नयी दिल्ली, 19 सितंबर दिल्ली उच्च न्यायालय ने देशभर में बम विस्फोटों की साजिश रचने के आरोप में गैर-कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत दर्ज एक मामले में एक आरोपी को जमानत देने से इनकार करते हुए कहा कि इसकी "उचित संभावना" है कि वह उन लोगों के नेटवर्क में "एक कड़ी" के रूप में शामिल था, जो विस्फोट और जानमाल के नुकसान की योजना के बारे में जानते थे।
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल और न्यायमूर्ति अनीश दयाल की खंडपीठ ने मोहम्मद आमिर जावेद की जमानत याचिका खारिज कर दी। जावेद को सितंबर 2021 में राष्ट्रीय राजधानी में गिरफ्तार किया गया था।
जावेद ने दलील दी कि वह लगभग 20 महीने से हिरासत में है और वह केवल एक मध्यस्थ था तथा उसे इस तथ्य के बारे में कोई जानकारी नहीं थी कि हथियार एवं विस्फोटक उसे सुरक्षित रखने के लिए दिए गए थे।
उसने निचली अदालत के 18 मई के उस आदेश को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया था, जिसमें उसे जमानत देने से इनकार कर दिया गया था।
खंडपीठ ने रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों का संज्ञान लेते हुए कहा कि यह निष्कर्ष निकालना मुश्किल है कि आरोपी इस स्तर पर नियमित जमानत पर रिहा होने का हकदार है।
अदालत ने 18 सितंबर के एक आदेश में कहा, ‘‘मौजूदा मामले में यह स्पष्ट है कि भारत में बम विस्फोटों को अंजाम देने के लिए आतंकी मॉड्यूल के वास्ते काम करने वाले विभिन्न व्यक्तियों की बड़े पैमाने पर साजिश थी तथा अपीलकर्ता हथियारों और विस्फोटकों की बरामदगी का एक अभिन्न अंग था। प्रथम दृष्टया, यह नहीं कहा जा सकता कि इस स्तर पर आरोपी/अपीलकर्ता को जमानत पर रिहा कर दिया जाए।’’
आदेश में कहा गया है कि प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट नहीं है कि अपीलकर्ता केवल एक मध्यस्थ था और यह मानने का उचित आधार है कि उसके खिलाफ आरोप सही हैं।
मौजूदा मामले में, एक आतंकी मॉड्यूल द्वारा सिलसिलेवार विस्फोटों की योजना बनाने की गोपनीय सूचना के बाद प्राथमिकी दर्ज की गई थी।
अपीलकर्ता और कई अन्य के खिलाफ पिछले साल भारतीय दंड संहिता, यूएपीए के साथ-साथ शस्त्र अधिनियम और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत आरोपपत्र दायर किया गया था।
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