चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी में हाल ही में उजागर हुए भ्रष्टाचार घोटाले ने सेना को झकझोर दिया है. शी जिनपिंग के दो उप-प्रमुखों के खिलाफ जांच ने सशस्त्र सेनाओं में वफादारी, सत्ता और नियंत्रण की खींचतान को उजागर कर दिया है.कुछ ही हफ्ते पहले सामने आया कि चीन में अधिकारियों ने पीपल्स लिबरेशन आर्मी के दो शीर्ष सैन्य अधिकारियों के खिलाफ "गंभीर अनुशासन उल्लंघन” के आरोपों में जांच शुरू की है. (गंभीर अनुशासन उल्लंघन - इस शब्दावली का इस्तेमाल आम तौर पर भ्रष्टाचार के मामलों में किया जाता है.)
जांच के दायरे में शीर्ष जनरल, झांग योउशिआ हैं. जो कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग के काफी करीबी माने जाते हैं और सेंट्रल मिलिट्री कमीशन के दो उप-चेयरमैन में से एक हैं. इसके अलावा वरिष्ठ जनरल लेओ जेनली की भी जांच हो रही है. दोनों को ही उनके पदों से हटाया जा चुका है.
सेंट्रल मिलिट्री कमीशन चीन की सभी सशस्त्र इकाइयों यानी थलसेना, नौसेना, वायुसेना, परमाणु रॉकेट बल, सशस्त्र पुलिस और मिलिशिया की सर्वोच्च कमान है. इसके अध्यक्ष शी जिनपिंग हैं, जो कि देश के राष्ट्रपति और सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव भी हैं.
शी जिनपिंग के पास मौजूद तीनों शीर्ष पदों में से सेंट्रल मिलिट्री कमीशन का अध्यक्ष पद सबसे शक्तिशाली माना जाता है. चीन के संविधान के अनुच्छेद 93 के अनुसार, सशस्त्र बलों की कमान राष्ट्रपति के नहीं, बल्कि कमीशन के अध्यक्ष के हाथ में होती है.
चीन के संस्थापक नेता, माओ जेदोंग का प्रसिद्ध कथन था कि "राजनीतिक सत्ता बंदूक की नली से निकलती है.”
यह सोच लंबे समय से चीनी राजनीति को दिशा देती आ रही है. साल 2005 में तत्कालीन राष्ट्रपति जियांग सामिन ने अन्य पद छोड़ने के बाद भी कुछ समय तक सैन्य आयोग पर नियंत्रण बनाए रखा था और देरी से अपने उत्तराधिकारी, हू जिंताओ को यह जिम्मेदारी सौंपी थी.
युद्ध के अनुभव वाला जनरल
चीन के सबसे वरिष्ठ वर्दीधारी अधिकारी, झांग योउशिआ का मामला खास तौर पर चौंकाने वाला है. चूंकि, सेंट्रल मिलिट्री कमीशन के शीर्ष नेतृत्व में वह अकेले ऐसे अधिकारी थे, जो एक साधारण सैनिक से आगे बढ़ते हुए सर्वोच्च पद तक पहुंचे थे.
झांग 1968 में 18 साल की उम्र में सेना में शामिल हुए थे. 1979 और 1984 में उन्होंने रेजिमेंट की कमान संभाली और वियतनाम के साथ सीमा युद्ध में हिस्सा लिया. बाद में वह चीन के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में थलसेना के कमांडर बने और फिर बीजिंग जाकर सैन्य मुख्यालय में शीर्ष नेतृत्व की भूमिका निभाई.
ताइवान की तमकांग यूनिवर्सिटी के राजनीतिक वैज्ञानिक यिंग-यू लिन ने डीडब्ल्यू से कहा, "यह मामला हैरान करने वाला है. सेंट्रल मिलिट्री कमीशन के नेतृत्व में अब ऐसा कोई भी नहीं है, जिसके पास वास्तविक युद्ध का अनुभव हो. यह चिंता की बात है.”
शी और सैन्य आयोग के अन्य उप-चेयरमैन की पृष्ठभूमि सैन्य से ज्यादा राजनीतिक रही है.
झांग योउशिआ सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के शक्तिशाली 25 सदस्यीय पोलितब्यूरो के भी सदस्य थे, जहां वह सेना का प्रतिनिधित्व करते थे. उन्हें व्यापक रूप से शी जिनपिंग का पसंदीदा उम्मीदवार माना जाता था. 72 वर्ष की उम्र में पोलितब्यूरो में उनका पदोन्नयन स्थापित परंपराओं से हटकर था. चूंकि, आम तौर पर इस उम्र पर अधिकारी सेवानिवृत्त हो जाते हैं.
