नयी दिल्ली, पांच मार्च दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई करते हुए टिप्पणी की कि वन्यजीव और पर्यावरण संरक्षण के लिए कानून के तहत निर्धारित न्यूनतम सजा से कम सजा देने से इसका उद्देश्य विफल हो जाएगा और भविष्य के मामलों के लिए एक खतरनाक मिसाल कायम होगी।
अदालत ने इसी के साथ तिब्बती मृग (चिरू) से प्राप्त शाहतूश शॉल का व्यापार करने के दोषी व्यक्तियों को दी गई दो दिन की प्रभावी सजा को अस्वीकार कर दिया।
न्यायमूर्ति चंद्र धारी सिंह ने सजा के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की याचिका पर विचार करते हुए कहा कि जब वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम में न्यूनतम तीन साल कारावास की सजा निर्धारित की गई है, तो निचली अदालत को जुर्माने के साथ ‘‘पहले से जेल में बिताई गई अवधि’’ की कम सजा देने का विवेकाधिकार नहीं है।
अदालत ने कहा कि अपराध की गंभीरता को केवल इस आधार पर कम नहीं किया जा सकता कि आरोपी पशुओं की हत्या में सीधे तौर पर शामिल नहीं थे, क्योंकि पाबंदी ऐसे वन्यजीवों को रखने, व्यापार और उसे सुविधाजनक बनाने तक भी लागू है।
अदालत ने मंगलवार को दिए अपने फैसले में कहा, ‘‘यह कानून पारिस्थितिकी संतुलन और जैव विविधता के लिए गंभीर खतरा पैदा करने वाले वन्यजीव संबंधी अपराधों पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से बनाया गया था। परिवीक्षा राहत से निषेध सहित कड़े प्रावधान, लुप्तप्राय प्रजातियों के अवैध व्यापार और शोषण को रोकने के लिए विधायी दृढ़ संकल्प को दर्शाते हैं। निर्धारित न्यूनतम से कम सजा देने से अधिनियम का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाएगा और भविष्य के मामलों के लिए एक खतरनाक मिसाल कायम होगी, जिससे विधायिका द्वारा परिकल्पित प्रवर्तन तंत्र कमजोर हो जाएगा।’’
अदालत ने फैसले में कहा, ‘‘वर्तमान मामले में, आरोपी व्यक्तियों को तिब्बती मृग से प्राप्त शाहतूश शॉल का व्यापार करने का दोषी पाया गया है, जो अधिनियम की अनुसूची- प्रथम के अंतर्गत सूचीबद्ध एक प्रजाति है। इस अदालत का मानना है कि विद्वान विशेष न्यायाधीश इस तथ्य को ध्यान में रखने में विफल रहे हैं कि सभी आरोपी व्यक्तियों को संबंधित अदालत द्वारा जमानत दी गई थी और किसी भी आरोपी व्यक्ति ने दो दिनों से अधिक कारावास में नहीं बिताया था। इसलिए, जेल में पहले से ही बिताई गई अवधि के बराबर सजा देना कानून की दृष्टि से गलत है।’’
उच्चतम न्यायालय ने फैसले को रद्द करते हुए सजा पर तीन महीने के भीतर नया आदेश पारित करने के लिए मामले को विशेष अदालत को वापस भेज दिया।
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