देश की खबरें | जातिगत गणना समावेशी नीति की दिशा में एक कदम, पर वास्तविक प्रभाव डेटा के उपयोग पर निर्भर:विशेषज्ञ

नयी दिल्ली, 30 अप्रैल विकास और नीति निर्माण से जुड़े विशेषज्ञों ने बुधवार को कहा कि अगली जनगणना में जातिगत गणना को शामिल किये जाने का केंद्र का फैसला अधिक समावेशी और न्यायसंगत सार्वजनिक नीति बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। हालांकि उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इसका वास्तविक महत्व इस बात पर निर्भर करेगा कि डेटा का कितना सार्थक उपयोग किया जाता है।

एक बड़े फैसले के तहत केंद्र ने बुधवार को घोषणा की कि अगली जनगणना में जातिगत गणना को ‘पारदर्शी’ तरीके से शामिल किया जाएगा और जाति सर्वेक्षणों को ‘राजनीतिक उपकरण’ के रूप में इस्तेमाल करने के लिए विपक्षी दलों की आलोचना की।

‘पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया’ की कार्यकारी निदेशक पूनम मुतरेजा ने शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक सुरक्षा जैसी सेवाओं तक पहुंच को प्रभावित करने वाली संरचनात्मक असमानताओं को दूर करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

उन्होंने कहा, ‘‘उदाहरण के लिए प्रजनन संबंधी स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच न केवल लिंग से बल्कि महिला कहां रहती है, उसकी जाति, समुदाय और आय के स्तर से भी निर्धारित होती है।’’

मुतरेजा के अनुसार, इस तरह की अंतर-असमानताओं को उजागर करने और वास्तव में समावेशी नीतियों को तैयार करने के लिए जातिगत गणना महत्वपूर्ण है।

केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बिहार में तत्कालीन महागठबंधन की सरकार के दौरान एवं तेलंगाना और कर्नाटक जैसे कुछ विपक्षी शासित राज्यों के पिछले प्रयासों की आलोचना करते हुए दावा किया कि उन्होंने इस तरह के सर्वेक्षण ‘गैर-पारदर्शी’ तरीके से करवाए, जिससे समाज में संदेह पैदा हुआ।

हालांकि, कई नागरिक समाज के लोग तर्क देते हैं कि राष्ट्रीय स्तर के जातिगत डेटा को लंबे समय से लंबित रखा गया है।

‘ट्रांसफॉर्म रूरल इंडिया’ (टीआरआई) के एसोसिएट निदेशक (गवर्नेंस) जितेंद्र पंडित ने कहा कि पंचायती राज संस्थाओं को अलग-अलग जातिगत डेटा से काफी फायदा हो सकता है।

उन्होंने ‘पीटीआई-’ से कहा, ‘‘पंचायती राज संस्थाएं ग्रामीण विकास के प्रयासों के केंद्र में हैं और जाति-आधारित डेटा उन्हें ऐसे कार्यक्रम डिजाइन करने की अनुमति देगा जो स्थानीय समुदायों की अनूठी भौगोलिक, जनसांख्यिकीय और सामाजिक जरूरतों को ध्यान में रखते हों।’’

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