मुजफ्फरनगर, 21 नवंबर तीन कृषि कानूनों को वापस लिये जाने का आश्वासन मिलने के बाद उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के किसानों की नजर अब न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के लिए एक कानून पर हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से तीन कृषि कानूनों को निरस्त करने की घोषणा किये जाने के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इस नगर में किसानों को जश्न मनाने का एक मौक मिल गया। मुजफ्फरनगर में भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) का मुख्यालय भी है।
बीकेयू अध्यक्ष नरेश टिकैत और उनके भाई व यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत मुजफ्फरनगर के गांव सिसौली में रहते हैं।
बीकेयू के स्थानीय सदस्य मगरम बाल्यान ने कहा कि सरकार ने किसानों के दबाव के कारण कानूनों को वापस लेने की घोषणा की। उन्होंने दावा किया कि यह घोषणा चुनाव से पहले मतदाताओं को खुश करने की एक कोशिश है।
बाल्यान ने कहा, ‘‘केवल इन कानूनों को वापस लेने से किसानों की मदद नहीं होने वाली। सरकार को अब फसलों के लिए एमएसपी की कानूनी गारंटी देनी चाहिए, उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए और खेती के लिए महत्वपूर्ण अन्य मामलों को हल करना चाहिए।’’ उन्होंने यह भी कहा कि विरोध प्रदर्शनों ने जाट समुदाय को अब भाजपा के विरोध में मजबूती से एकजुट किया है। इस दावे को किसी साक्ष्य की जरूरत नहीं क्योंकि इस क्षेत्र के किसानों ने अपने गांवों में भाजपा नेताओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया है।
बाल्यान ने कहा, ‘‘मृत्यु और शोक प्रार्थना सभाओं के दौरान उनके स्वैच्छिक दौरों को छोड़कर, भाजपा नेताओं के गांवों में प्रवेश करने पर लगभग एक साल से अधिक समय से प्रतिबंध लगाया गया है।’’
विपक्षी राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) ने कहा कि कानूनों को निरस्त करने का निर्णय एक बड़ी बात है क्योंकि यह दिखाता है कि भाजपा पार्टी के बाहर ‘‘झुकती’’ है, जो 2014 के बाद शायद ही कभी हुआ हो। रालोद ने यह भी कहा कि कानूनों को निरस्त करके, सरकार ने किसानों पर कोई एहसान नहीं किया है क्योंकि मुख्य समस्याओं का समाधान अभी भी किया जाना बाकी है।
रालोद प्रवक्ता संदीप चौधरी ने पीटीआई- से कहा, ‘‘प्रधानमंत्री मोदी ने उन कानूनों को वापस लेने की घोषणा की है जिन्हें किसानों ने पहले दिन से स्वीकार नहीं किया। उन्होंने किसानों से केवल वह बोझ हटाया है जो उनकी सरकार समुदाय पर डालना चाहती थी।’’
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