भरोसे में दरार
कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर कई सालों से भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों का इस्तेमाल नेताओं को अनुशासन में रखने और वफादारी न निभाने पर सजा देने के लिए किया जाता रहा है.
हाल के समय में यह अभियान जनरलों और सेनाओं पर केंद्रित होता नजर आ रहा है. चूंकि, शी जिनपिंग सशस्त्र बलों के नेतृत्व ढांचे को नए सिरे से आकार देना चाहते हैं.
अक्टूबर में चीनी अधिकारियों ने नौ सैन्य अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार जांच की घोषणा की थी.
ताइवान के इंस्टीट्यूट फॉर नेशनल डिफेंस एंड सिक्योरिटी रिसर्च के मिंग-शिह शीन के अनुसार, 2022 में जब शी जिनपिंग ने पार्टी की 20वीं कांग्रेस में परंपरागत नियमों को तोड़ते हुए तीसरा कार्यकाल हासिल किया, तब झांग उनके मुखर समर्थकों में शामिल थे.
ताइवान के विद्वान शीन ने डीडब्ल्यू से कहा, "शी जिनपिंग ने सेना के भीतर भी कई पुरानी परंपराओं और वर्जनाओं को तोड़ा है. सत्ता मजबूत करने के लिए उन्होंने अपने भरोसेमंद सहयोगियों को तय समय से पहले आगे बढ़ाया.”
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हालांकि शीन का मानना है कि सेना के खिलाफ शुरू हुए भ्रष्टाचार अभियानों की शुरुआती लहर के बाद झांग भी खुद को धीरे-धीरे घिरा और असुरक्षित महसूस करने लगे होंगे, भले ही वह शुरुआत में सीधे निशाने पर नहीं थे.
लिन ने कहा, "साफतौर पर शी जिनपिंग अब उन पर भरोसा नहीं करते.” उन्होंने कहा, "झांग के पतन की वजह पर अटकलें लगाना ज्यादा मायने नहीं रखता, चाहे आरोप भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, या फिर (जैसा कि अमेरिकी मीडिया ने कहा) विदेशी खुफिया एजेंसियों के लिए जासूसी का हो, अगर भरोसा होता तो इन अटकलों की जरूरत ही नहीं पड़ती. जब भरोसा खत्म हो जाता है, तो आरोप महज एक औपचारिकता बन जाते हैं.”
सत्ता में खींचतान
झांग के मामले पर रिपोर्टिंग करते हुए पीपल्स लिबरेशन आर्मी डेली ने उन पर आरोप लगाया कि उन्होंने सशस्त्र बलों के सर्वोच्च कमांडर के रूप में अध्यक्ष द्वारा दी गई शक्तियों का दुरुपयोग किया. अखबार में जोर दिया गया कि कोई भी रैंक कानून से छूट नहीं देता और कोई सैन्य सम्मान कानूनी कार्रवाई से बचाव नहीं दे सकता.
ताइवान के इंस्टीट्यूट फॉर नेशनल डिफेंस एंड सिक्योरिटी रिसर्च के शोधकर्ता, कांग चाहन के अनुसार, इस तरह की भाषा से संकेत मिलता है कि झांग ने सेना के भीतर वफादार समर्थकों का एक नेटवर्क खड़ा कर लिया था. उन्होंने कहा, "संभव है कि शी जिनपिंग इस नेटवर्क को एक संभावित खतरे के रूप में देखते हो. जिससे पार्टी या शी के मूल हितों पर आंच आ सकती हो.”
कांग के मुताबिक, जो भी व्यक्ति अध्यक्ष के रूप में शी जिनपिंग के अधिकार पर सवाल उठाता है, उस पर वफादार न होने या विद्रोही होने के आरोप लगने का जोखिम रहता है.
चीन ने दशकों से कोई युद्ध नहीं लड़ा है. लेकिन चीनी भाषा के ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर इस हालात को लेकर राजनीतिक चुटकुले बनाए जा रहे हैं. जैसे, "अब सेना अपने ही जनरलों के खिलाफ युद्ध लड़ रही है,” या "अगली सैन्य परेड की अगुवाई एक ऐसे जनरल करेंगे, जो अपना नाम नहीं बताना चाहेंगे.”
इस बीच चीन लगातार अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन करता रहा है, खासकर प्रशांत तट के पास नौसैनिक अभ्यासों के जरिए. साल 2025 में चीन का सैन्य खर्च लगभग 220 अरब यूरो रहा था.













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