नयी दिल्ली, 20 मई आम आदमी पार्टी (आप) ने शनिवार को दिल्ली में नौकरशाहों के तबादले पर केंद्र के अध्यादेश को ‘असंवैधानिक’ और देश के लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर सरासर हमला करार दिया।
दिल्ली की मंत्री आतिशी ने संवाददाता सम्मेलन में कहा कि केंद्र सरकार ने यह अध्यादेश लाने के लिए जानबूझकर ऐसा समय चुना, जब उच्चतम न्यायालय अवकाश के कारण बंद हो गया है।
केंद्र सरकार ने ‘दानिक्स’ (दिल्ली, अंडमान- निकोबार, लक्षद्वीप, दमन और दीव, दादरा और नगर हवेली (सिविल) सेवा) काडर के ‘ग्रुप-ए’ अधिकारियों के तबादले और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही के लिए ‘राष्ट्रीय राजधानी लोक सेवा प्राधिकरण’ गठित करने के उद्देश्य से शुक्रवार को एक अध्यादेश जारी किया था।
दिल्ली के मुख्यमंत्री प्राधिकरण के अध्यक्ष होंगे। साथ ही, इसमें मुख्य सचिव और प्रधान सचिव (गृह) सदस्य होंगे। अध्यादेश कहा गया है, ‘‘वर्तमान में प्रभावी किसी भी कानून के बावजूद राष्ट्रीय राजधानी लोक सेवा प्राधिकरण ‘ग्रुप-ए’ के अधिकारियों और दिल्ली सरकार से जुड़े मामलों में सेवा दे रहे ‘दानिक्स’ अधिकारियों के तबादले और पदस्थापन की सिफारिश कर सकेगा...लेकिन वह अन्य मामलों में सेवा दे रहे अधिकारियों के साथ ऐसा नहीं कर सकेगा।’’
गौरतलब है कि अध्यादेश जारी किए जाने से महज एक सप्ताह पहले ही उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय राजधानी में पुलिस, कानून-व्यवस्था और भूमि को छोड़कर अन्य सभी सेवाओं का नियंत्रण दिल्ली सरकार को सौंप दिया था।
आतिशी ने कहा कि केंद्र सरकार का यह अध्यादेश दर्शाता है कि ‘‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को (दिल्ली के) मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल’’ और ईमानदार राजनीति की ताकत से ‘‘डर लगता है।’’
आतिशी ने कहा, ‘‘केंद्र ने इस अध्यादेश को लाने के लिए जानबूझकर कल (शुक्रवार) रात का समय चुना। उच्चतम न्यायालय छह सप्ताह के अवकाश के कारण बंद हो गया है और यह काम को बाधित करने की जानबूझकर की गई कोशिश है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘उच्चतम न्यायालय द्वारा दिल्ली सरकार को दिए गए अधिकार को छीनने का यह दुस्साहसिक प्रयास देश के लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर सरासर हमला है।’’
आतिशी ने कहा, ‘‘उन्हें (मोदी को) डर लगता है कि यदि उन्हें (केजरीवाल को) ताकत मिल गई, तो वह दिल्ली के लिए असाधारण काम करेंगे। यह अध्यादेश 11 मई को उच्चतम न्यायालय द्वारा ‘आप’ को दी गई शक्तियां छीनने की एक कोशिश है। यह लोकतंत्र एवं संविधान की हत्या है।’’
मंत्री ने कहा कि यह अध्यादेश कहता है कि दिल्ली के लोगों ने भले ही केजरीवाल को वोट दिया है, लेकिन वह (मुख्यमंत्री) दिल्ली को नहीं चलाएंगे। उन्होंने कहा कि यह अध्यादेश ‘असंवैधानिक’ है और उच्चतम न्यायालय इसे खारिज कर देगा।
आतिशी ने पिछली कुछ घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि यह ‘‘पहला मौका नहीं है’’ जब केंद्र ने केजरीवाल नीत सरकार की शक्ति को कम करने का प्रयास किया है।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2015 में, जब आप नीत सरकार ने दिल्ली में 70 में से 68 सीटें जीतकर जनता के समर्थन से भारी बहुमत हासिल किया, भाजपा नीत केंद्र सरकार ने तीन महीने के भीतर एक अधिसूचना जारी की, ताकि निर्वाचित केजरीवाल सरकार को उसकी वैध शक्ति से वंचित किया जा सके।
आतिशी ने कहा कि गृह मंत्रालय की एक अधिसूचना के माध्यम से केंद्र ने घोषणा की है कि केजरीवाल नीत सरकार का नौकरशाहों के स्थानांतरण और पदस्थापन जैसे महत्वपूर्ण सेवाओं के मामलों पर नियंत्रण नहीं है, या अक्षम अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए नहीं है।
