नयी दिल्ली, 20 मई भारतीय कंपनियों द्वारा निर्यात किए जाने वाले कफ सिरप की गुणवत्ता को लेकर वैश्विक स्तर पर उठ रहे विवाद के बीच केंद्र अन्य देशों में दवाओं को भेजे जाने से पहले सरकारी प्रयोगशालाओं में परीक्षण के प्रस्ताव पर सक्रियता से विचार कर रहा है।
आधिकारिक सूत्रों ने कहा कि शीर्ष दवा नियामक प्राधिकरण केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) ने निर्यात से पहले सरकारी प्रयोगशालाओं में तैयार दवाओं का परीक्षण करने का प्रस्ताव दिया है।
प्रस्ताव के अनुसार, निर्यातकों को अधिकृत प्रयोगशालाओं द्वारा जारी किए गए बैच के विश्लेषण का प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करना होगा, जिसके बाद ही विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) निर्यात के लिए खेप जारी करने की मंजूरी देगा। निर्यात खेप से नमूने के विश्लेषण का भारतीय फार्माकोपिया आयोग, सीडीएससीओ प्रयागशालाओं यथा- सीडीएल (कोलकाता), सीडीटीआई (चेन्नई), सीडीटीआई (हैदराबाद), सीडीटीएल (मुंबई) समेत राज्य सरकारों की एनएबीएल से मान्यता प्राप्त औषधि परीक्षण प्रयोगशालाओं में परीक्षण करने का प्रस्ताव है।
एक अधिकारी ने कहा, ‘‘सीडीएससीओ ने कहा है कि खराब गुणवत्ता वाले कफ सिरप को भारत से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में प्रवेश करने से रोकने के लिए सरकार द्वारा कुछ हस्तक्षेप करना आवश्यक है।’’
भारतीय कंपनियों द्वारा निर्यात किए जाने वाले खांसी के सिरप को लेकर विश्व स्तर पर गुणवत्ता के मुद्दों पर संदर्भ प्राप्त हुए हैं। एक आधिकारिक सूत्र ने कहा कि संदर्भ और मीडिया खबरों में भी उल्लेख किया गया है कि भारतीय निर्माताओं द्वारा निर्मित और निर्यात किए गए कफ सिरप विदेशों में गुणवत्ता नियंत्रण परीक्षण में विफल रहे हैं।
इसके अलावा, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) से भी विदेश मंत्रालय, वाणिज्य विभाग और अन्य संस्थाओं तथा विभागों को ऐसी रिपोर्ट और परिणामों के बारे में पत्र प्राप्त हुए हैं।
आधिकारिक सूत्रों ने कहा, ‘‘भारत सरकार ने कदम उठाते हुए ऐसी इकाइयों की पहचान की है और राज्यों के साथ समन्वय में कार्रवाई शुरू की है। कुछ संयंत्रों को बंद कर दिया गया है, लाइसेंस रद्द कर दिया गया है और भारतीय कानूनों के तहत दंडात्मक कार्रवाई मामला-दर-मामला के आधार पर की गई है।’’
सूत्रों के अनुसार, सचिव (फार्मा) ने 26 अप्रैल को एक पत्र में निर्यात किए गए कफ सिरप की गुणवत्ता की विफलता के बारे में भी चिंता जताई थी, जिसमें कहा गया था कि यह ‘दुनिया की फार्मेसी’ के रूप में देश की राष्ट्रीय छवि को प्रतिकूल रूप से नुकसान पहुंचाएगा। पत्र में यह भी सुझाव दिया गया है कि स्वास्थ्य मंत्रालय कफ सिरप के निर्यात को अनिवार्य गुणवत्ता जांच के दायरे में रखने की संभावना तलाशे।
मामले से वाकिफ एक अन्य सूत्र ने कहा, ‘‘सीडीएससीओ ने कहा है कि इस्तेमाल की जाने वाली दवाओं की अघुलनशीलता के कारण कफ कंपोजिशन (कफ सिरप) के सिरप-आधारित फॉर्मूलेशन के लिए प्रोपलीन ग्लाइकोल, ग्लिसरीन और सोर्बिटोल जैसे सॉल्वैंट की आवश्यकता होती है। इन सॉल्वैंट के साथ आमतौर पर मिलावट की जाती है, जहां मुख्य रूप से डाइ-एथिलीन ग्लाइकॉल (डीईजी) और एथिलीन ग्लाइकॉल (ईजी) का इस्तेमाल सबसे आम हैं।’’
सूत्र ने कहा कि ये मिलावट किडनी के लिए जहरीली होती है और ज्यादा मात्रा में इस्तेमाल करने पर मौत का कारण बनती है। पिछले आठ महीनों में भारत स्थित कंपनियों द्वारा निर्मित दवाओं की गुणवत्ता पर सवाल उठते रहे हैं।
फरवरी में तमिलनाडु स्थित ग्लोबल फार्मा हेल्थकेयर ने अमेरिका में दृष्टिहानि से कथित रूप से जुड़े अपने सभी आई ड्रॉप की खेप को वापस ले लिया। इससे पहले, पिछले साल गांबिया और उज्बेकिस्तान में क्रमश: 66 और 18 बच्चों की मौत को कथित तौर पर भारत निर्मित कफ सिरप से जोड़ा गया था।
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