नयी दिल्ली, छह मार्च भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) द्वारा जारी नये दिशा-निर्देशों के अनुसार, एकीकृत अनुसंधान में इस्तेमाल की जाने वाली आयुष-अनुमोदित दवाओं को अतिरिक्त सुरक्षा परीक्षण या ‘प्री-क्लीनिकल’ अध्ययन की आवश्यकता नहीं होगी, लेकिन गैर-संहिताबद्ध पारंपरिक दवाओं को संपूर्ण नियामक अनुमोदन प्रक्रिया से गुजरना होगा।
आईसीएमआर ने बुधवार को इन बदलावों की घोषणा की। उसने ‘मानव प्रतिभागियों को शामिल करते हुए जैव चिकित्सा और स्वास्थ्य अनुसंधान के लिए राष्ट्रीय नैतिक दिशा-निर्देश (2017)’ में एक परिशिष्ट प्रकाशित किया, ताकि एकीकृत चिकित्सा में अनुसंधान (आरआईएम) के लिए एक संरचित नैतिक ढांचा प्रदान किया जा सके।
उसने कहा कि इस पहल का मकसद पारंपरिक और आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों के एकीकरण पर शोध में नैतिक कठोरता और नियामक अनुपालन सुनिश्चित करके आयुष-आधारित एकीकृत स्वास्थ्य देखभाल के वैज्ञानिक आधार को मजबूत करना है।
नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, ऐसे शोध की देखरेख करने वाली आचार समितियों में अब दो आयुष विषय-वस्तु विशेषज्ञों को शामिल करना होगा, जिनमें से कम से कम एक संस्थान से बाहर का होना चाहिए ताकि समग्र विचार-विमर्श सुनिश्चित हो सके।
इनमें कहा गया है कि अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए सभी शोध को औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम (1940), नयी औषधि एवं क्लीनिकल परीक्षण नियम (2019) और आयुष प्रणालियों के लिए विशिष्ट अच्छे क्लीनिकल अभ्यास (जीसीपी) दिशानिर्देशों के अनुरूप होना चाहिए।
आयुष मंत्रालय के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा ने कहा, ‘‘इन नैतिक दिशानिर्देशों को जोड़ना वैज्ञानिक समुदाय को अधिक विश्वसनीयता और आत्मविश्वास के साथ एकीकृत चिकित्सा में शोध के लिए प्रोत्साहित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।’’
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