नयी दिल्ली, सात दिसंबर दिल्ली उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को नाबालिगों और वयस्कों से संबंधित यौन उत्पीड़न के मामलों की संख्या और सुनवाई की स्थिति के बारे में बताने का निर्देश दिया है।
न्यायमूर्ति राजीव शकधर और न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया की पीठ ने अधिकारियों से वन स्टॉप सेंटर (ओएससी) का स्थान, प्रत्येक ओएससी में प्रदान की जाने वाली सुविधाएं और तैनात श्रमबल तथा वहां तैनात कर्मियों द्वारा किए जाने वाले कार्य के बारे में बताने के लिए भी कहा।
ओएससी का गठन परिवार, समुदाय और कार्यस्थल पर हिंसा से प्रभावित महिलाओं को सहायता प्रदान करने के लिए किया गया है।
उच्च न्यायालय ने दिल्ली सरकार से एक नया हलफनामा दाखिल कर यौन उत्पीड़न पर प्राप्त शिकायतों की संख्या पर वास्तविक स्थिति बताने को कहा, जिन्हें भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत प्राथमिकी में बदल दिया गया।
अदालत ने कहा है कि डेटा में उन मामलों की संख्या भी शामिल होनी चाहिए जिनमें आरोपपत्र दाखिल किए गए हैं, जिनकी सुनवाई चल रही है और जो मौखिक बहस के चरण में हैं।
अदालत एक योजना से संबंधित ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ और ‘दिल्ली सिटीजन फोरम फॉर सिविल राइट्स’ की दो अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिसके तहत यौन उत्पीड़न के नाबालिग पीड़ितों को मुआवजा दिया जाना है।
अदालत ने फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएल) द्वारा दाखिल पिछले हलफनामे पर भी गौर किया, जिसमें 112 तकनीकी पदों के सृजन के प्रस्ताव का संदर्भ दिया गया था। अदालत ने मामले को 14 दिसंबर को आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।
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