मुंबई, 25 सितंबर बंबई उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को जब यह निर्णय सुनाया कि उद्धव ठाकरे नीत शिवसेना मध्य मुंबई में स्थित शिवाजी पार्क मैदान में दशहरा रैली कर सकती है तो ठाकरे के समर्थक खुशी से झूम उठे।
वहीं, असली शिवसेना मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे का खेमा है या ठाकरे के नेतृत्व वाली है, यह मामला उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन है।
शिंदे द्वारा बगावत करने के बाद, ठाकरे नीत शिवसेना उच्च न्यायालय के आदेश को अपनी प्रतीकात्मक जीत मान रही है क्योंकि शिवाजी पार्क मैदान से पार्टी का इतिहास जुड़ा हुआ है।
इसी मैदान पर शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने पहली रैली की थी और उसके बाद दशहरे पर कई रैलियों को संबोधित किया।
वर्ष 2012 में जब बाल ठाकरे का निधन हुआ, तब इसी मैदान में उनका अंतिम संस्कार किया गया था। दादर के पास स्थित इस मैदान को इसलिए भी जाना जाता है कि सचिन तेंदुलकर ने क्रिकेट जगत में बुलंदियों को छूने से पहले यहां चौके-छक्के जड़े थे।
परंतु शिंदे खेमा और ठाकरे नीत पार्टी के हिस्से द्वारा हाल में शिवाजी पार्क में दहशरा रैली के लिए अपना-अपना दावा जताने के बाद यह परोक्ष रूप से लड़ाई का मैदान बन गया। कानून व्यवस्था का हवाला देते हुए बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) ने दोनों खेमों को रैली की इजाजत देने से इनकार कर दिया था लेकिन शुक्रवार को उच्च न्यायालय ने उद्धव ठाकरे खेमे को रैली की अनुमति दे दी।
इस मैदान और आवासीय क्षेत्र का अपना एक इतिहास है। लेखक शांता गोखले ने इस पर एक किताब लिखी थी जिसका शीर्षक था “शिवाजी पार्क: दादर 28: हिस्ट्री, प्लेसेज, पीपुल।”
उन्होंने लिखा है कि समुद्र तट के किनारे स्थित इस पार्क को जनता के लिए 1925 में खोला गया था। इसे पहले माहिम पार्क कहा जाता था और 1927 में छत्रपति शिवाजी महाराज की 300वीं जयंती के अवसर पर लोगों की मांग पर इसका नाम शिवाजी पार्क रख दिया गया था।
इसके बाद से यह पार्क महाराष्ट्र के राजनीतिक इतिहास की कई महत्वपूर्ण घटनाओं का साक्षी रहा है जिसमें संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन भी शामिल है। इस आंदोलन के जरिये ही 1960 में महाराष्ट्र राज्य की स्थापना हुई थी। बाद में शिवाजी पार्क शिवसेना की राजनीति का केंद्र बन गया।
शिवसेना के नेता और सांसद गजानन कीर्तिकर ने पीटीआई- से कहा, “इस स्थान से शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे ने पार्टी का एजेंडा घोषित किया था जैसे कि मराठी मानुष, हिंदुत्व और विविध विषयों पर पार्टी का रुख। वह विरोधी दलों पर भी तीखे हमले करते थे।”
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