प्रयागराज, 19 मई इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारी आशुतोष पांडेय की अभियोजन निदेशालय के प्रमुख के तौर पर नियुक्ति अवैध और बिना कानून के अधिकार के है।
नियुक्ति को अवैध ठहराते हुए अदालत ने कहा कि यह नियुक्ति सीआरपीसी के संवैधानिक प्रावधानों के उलट है जिसमें व्यवस्था है कि इस पद पर आसीन होने वाला व्यक्ति अधिवक्ता होना चाहिए और उसे वकालत का कम से कम 10 साल का अनुभव होना चाहिए और इस तरह की नियुक्ति इस राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सहमति से की जाएगी।
अदालत ने राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि अभियोजन निदेशालय के निदेशक की नियुक्ति आज से छह महीने के भीतर नियम के मुताबिक की जाए।
किशन कुमार पाठक नाम के व्यक्ति की रिट याचिका स्वीकार करते हुए न्यायमूर्ति सूर्य प्रकाश केसरवानी और न्यायमूर्ति जयंत बनर्जी की खंडपीठ ने कहा, “सीआरपीसी की धारा 25ए(2) के प्रावधान अनिवार्य हैं। मौजूदा मामले में आशुतोष पांडेय के पास ना ही आवश्यक पात्रता है और ना ही उनकी नियुक्ति उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सहमति से की गई है।”
सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि राज्य सरकार, कानून के किसी विशेष प्रावधान की अनुपस्थिति में संसद द्वारा पारित सीआरपीसी की धारा 24ए के प्रावधानों को लागू करने के लिए बाध्य है।
उन्होंने कहा कि चूंकि आशुतोष पांडेय सरकारी नौकरी में हैं और उनके पास इस पद के लिए आवश्यक पात्रता नहीं है, इसलिए वह इस पद पर बने रहने के लिए अपात्र हैं।
हालांकि, राज्य सरकार के वकील ने दलील दी कि चूंकि धारा 25ए को अभी तक उत्तर प्रदेश में लागू नहीं किया गया है, इसलिए सीआरपीसी की धारा 25ए की उप धारा(2) के तहत उल्लिखित अभियोजन निदेशक की पात्रता यहां लागू नहीं होगी।
अदालत ने राज्य सरकार के वकील की यह दलील स्वीकार नहीं की और कहा, सीआरपीसी की धारा 1 की उप धारा (2) के मुताबिक, “सीआरपीसी की धारा 25ए के प्रावधान उत्तर प्रदेश राज्य में लागू हैं। उत्तर प्रदेश की विधानसभा ने राष्ट्रपति की सहमति से सीआरपीसी की धारा 25ए में संशोधन के लिए कोई कानून पारित नहीं किया है।”
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