नयी दिल्ली, 30 अप्रैल भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) संजीव खन्ना ने बुधवार को कहा कि ऐसी दुनिया में जहां ध्यान लंबे समय तक नहीं टिक पाता, सबसे शक्तिशाली संदेश सबसे लंबा नहीं बल्कि सबसे सटीक होना चाहिए।
उन्होंने रेखांकित किया कि कानूनी सहायता के प्रति जागरूकता न तो उपदेशों के माध्यम से प्राप्त की जा सकती है और न ही यह भारी भरकम शब्दों वाली होनी चाहिए।
सीजेआई खन्ना राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बोल रहे थे, जिसमें अखिल भारतीय रील-मेकिंग और लघु फिल्म प्रतियोगिता में भाग लेने वाले विधि छात्रों को सम्मानित किया गया।
उन्होंने कहा कि कोई भी योजना तभी सफल होती है, जब उसका जमीनी स्तर पर प्रभाव पड़ता है। सीजेआई ने कहा, ‘‘योजनाओं की संकल्पना उन लोगों की बात सुनने के बाद की जानी चाहिए जिनको उनकी जरूरत है।’’
उन्होंने भारत में दुनिया की सबसे बड़ी कानूनी सहायता प्रणाली होने का उल्लेख करते हुए कहा कि लगभग 80 प्रतिशत भारतीय निशुल्क कानूनी सहायता के लिए पात्र हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘भारत के कानूनी सहायता मॉडल को और अधिक विशिष्ट बनाने वाली बात यह है कि यह केवल आरोपियों की मदद करने पर ही ध्यान केंद्रित नहीं करता है, बल्कि पीड़ित और गवाहों को भी सहायता प्रदान करता है। यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि नीतियां और योजनाएं अलग-अलग काम नहीं करती हैं। कई योजनाएं और नीतियां हैं, लेकिन मुद्दा यह है कि हम उन्हें कैसे लागू करते हैं और वे लाभार्थियों तक कितनी प्रभावी रूप से पहुंचती हैं।’’
सीजेआई ने कहा, ‘‘लक्षित लाभार्थियों के अलावा, हमें उन लोगों से भी जुड़ना चाहिए जो जमीनी स्तर पर काम कर रहे हैं।’’ उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी ने शानदार उपकरण दिए हैं और लघु फिल्म विषय वस्तु की बढ़ती मात्रा इसका सबूत है।
उन्होंने कहा, ‘‘यह (रील) 30 सेकंड या उससे कम समय में लोगों की राय को आकार देने के लिए बनाई जाती है। इसलिए हमें दर्शकों से वहीं मिलना चाहिए जहां वे हैं। कानूनी सहायता पर जागरूकता सामग्री उपदेश या शब्दजाल से भरी नहीं होनी चाहिए। ऐसी दुनिया में जहां ध्यान देर तक नहीं टिकता, सबसे शक्तिशाली संदेश सबसे लंबा नहीं बल्कि सबसे सटीक होना चाहिए। हमारे जागरुकता कार्यक्रमों को समय के साथ तालमेल रखना चाहिए।’’
सीजेआई ने कहा कि न्याय तक पहुंच और न्याय इतने करीब से जुड़े हुए हैं कि वे एक-दूसरे के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकते। उन्होंने कहा कि सच्चा न्याय तभी संभव है जब सभी को, चाहे उनकी पृष्ठभूमि कुछ भी हो, कानूनी प्रणाली तक समान पहुंच मिले।
नालसा के कार्यकारी अध्यक्ष न्यायमूर्ति भूषण रामकृष्ण गवई ने कहा कि विधिक सेवा संस्थान उन लोगों को न्याय प्रदान करने में अग्रणी हैं जो बेजुबान, कमजोर और व्यवस्था के लिए अदृश्य हैं। न्यायमूर्ति गवई ने कहा कि कानून केवल व्यवस्था का साधन नहीं है, बल्कि न्याय का जीवंत वादा है जिसे सहानुभूति, करुणा और साहस के साथ पूरा किया जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि कानूनी जागरूकता के पारंपरिक रूपों को आकर्षक माध्यमों द्वारा पूरक बनाया जाना चाहिए।
नालसा ने लोगों में कानूनी जागरूकता को बढ़ावा देने के लिए विधि छात्रों के बीच अखिल भारतीय रील-निर्माण और लघु फिल्म प्रतियोगिता शुरू की।
क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले की जयंती के अवसर पर, नालसा ने कानून के छात्रों के लिए अखिल भारतीय क्षेत्रीय रील मेकिंग और लघु फिल्म प्रतियोगिता शुरू करने की घोषणा की थी, जिसका शीर्षक था ‘‘कनेक्टिंग विद द कॉज।’’
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