देश की खबरें | कैदियों के रिश्तेदारों, वकीलों के जेल दौरों की संख्या सीमित करने का निर्णय मनमाना नहीं : अदालत

नयी दिल्ली, 20 फरवरी दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि कैदियों के परिवारों, दोस्तों और कानूनी सलाहकारों द्वारा मुलाकात की संख्या को सप्ताह में दो बार सीमित करने का प्राधिकारियों का फैसला कैदियों की संख्या को ध्यान में रखते हुए लिया गया है और इसे ‘‘पूरी तरह से मनमाना’’ नहीं कहा जा सकता।

उच्च न्यायालय ने कहा कि यह निर्णय जेलों में उपलब्ध सुविधाओं, कर्मचारियों की उपलब्धता और विचाराधीन कैदियों की संख्या पर सावधानीपूर्वक विचार करने के बाद लिया गया है।

मुख्य न्यायाधीश सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने कहा, ‘‘नीतिगत मामलों में, अदालतें सरकार के निष्कर्ष को अपने निष्कर्ष से प्रतिस्थापित नहीं करतीं। इसलिए, यह अदालत परमादेश जारी करने वाला कोई आदेश पारित करने की इच्छुक नहीं है।’’

यह फैसला दिल्ली जेल नियम, 2018 के कुछ प्रावधानों को चुनौती देने वाली एक याचिका का निस्तारण करते हुए आया।

वकील जय अनंत देहाद्राई की ओर से दायर याचिका में अनुरोध किया गया था कि कानूनी सलाहकारों के साथ मुलाकात की सोमवार से शुक्रवार तक एक उचित समय के लिए अनुमति देने के वास्ते नियमों में संशोधन किया जाए और प्रति सप्ताह मुलाकात संबंधी कोई सीमा नहीं होनी चाहिए।

याचिकाकर्ता ने कानूनी सलाहकारों को दिल्ली की जेलों में अपने मुवक्किलों से सप्ताह में दो से अधिक बार मुलाकात की अनुमति के लिए अनुरोध किया।

उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि वर्तमान जनहित याचिका एक विरोधात्मक वाद नहीं है और याचिका कैदियों के हित में दायर की गई है, वह याचिकाकर्ता को राज्य को सुझाव देते हुए एक प्रतिनिवेदन देने की अनुमति देता है।

इसने कहा कि राज्य सुझावों पर सही भावना से विचार करेगा।

पीठ ने कहा, ‘‘विचाराधीन कैदियों और कैदियों की संख्या के आधार पर, राज्य ने परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों, दोस्तों और कानूनी सलाहकारों की मुलाकात की कुल संख्या को सप्ताह में दो बार सीमित करने का निर्णय लिया है और यह नहीं कहा जा सकता है कि उक्त निर्णय पूरी तरह से मनमाना है। उक्त निर्णय जेलों में उपलब्ध सुविधाओं, कर्मचारियों की उपलब्धता और विचाराधीन कैदियों की संख्या पर सावधानीपूर्वक विचार करने के बाद लिया गया है।’’

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