के बाद से विभिन्न सरकारों ने अध्यादेश जारी करने के अधिकार का प्रयोग किया है।

केंद्र ने 19 मई को दिल्ली में ‘समूह-ए’ अधिकारियों के तबादले और पदस्थापन के लिए एक प्राधिकरण बनाने के वास्ते ‘राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधन) अध्यादेश, 2023’ जारी किया था।

उससे एक सप्ताह पहले उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली में पुलिस, लोक व्यवस्था और भूमि को छोड़कर विभिन्न सेवाओं का नियंत्रण निर्वाचित सरकार को सौंपने का आदेश दिया था।

उससे पहले, केंद्र ने दो अध्यादेश जारी किए थे जो प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के निदेशकों के कार्यकाल को पांच साल तक बढ़ाने के प्रावधान से संबंधित थे।

ये अध्यादेश 2021 में सर्वोच्च अदालत के उस फैसले के बाद जारी किए गए कि सेवानिवृत्ति की आयु प्राप्त कर चुके अधिकारियों के कार्यकाल का विस्तार केवल विशेष मामलों में ही किया जाना चाहिए।

इसी प्रकार एक अन्य मामले में, केंद्र सरकार ने न्यायाधिकरण सुधार अध्यादेश, 2021 जारी किया जिसमें न्यायाधिकरण के सदस्यों के कार्यकाल, सेवानिवृत्ति की आयु और सेवा शर्तों को निर्धारित किया गया। अध्यादेश में न्यायाधिकरणों के अध्यक्षों और सदस्यों का कार्यकाल सर्वोच्च अदालत द्वारा निर्धारित पांच साल को कम कर चार साल कर दिया गया।

अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति कानून के तहत की गई गिरफ्तारी के खिलाफ कुछ सुरक्षा उपायों पर सर्वोच्च अदालत के आदेश को निष्प्रभावी करने के लिए वर्ष 2018 में एक अध्यादेश जारी किया गया था।

प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक, सरकार सर्वोच्च अदालत के फैसलों को दरकिनार करने के लिए अध्यादेश जारी करती रही है।

इस संबंध में पहला उदाहरण 1951 में चंपकम दोरैराजन मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले को निष्प्रभावी करने के लिए एक संशोधन विधेयक पारित किया गया था।

यह मामला 1950 में मद्रास में कॉलेज में दाखिला में आरक्षण प्रणाली से संबंधित था जो मद्रास प्रेसीडेंसी द्वारा 1927 में जारी "सांप्रदायिक सरकारी आदेश" (सीजीओ) पर आधारित था। इसके तहत सरकारी कॉलेजों में दाखिला और नौकरियों के लिए किसी व्यक्ति की जाति पर विचार किया जाता था।

उच्चतम न्यायालय ने तब कहा था कि सीजीओ के आधार पर प्रवेश नहीं दिया जा सकता है।

इस फैसले को निष्प्रभावी करने के लिए, नेहरू सरकार ने संविधान में पहला संशोधन किया और 18 जून, 1951 के प्रभाव नौवीं अनुसूची में अनुच्छेद 31ए और 31बी को शामिल किया ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कुछ कानून वैध माने जाएं, भले ही उनसे नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता हो।

एक अन्य घटनाक्रम में, इंदिरा गांधी बनाम राज नारायण मामले में आए फैसले को रद्द करने के लिए भी संविधान संशोधन किया गया था, जिसमें इंदिरा गांधी के चुनाव को रद्द करने के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी गई थी।

सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपील के लंबित रहने के दौरान, संसद ने 39वें संविधान संशोधन को मंजूरी दी और संविधान में अनुच्छेद 392ए को जोड़ा गया। इसमें कहा गया कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और लोकसभा अध्यक्ष के चुनावों को देश की किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती तथा इसे केवल संसदीय समिति के समक्ष ही चुनौती दी जा सकती है।

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