देश की खबरें | न्यायालय ने पूछा, क्या जकात फाउंडेशन सुदर्शन टीवी मामले में हस्तक्षेप करना चाहता है
एनडीआरएफ/प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: ANI)

नयी दिल्ली, 18 सितंबर उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को गैर सरकारी संगठन ‘जकात फाउंडेशन’ से पूछा कि क्या वह सुदर्शन टीवी मामले में हस्तक्षेप करना चाहता है, क्योंकि इसमें उसकी भारतीय शाखा पर विदेश से आतंकवाद से जुड़े संगठनों से वित्तीय मदद मिलने का आरोप लगाया गया है।

बता दें कि जकात फाउंडेशन प्रशासनिक सेवा में शामिल होने के इच्छुक मुस्लिम उम्मीदवारों को प्रशिक्षण मुहैया कराता है।

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न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड, न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा और न्यायमूर्ति केएम जोसेफ की पीठ के समक्ष जकात फाउंडेशन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगडे ने कहा कि सुदर्शन टीवी द्वारा दाखिल हलफनामे में उनके मुवक्किल पर विदेश से चंदा लेने का आरोप लगाया गया है।

हेगड़े ने कहा कि उनका मुवक्किल एक धर्मार्थ संगठन है जो गैर मुस्लिमों की भी मदद कर रहा है और इस तरह की समाज सेवा सरकारी स्तर पर भी नहीं जानी जाती।

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पीठ ने हेगड़े से कहा कि टीवी चैनल की ओर से विदेश से मिले चंदे के संबंध में विदेशी चंदा नियमन कानून (एफसीआरए) के दस्तावेज जमा किए गए है और यह उसके मुवक्किल पर निर्भर है कि वह मामले में हस्तक्षेप करना चाहता है या नहीं।

हेगड़े ने कहा कि जकात फांडेशन कोई आवसीय कार्यक्रम संचालित नहीं करता है और केवल आईएसएस कोचिंग के लिए शुल्क का भुगतान करता है।

गौरतलब है कि शीर्ष अदालत सुदर्शन चैनल के कार्यक्रम ‘बिंदास बोल’ के खिलाफ शिकायत पर सुनवाई कर रही है। कार्यक्रम के प्रोमो में दावा किया गया है कि वह ‘प्रशासनिक सेवा में मुस्लिमों की घुसपैठ की साजिश’ का बड़ा खुलासा करेगा।

वहीं, प्रधान संपादक के जरिये दाखिल हलफनामे में सुदर्शन टीवी ने कहा, ‘‘ जवाब देने वाले प्रतिवादी (सुरेश चव्हाणके) ने ‘यूपीएससी जिहाद’ शब्द का इस्तेमाल किया है क्योंकि विभिन्न स्रोतों से जानकारी मिली कि जकात फांउडेशन को आतंकवाद से संबंध रखने वाले विभिन्न संगठनों से धन मिला।’’

चैनल ने अपने जवाब में कहा, ‘‘ऐसा नहीं है कि जकात फांउडेशन को मिले सभी चंदों का संबंध आतंकवाद से है। हालांकि, कुछ चंदा ऐसे संगठनों से मिला है या ऐसे संगठनों से प्राप्त हुआ है जो चरमपंथी समूहों का वित्तपोषण करते हैं। जकात फाउंडेशन को मिले धन का इस्तेमाल आईएएस, आईपीएस या यूपीएससी आकांक्षियों की मदद के लिए किया जाता है।’’

चैनल ने अपने हलफनामे में आगे कहा कि विभिन्न स्रोतों से प्रकाश में आया कि बदनाम संगठनों द्वारा मिले चंदे का इस्तेमाल यूपीएससी में शामिल होने के इच्छुक लोगों की मदद में किया जा रहा है, यह गंभीर मामला है और इसपर सार्वजनिक बहस, चर्चा और समीक्षा किए जाने की जरूरत है।

अपने 91 पन्नों के हलफनामे में चव्हाणके ने कहा, ‘‘ अबतक प्रसारित चार एपिसेाड में कहीं कोई बयान या संदेश नहीं था कि एक समुदाय विशेष के लोगों को यूपीएससी में शामिल नहीं होना चाहिए। यूपीएससी खुली प्रतियोगी परीक्षा है और प्रत्येक समुदाय प्रवेश परीक्षा में शामिल हो सकता है और इसे उत्तीर्ण कर सकता है।’’

कार्यक्रम पर प्रतिबंध लगाने का अनुरोध करने वाले वकील फिरोज इकबाल खान की याचिका पर जवाब देते हुए चैनल ने कहा कि इस एपिसोड का जोर था कि यह साजिश दिख रही है और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) या राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) द्वारा जांच किए जाने की जरूरत है क्योंकि आतंकवाद से जुड़े संगठन भारत में मौजूद फांउडेशन का वित्तपोषण कर रहे हैं जिसका इस्तेमाल यूपीएससी के इच्छुक मुस्लिम उम्मीदवारों के समर्थन में किया जा रहा है।

इससे पहले, दिन में सुदर्शन चैनल ने एक याचिका दायर कर उच्चतम न्यायालय में होने वाली मामले की सुनवाई का सजीव प्रसारण करने का अनुरोध किया था।

उल्लेखनीय है कि 15 सितंबर को उच्चतम न्यायालय ने अगले आदेश तक चैनल द्वारा ‘बिंदास बोल’ के एपिसोड का प्रसारण करने पर रोक लगा दी थी। न्यायालय ने कहा कि प्रथमदृष्टया लगता है कि कार्यक्रम के प्रसारण का उद्देश्य मुस्लिम समुदाय को ‘बदनाम’ करना है।

सुदर्शन न्यूज चैनल द्वारा निदेशक एवं संपादक सुरेश चव्हाणके के जरिये दाखिल आवेदन में कहा ‘‘यह सम्मानपूर्वक बताया गया कि वर्तमान मामला जनता के विषय में सबसे महत्वपूर्ण मामलों में से एक है, क्योंकि भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) द्वारा संरक्षित प्रेस की स्वतंत्रता का प्रश्न इसमें शामिल है।’’

आवेदन में कहा गया कि चैनल के करोड़ों दर्शक कानूनी प्रक्रिया के बारे में जानना चाहते हैं और पक्षकारों द्वारा दिए गए तर्कों और बहस के बिंदुओं को सुनना चाहते हैं।

चैनल ने कहा, ‘‘ अत: आधिकारिक एजेंसी द्वारा जिसे अदालत इसके लिए उपयुक्त मानती है,सुनवाई का सजीव प्रसारण ऑडियो-वीडियो माध्यम से कराने का निर्देश दे।’’

उल्लेखनीय है कि खबर लिखे जाने तक मामले की सुनवाई जारी थी।

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