नयी दिल्ली, 21 अगस्त उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को केंद्र से इस बात पर विचार करने को कहा कि क्या संरक्षण रिजर्व और सामुदायिक रिजर्व घोषित क्षेत्रों में खनन गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है।
न्यायमूर्ति बी. आर. गवई, न्यायमूर्ति पी. के. मिश्रा और न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि सामुदायिक रिजर्व और संरक्षण रिजर्व प्रदान करने का मूल विचार वन्यजीवों को एक राष्ट्रीय उद्यान या वन्यजीव अभयारण्य से दूसरे में मुक्त आवागमन के लिए गलियारा प्रदान करना है।
पीठ ने कहा कि यदि संरक्षण रिजर्व और सामुदायिक रिजर्व को गलियारे के रूप में कार्य करना है, तो उन क्षेत्रों में खनन गतिविधियां वन्यजीवों की आवाजाही के लिए हानिकारक हो सकती हैं।
भारत में संरक्षण रिजर्व और सामुदायिक रिजर्व उन संरक्षित क्षेत्रों को दर्शाते हैं जो आम तौर पर स्थापित राष्ट्रीय उद्यानों, वन्यजीव अभयारण्यों और आरक्षित एवं संरक्षित वनों के बीच बफर क्षेत्र या ‘कनेक्टर’ (जोड़ने वाले) और आवागमन के गलियारे के रूप में कार्य करते हैं ।
पीठ ने कहा, ‘‘चूंकि सामुदायिक रिजर्व और संरक्षण रिजर्व प्रदान करने का मूल विचार एक राष्ट्रीय उद्यान/वन्यजीव अभयारण्य से वन्यजीवों की मुक्त आवाजाही के लिए गलियारा प्रदान करना है ... हम केंद्र से अनुरोध करते हैं कि वह इस बात पर विचार करे कि कम से कम उन क्षेत्रों में खनन पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है या नहीं, जिन्हें संरक्षण रिजर्व और सामुदायिक रिजर्व घोषित किया गया है।’’
न्यायालय संरक्षण रिजर्व और सामुदायिक रिजर्व के एक किलोमीटर के दायरे में खनन गतिविधियों से संबंधित मामले की सुनवाई कर रहा था।
शीर्ष न्यायालय ने पिछले साल 26 अप्रैल को दिए अपने फैसले में निर्देश दिया था कि राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य के भीतर एवं उनकी सीमाओं से एक किलोमीटर के क्षेत्र में खनन की अनुमति नहीं होगी।
पीठ ने बुधवार को सुनवाई के दौरान कहा कि सरकार को पारिस्थितिकी-पर्यटन को बढ़ावा देना चाहिए।
न्यायालय ने कहा कि फरवरी में उसने केंद्र से राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों सहित विभिन्न हितधारकों के साथ चर्चा करने तथा इस संबंध में सुझाव देने को कहा था।
न्यायालय ने कहा कि पर्यावरण और वन मंत्रालय (एमओईएफ) द्वारा मार्च में बुलाई गई बैठक में विभिन्न राज्यों द्वारा व्यक्त किए गए विचारों पर मंथन के बाद केंद्र द्वारा उसके समक्ष एक हलफनामा दायर किया गया है।
पीठ ने केंद्र की ओर से मामले में पेश हुई अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी की इन दलीलों पर भी गौर किया कि राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों की तुलना सामुदायिक रिजर्व और संरक्षण रिजर्व से नहीं की जा सकती।
भाटी ने वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम की धारा 36ए का हवाला दिया, जो संरक्षण रिजर्व की घोषणा और प्रबंधन से संबंधित है।
पीठ ने मामले की अगली सुनवाई अक्टूबर में करना तय किया।
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