पहले पड़ोसियों से रिश्ते सुधारने की रणनीति पर तालिबान
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

अफगानिस्तान में तालिबान सरकार को मान्यता प्रदान करने के प्रति वैश्विक समुदाय ने अभी तक संकोच ही दिखाया है. लेकिन काबुल अपने क्षेत्रीय विस्तार की कड़ियां जोड़ने के प्रयास में है.इस वर्ष जनवरी में काबुल में व्यापक कूटनीतिक गतिविधियां देखने को मिलीं. तालिबान ने ‘अफगानिस्तान क्षेत्रीय सहयोग पहल' नाम से एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के आयोजन की योजना बनाई, जिसमें 11 देशों ने सहभागिता का आमंत्रण भी स्वीकार कर लिया.

तालिबान से संबंधित एजेंसियों के अनुसार इस बहुस्तरीय बैठक का उद्देश्य क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ाना था, जिसमें भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान और ईरान जैसे देशों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया.

यह स्पष्ट नहीं कि इस आयोजन का मकसद पूरा हुआ या नहीं, लेकिन इससे तालिबान की वह मंशा जरूर सामने आई कि वह पड़ोसी देशों के साथ अच्छे संबंध बनाने का इच्छुक है.

इस संबंध में यह इस्लामिक कट्टरपंथी समूह अपने खाते में कुछ शुरुआती सफलताओं का दावा कर सकता है. उदाहरण के तौर पर जब चीन के राष्ट्रपति शी चिनपिंग ने जनवरी के अंत में तालिबान द्वारा नियुक्त अफगान राजदूत मावलावी असदुल्ला बिलाल करीमी को स्वीकार कर लिया.

तब चीन ने इस बात पर भी जोर दिया था कि कूटनीतिक स्वीकृति का यह अर्थ नहीं कि बीजिंग अफगानिस्तान के मौजूदा शासन को आधिकारिक रूप से मान्यता प्रदान करता है. हालांकि, अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता संभालने के बाद से दोनों देश एक दूसरे के निकट आए हैं.

मीडिया संस्थान अल जजीरा की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में कई चीनी कंपनियों ने तालिबान के साथ कारोबारी अनुबंध किए. इनमें 25 वर्षीय तेल उत्पादन अनुबंध भी शामिल है, जिसमें पहले वर्ष 15 करोड़ डॉलर (137.5 मिलियन यूरो) का निवेश होगा, जो अगले तीन वर्षों में बढ़कर 54 करोड़ डॉलर तक पहुंच जाएगा.

ईरान भी कई वर्षों से काबुल के साथ करीबी रिश्ते बनाने में लगा है. तेहरान ने तालिबान के काबुल की सत्ता पर काबिज होने के कुछ महीनों बाद अक्टूबर 2021 में अपने राजनयिक हसन काजमी कोमी को अफगानिस्तान में अपना विशेष दूत नियुक्त किया था.

यूं तो ईरान सरकार ने तालिबान सरकार को पूरी तरह से मान्यता प्रदान नहीं की, लेकिन संकेत दिए कि उसके अनुसार तालिबान के साथ संबंध समूचे क्षेत्र के लिए लाभकारी हैं. राजनीतिक स्थिरता पर जोर देते हुए भारत का दृष्टिकोण भी कुछ ऐसा ही है.

केंद्रीय भूमिका में भू-राजनीतिक हित

इस क्षेत्र में यह घटनाक्रम तालिबान के साथ कूटनीतिक रिश्तों की ओर रुझान को रेखांकित करता है. इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप नामक थिंक टैंक की रिपोर्ट के अनुसार अफगानिस्तान के पड़ोसियों का रुझान तेजी से काबुल में मौजूदा शासन के पक्ष में झुक रहा है. इस क्षेत्र में सक्रिय एक राजनयिक के नाम का उल्लेख किए बिना रिपोर्ट में उनके हवाले से लिखा गया है, ‘हम तालिबान के पक्ष में पश्चिम के मिजाज बदलने का इंतजार नहीं कर सकते. हम यहां पहली पंक्ति में बैठे हैं.'

स्वतंत्र थिंक टैंक अफगानिस्तान एनालिस्ट नेटवर्क के सह-संस्थापक थॉमस रुटीग का कहना है कि पड़ोसियों के साथ नए सिरे से सक्रियता तालिबान के लिए बड़ी जीत होगी.

उन्होंने कहा कि 1996 से 2001 के बीच पिछली बार अपनी सत्ता के दौरान भी तालिबान अपने लिए अंतरराष्ट्रीय मान्यता चाह रहे थे. रूटिग ने आगे कहा कि यह समूह इससे भलीभांति परिचित है कि पश्चिम के साथ कड़ियां जोड़ने की राह में तमाम बाधाएं मौजूद हैं, जिनमें अपनी खुद की जनसंख्या के प्रति दृष्टिकोण विशेषकर महिलाओं के अधिकारों के दमन जैसी तालिबान की कड़ी नीतियां शामिल हैं.