न्यायालय ने अपने फैसले के लिए भारतीय संविधान के तीन प्रमुख खंडों- संविधान के संघीय ढांचे के सिद्धांत, अनुच्छेद 239 (एए), और निर्वाचित सरकार के प्रति नौकरशाहों की जवाबदेही, पर गौर किया।
आतिशी ने कहा, ‘‘संविधान में निहित लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुरूप, अनुच्छेद 239 एए लोगों की इच्छा को लागू करने के लिए दिल्ली की विधानसभा में एक निर्वाचित सरकार की जिम्मेदारी को रेखांकित करता है। निर्वाचित सरकार के प्रति नौकरशाहों की जवाबदेही एक मौलिक संवैधानिक सिद्धांत है।’’
उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र को इस वास्तविकता को स्वीकार करने में कठिनाई हो रही है। मंत्री ने कहा कि यह कदम दिल्ली सरकार के काम को रोकने के लिए उठाया गया।
उन्होंने कहा कि केंद्र जानता है कि यह अध्यादेश असंवैधानिक है और निस्संदेह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निरस्त कर दिया जाएगा। आतिशी ने कहा कि अध्यादेश की धारा 3ए में दावा किया गया है कि विधानसभा सहित दिल्ली की निर्वाचित सरकार के पास सेवा विभाग से संबंधित कोई भी नियम पारित करने का कोई अधिकार नहीं है।
आतिशी ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने आठ साल की लंबी लड़ाई के बाद दिल्ली सरकार को शक्तियां दी हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘अध्यादेश तीन-सदस्यों वाले राष्ट्रीय राजधानी सिविल सेवा प्राधिकरण के गठन की बात करता है, जिसके अध्यक्ष मुख्यमंत्री होंगे और मुख्य सचिव एवं प्रमुख गृह सचिव इसके सदस्यों के रूप में काम करेंगे, लेकिन इस बात पर गौर किया जाना चाहिए कि मुख्य सचिव एवं प्रमुख गृह सचिव की नियुक्ति केंद्र करेगा।’’
उन्होंने कहा, ‘‘प्राधिकरण बहुमत के आधार पर फैसले करेगा। अध्यक्ष होने के बावजूद मुख्यमंत्री अल्पमत में होंगे। इसका मतलब है कि फैसले केंद्र के नौकरशाहों द्वारा किए जाएंगे। अगर वह कोई ऐसा फैसला करता है, जो केंद्र को पसंद नहीं है, तो उपराज्यपाल के पास उसे पलटने का अधिकार होगा। ’’
उन्होंने कहा कि संक्षेप में, यह अध्यादेश घोषित करता है कि दिल्ली के लोगों द्वारा केजरीवाल को मुख्यमंत्री के रूप में चुने जाने की परवाह किए बिना, दिल्ली सरकार केंद्र सरकार द्वारा तय की जाएगी।
आतिशी ने दावा किया कि केंद्र के पास इस अध्यादेश को लागू करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। उन्होंने रेखांकित किया कि अपने आदेश में, उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट रूप से अनुच्छेद 160 में कहा, ‘‘राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के प्रशासन में भारत संघ की भागीदारी संवैधानिक प्रावधानों द्वारा सीमित है, और कोई भी आगे विस्तार शासन की संवैधानिक व्यवस्था के विपरीत होगा।’’
इस बीच, राज्यसभा सदस्य एवं ‘आप’ के वरिष्ठ नेता संजय सिंह ने भी अध्यादेश को लेकर केंद्र पर निशाना साधा और आरोप लगाया कि वह केजरीवाल सरकार को दिल्ली में काम नहीं करने देना चाहता।
सिंह ने एक अलग संवाददाता सम्मेलन में कहा, ‘‘केंद्र अदालत के आदेशों का पालन नहीं करता और वह इस बात की परवाह भी नहीं करता कि संविधान क्या कहता है। उसने उपराज्यपाल को सेवाओं का नियंत्रण वापस देने के लिए अध्यादेश लाकर न्यायालय के आदेश का अपमान किया है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘केंद्र केवल तानाशाही चाहता है। यह संविधान या देश के कानून में विश्वास नहीं करता और इसलिए वह अध्यादेश लेकर आया। यह मामला निश्चित ही अदालत में जाएगा।’’
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