देश की खबरें | दिल्ली पुलिस के प्रतिनिधित्व के सवाल पर टकराव जारी

नयी दिल्ली, एक जुलाई दिल्ली हिंसा से संबंधित मामले में पुलिस का कौन प्रतिनिधित्व करेगा- इस असामान्य विवाद से बुधवार को उच्च न्यायालय नाराज हो गया और उसने केंद्र सरकार के वकील से यह प्रदर्शित करने को कहा कि इस मामले में जांच एजेंसी का प्रतिनिधित्व करने के लिए उसे उपराज्यपाल ने नियुक्त किया है।

उच्च न्यायालय दिल्ली पुलिस की उस अर्जी पर सुनवाई कर रहा था जिसमें फरवरी में संशेाधित नागरिकता कानून के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई सांप्रदायिक हिंसा से जुड़े एक मामले में एक निजी विद्यालय के मालिक को निचली अदालत से मिली जमानत को चुनौती दी गयी थी।

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उच्च न्यायालय ने इससे पहले आरोपी निजी विद्यालय के मालिक फैसल फारूक को निचली अदालत से मिली जमानत पर स्थगन लगा दिया था।

(प्रतिनिधित्व का) यह मुद्दा तब उठा जब अतिरिक्त सॉलीसीटर जनरल अमन लेखी और केंद्र सरकार के स्थायी वकील अमित महाजन ने कहा कि उन्हे इस मामले में दिल्ली पुलिस का प्रतिनिधित्व करने के लिए अधिकृत किया गया है जबकि दिल्ली सरकार के स्थायी वकील (आपराधिक) राहुल मेहरा का कहना था कि केंद्र सरकार को निचली अदालत के 20 जून के आदेश के विरूद्ध याचिका दायर करने का अधिकार नहीं है और राज्य का प्रतिनिधित्व उनके द्वारा किया जाना है।

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यह विवाद इस मामले और ऐसे अन्य मामलों में पहले भी उठ चुका है जब 22 जून को सॉलीसीटर जनरल तुषार मेहता ने चिढ़कर अपना नाम वापस ले लिया था।

न्यायमूर्ति सुरेश कैत ने बुधवार को वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से हो रही सुनवाई स्थगित करते हुए महाजन को यह स्थापित करने के लिए दिन में इस बात का उपयुक्त दस्तावेज सौंपने को कहा कि उपराज्यपाल अनिल बैजल ने उन्हें यह याचिका दायर करने के लिए नियुक्त किया है।

न्यायमूर्ति कैत ने कहा, ‘‘ यह स्पष्ट किया जाता है कि जिस वकील ने यह याचिका दायर की है, यदि वह उपराज्यपाल से अनुमोदन पत्र नहीं ला पाता है तो (स्थगन का) अंतरिम आदेश हटा लिया जाएगा।’’

उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि अदालत को सौंपे जाने वाले दस्तावेजो की प्रति मेहरा को भी दी जाए।

इस मामले पर भोजनावकाश से पहले और बाद में सुनवाई हुई।

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