रूटिग ने डीडब्ल्यू को बताया, ‘परिणामस्वरूप, तालिबान अब इस क्षेत्र के देशों के साथ ही संपर्क साध रहा है, क्योंकि उनके साथ ऐसा करना अपेक्षाकृत आसान है.'

आईसीजी की रिपोर्ट रेखांकित करती है कि रीअप्रोचमेंट यानी नए सिरे से सक्रियता का वैचारिक समानता के साथ उतना सरोकार नहीं. इसके बजाय यह भू-राजनीतिक हितों से अधिक संचालित हो रही है, जिसमें क्षेत्रीय सुरक्षा एवं स्थायित्व कायम रखने की आकांक्षा भी शामिल है.

आतंक पर अंकुश

रूटिग ने कहा कि आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई अफगानिस्तान के पड़ोसियों का साझा लक्ष्य है. इनमें मध्य एशियाई लोकतंत्रों से लेकर चीन और ईरान एवं अन्य देश भी शामिल हैं.

उन्होंने कहा कि इस्लामिक स्टेट (आईएस) के क्षेत्रीय संगठन इस्लामिक स्टेट ऑफ खोरसान का बढ़ता खतरा इन देशों को तालिबान के साथ अपने रिश्ते बढ़ाने के लिए प्रेरित कर रहा है. पाकिस्तान की स्थिति दर्शाती है कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बिना आतंकवाद से लड़ना कितना कठिन हो सकता है.

‘द डिप्लोमैट' पत्रिका के अनुसार तालिबान के सत्ता संभालने के बाद पाकिस्तान में आतंकी हमलों में काफी इजाफा हुआ है. केवल 2023 के दौरान ही आतंकी हमलों में 70 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज हुई. आतंकी हमलों में करीब 970 लोग मारे गए, जबकि तकरीबन 1,350 घायल हुए.

तालिबान ने आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के ऊपर कोई कार्रवाई नहीं की है. इसकी एक वजह तो यही हो सकती है कि तालिबान ऐसी कार्रवाई करने की स्थिति में ही नहीं है या फिर वह पड़ोसी देश पर राजनीतिक दबाव डालना चाहता हो. ‘द डिप्लोमैट‘ को अंदेशा है कि तालिबान की इस निष्क्रियता के पीछे पाकिस्तान की वह नीति हो सकती है, जिसमें उसने हजारों अफगान शरणार्थियों को वापस भेज दिया.

इसके बावजूद दोनों देश नए व्यापारिक मार्गों जैसे आर्थिक मुद्दों पर बातचीत कर रहे हैं.

रूटिग ने कहा कि आतंक प्रभावित अधिकांश देश तालिबान के सहयोग पर भरोसा कर रहे हैं. उन्होंने कहा, ‘उन्हें उम्मीद है कि तालिबान उनके सबसे महत्वपूर्ण घरेलू शत्रु के खिलाफ कदम उठाएगा. वैसे तो तालिबान कुछ समूहों के खिलाफ कदम उठा रहा है, लेकिन वे सभी के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर रहे. मिसाल के तौर पर, अभी तक उन्होंने उइगर चीन को नहीं सौंपे जबकि पिछली सरकार ने ऐसा किया था.”

क्षेत्रीय सहयोग का एक और पहलू आर्थिक हितों से जुड़ा है. आईसीजी के अध्ययन के अनुसार अफगानिस्तान में युद्ध समाप्त होने के बाद से व्यापार धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ रहा है. खासतौर से ऊर्जा क्षेत्र में.

हालांकि व्यापारिक संबंधों की राह में अभी भी लचर मानवाधिकार स्थितियों और विधि यानी कानून के शासन के अभाव जैसे अवरोध कायम हैं लेकिन दीर्घकालिक स्तर पर व्यापार में सुधार की उम्मीद है ताकि व्यापक आबादी विकास की ओर उन्मुख अर्थव्यवस्था से लाभ उठा सके.

दबाव में मानवाधिकार

अफगानिस्तान के लिए यूरोपीय संघ (ईयू) के विशेष दूत थॉमस निकलॉसन ने क्षेत्रीय स्तर पर सक्रियता का स्वागत किया है. उनका कहना है कि अफगानिस्तान में दशकों के युद्ध के बाद यह ‘आवश्यक' है.

साथ ही साथ उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि ईयू की मुख्य चिंता महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों, विशेषकर उनकी शिक्षा एवं रोजगार से जुड़ी है.

अफगानिस्तान एनालिस्ट नेटवर्क के रुटिग ने कहा, ‘इस क्षेत्र में ना तालिबान और ना रूस, चीन या फिर कोई अन्य देश भी स्वाभाविक रूप से मानवाधिकारों पर ध्यान देता है. इस लिहाज से पश्चिम की तुलना में उनके लिए तालिबान के साथ संबंध स्थापित करना अमूमन आसान है.'