देश की खबरें | न्यायालय ने ‘कॉर्बेट बाघ अभयारण्य’ में पारिस्थितिकीय क्षति की जांच के लिए समिति बनाने का आदेश दिया

नयी दिल्ली, सात मार्च उच्चतम न्यायालय ने ‘कॉर्बेट बाघ अभयारण्य’ के भीतर अवैध निर्माण एवं पेड़ों की कटाई के कारण हुए नुकसान के समाधान के उपाय सुझाने के लिए एक समिति गठित करने का आदेश दिया है।

शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि किसी जंगल में बाघ की मौजूदगी पारिस्थितिकी तंत्र की भलाई का संकेतक है।

न्यायालय ने कहा कि वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा गठित की जाने वाली समिति अभयारण्य को हुए पर्यावरणीय नुकसान का आकलन करेगी और उसे फिर से दुरुस्त करने पर आने वाली लागत भी निर्धारित करेगी।

न्यायमूर्ति बी. आर. गवई, न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि समिति इस सवाल पर विचार करेगी कि क्या ‘बफर या फ्रिंज’ क्षेत्र में बाघ सफारी की अनुमति दी जा सकती है।

पीठ ने कहा कि यदि ऐसी सफारी की अनुमति दी जा सकती है, तो इसके लिए दिशानिर्देश क्या होने चाहिए?

इसमें कहा गया है कि समिति अभयारण्य को उस स्थिति में लाने के उपायों की सिफारिश करेगी जैसा यह नुकसान से पहले था।

पीठ ने कहा, ‘‘इस तरह के नुकसान के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों/अधिकारियों की पहचान करें। यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि सरकार इसके लिए जिम्मेदार पाए गए व्यक्तियों/अपराधी अधिकारियों से निर्धारित लागत वसूलेगी। इस प्रकार वसूल की गई राशि का इस्तेमाल विशेष रूप से पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई के उद्देश्य से किया जाएगा।’’

शीर्ष अदालत ने कहा कि समिति में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण, भारतीय वन्यजीव संस्थान, केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति के एक-एक प्रतिनिधि होंगे, जबकि पर्यावरण मंत्रालय का एक अधिकारी सदस्य सचिव के रूप में शामिल होंगे। यह अधिकारी संयुक्त सचिव स्तर से नीचे का नहीं होगा।

पारिस्थितिकी तंत्र में बाघों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए शीर्ष अदालत ने महाकाव्य 'महाभारत' का हवाला देते हुए कहा, ''जंगल के बिना बाघ नष्ट हो जाता है और बाघों के बिना जंगल नष्ट हो जाता है। इसलिए, बाघ को जंगल की रक्षा करनी चाहिए और जंगल को भी अपने सभी बाघों की रक्षा करनी चाहिए।"

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