नयी दिल्ली, 26 अगस्त उच्चतम न्यायालय ने कोविड- 19 के बीच लागू लॉकडाउन के दौरान कर्ज की स्थगित की गई किस्तों पर ब्याज लिये जाने के मुद्दे पर बुधवार को कहा कि केन्द्र इस मामले में रिजर्व बैंक की ओट ले रहा है। न्यायालय ने केंद्र से इस मुद्दे पर एक सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है।
शीर्ष अदालत ने किस्तों के भुगतान में आ रही समस्याओं का जिक्र करते हुये कहा, ‘‘यह इसलिये हुआ क्योंकि आपने पूरे देश में लॉकडाउन लागू किया।’’
न्यायालय ने इससे पहले केन्द्र सरकार और रिजर्व बैंक को इस बारे में गौर करने को कहा था। कोविड- 19 महामारी के बीच मार्च से लगाये गये लॉकडाउन के दौरान कर्जदारों को उनकी मासिक किस्तों के भुगतान से छूट दी गई। इस अवधि के दौरान कर्ज पर ब्याज लिये जाने का मुद्दा अदालत में पहुंचा है।
न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ ने वीडियो कन्फ्रेंसिंग के जरिये हुई सुनवाई में कहा, ‘‘केन्द्र ने अभी तक अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं की है। केन्द्र के पास आपदा प्रबंधन कानून के तहत व्यापक शक्तियां हैं। आपको केन्द्र की स्थिति स्पष्ट करनी होगी।’’
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न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी और न्यायमूर्ति एमआर शाह भी इस पीठ में शामिल हैं। पीड ने कहा, ‘‘केन्द्र सरकार रिजर्व बैंक की आड़ ले रही है।’’
सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मामले में जवाब देने के लिये एक सप्ताह का समय मांगते हुये कहा, ‘‘माननीय न्यायमूर्तियों को ऐसा नहीं कहना चाहिये। हम रिजर्व बैंक के केसाथ समन्वय बिठा कर काम कर रहे हैं।’’
पीठ ने कहा, ‘‘आपको दो बातों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी है -- आपदा प्रबंधन कानून के तहत केन्द्र की भूमिका यह है और क्या ‘‘ब्याज के ऊपर ब्याज’’ लिया जायेगा।’’
मेहता ने जिरह में कहा कि सभी समस्याओं का एक साझा समाधान नहीं हो सकता है।
मामले में हस्तक्षेप करने वाले एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश होते हुये वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि रिण भुगतान का स्थगत 31 अगस्त को समाप्त हो रहा है और इस अवधि को बढ़ाया जाना चाहिये। ‘‘मेरा कहना केवल यह है कि जब तक इन याचिकाओं पर फैसला होता है स्थगत को समाप्त नहीं किया जाना चाहिये।’’
शीर्ष अदालत ने मामले की अगली सुनवाई को एक सितंबर को रखी है।
उच्चतम न्यायालय ने इससे पहले कहा था कि जिस अवधि में किस्तों के भुगतान को स्थगत रखा गया है उसके लिये ब्याज के ऊपर ब्याज लेने की कोई तुक नहीं बनती है।
आगरा के निवासी गजेन्द्र शर्मा ने इस संबंध में याचिका दायर की है। याचिकाकर्ता ने रोक की अवधि के दौरान रिण पर ब्याज लेने संबंधी रिजर्व बैंक की 27 मार्च की अधिसूचना को उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर बताने का निर्देश देने का आग्रह किया है। इससे कर्जदार के नाते याचिकाकर्ता पर बोझ बढ़ता है और अनुच्छेद 21 के तहत उसे प्राप्त जीवन जीने के अधिकार में अवरोध पैदा होता है।
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