नयी दिल्ली, 17 सितंबर कई विपक्षी दलों के नेताओं ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति और सेवा शर्तों पर विधेयक को रविवार को ‘‘संविधान विरोधी’’ और ‘‘लोकतंत्र विरोधी’’ करार दिया।
उन्होंने सोमवार से शुरू हो रहे पांच दिवसीय संसद सत्र की पूर्व संध्या पर सरकार द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में विधेयक के खिलाफ अपनी राय रखी।
विधेयक में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों के चयन के लिए समिति में भारत के प्रधान न्यायाधीश के स्थान पर एक कैबिनेट मंत्री को शामिल करने का प्रावधान है, जिससे सरकार को निर्वाचन आयोग के सदस्यों की नियुक्ति में अधिक नियंत्रण मिलेगा।
यह विधेयक उच्चतम न्यायालय द्वारा मार्च में दिए गए उस फैसले के कुछ महीने बाद आया है जिसमें कहा गया था कि प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति संसद द्वारा निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कानून बनाए जाने तक मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) और निर्वाचन आयुक्तों (ईसी) का चयन करेगी। न्यायालय ने कहा था कि प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली इस समिति में लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधान न्यायाधीश भी होंगे।
कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल द्वारा अगस्त में राज्यसभा में पेश किए गए मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल की अवधि) विधेयक, 2023 के अनुसार प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय चयन समिति सीईसी और ईसी का चयन करेगी। समिति में विपक्ष के नेता और एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री भी होंगे।
यह विधेयक कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और वामपंथी दलों सहित विपक्षी दलों के हंगामे के बीच पेश किया गया, जिन्होंने सरकार पर उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ के आदेश को ‘‘कमजोर करने और पलटने’’ का आरोप लगाया।
हालांकि, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने कहा कि सरकार अपने अधिकार क्षेत्र में विधेयक ला रही है।
निर्वाचन आयोग में अगले साल की शुरुआत में एक रिक्ति होगी, जब निर्वाचन आयुक्त अनूप चंद्र पांडे के 15 फरवरी को 65 साल होने पर कार्यकाल खत्म हो जाएगा।
विधेयक में यह भी कहा गया है कि सीईसी और ईसी के वेतन और भत्ते कैबिनेट सचिव के समान होंगे। सीईसी और ईसी की सेवा और आचरण को नियंत्रित करने वाले वर्तमान कानून के तहत, उन्हें उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के वेतन के बराबर वेतन दिया जाता है।
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