अमेरिका-चीन को कैसी टक्कर दे पाएगा जर्मनी का इंडस्ट्रियल एआई

जर्मनी पहले से ही स्मार्ट प्रोडक्शन के लिए एआई का इस्तेमाल कर रहा है, जिसमें वर्चुअल फैक्ट्रियां, रोबोटों का बेड़ा और हाल ही में लॉन्च किया गया इंडस्ट्रियल एआई क्लाउड शामिल है.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

जर्मनी पहले से ही स्मार्ट प्रोडक्शन के लिए एआई का इस्तेमाल कर रहा है, जिसमें वर्चुअल फैक्ट्रियां, रोबोटों का बेड़ा और हाल ही में लॉन्च किया गया इंडस्ट्रियल एआई क्लाउड शामिल है.जर्मनी ने इस महीने एक बड़ा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) प्रोजेक्ट शुरू किया है, ताकि उसे हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग और डेटा प्रोसेसिंग के लिए अमेरिकी कंपनियों के भरोसे न रहना पड़े. माना जा रहा है कि इस कदम से पूरे यूरोप को अपना एआई सिस्टम खुद संभालने और विकसित करने की ताकत मिलेगी.

डॉयचे टेलीकॉम के सहयोग से बने ‘इंडस्ट्रियल एआई क्लाउड' ने एक नया रिकॉर्ड कायम किया है. जिस प्रोजेक्ट को पूरा करने में आमतौर पर 12 से 24 महीने लगते हैं, उसे महज 6 महीने के भीतर प्लानिंग करके, तैयार और लॉन्च कर दिया गया.

इस टेलीकॉम कंपनी ने म्यूनिख के ट्यूचरपार्क में स्थित एक पुरानी फैसिलिटी को आधुनिक बनाकर उसे नया रूप दिया है. यहां लगभग 10,000 एनवीडिया ब्लैकवेल जीपीयू लगाए गए हैं. ये वही हाई-एंड चिप्स हैं जिनकी इस समय पूरी दुनिया में भारी किल्लत है. टेलीकॉम का दावा है कि इस केंद्र का कंप्यूटिंग पावर इतना अधिक है कि यूरोपीय संघ के सभी 45 करोड़ नागरिक एक साथ एआई असिस्टेंट का इस्तेमाल कर सकते हैं.

हालांकि, यह इंडस्ट्रियल एआई क्लाउड आम उपभोक्ता को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि जर्मनी की दिग्गज औद्योगिक कंपनियों को ध्यान में रखकर बनाया गया है. इनमें कार निर्माता, मशीनरी बनाने वाली कंपनियां और रोबोटिक्स कंपनियां शामिल हैं. इसके अलावा, यह शोध संस्थानों, सरकारी क्षेत्र और उन कंपनियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण टूल साबित हो सकता है जो नए एआई एप्लिकेशन विकसित कर रही हैं.

डॉयचे टेलीकॉम के सीईओ टिम हॉटगेस ने लॉन्च के बारे में कहा, "हम एआई में निवेश कर रहे हैं. जर्मनी को एक बिजनेस हब बनाने और पूरे यूरोप के भविष्य में निवेश कर रहे हैं. म्यूनिख में हमारी यह एआई फैक्ट्री उद्योगों, स्टार्टअप, सरकार और हमारी संप्रभुता के लिए नए और इनोवेटिव बिजनेस मॉडल्स की बुनियाद बनेगी. हम यहां साबित कर रहे हैं कि यूरोप एआई के क्षेत्र में बहुत कुछ कर सकता है.”

इंडस्ट्रियल एआई की ताकत का इस्तेमाल कर रहा है जर्मनी

यह नया प्रोजेक्ट सीधे तौर पर जर्मनी की उन व्यापक औद्योगिक एआई महत्वाकांक्षाओं से मेल खाता है, जहां एआई को देश की असली ताकत यानी ‘मैन्युफैक्चरिंग' के अनुसार ढाला जा रहा है. जर्मनी ने ‘कंज्यूमर-फेसिंग' (आम उपभोक्ता से जुड़े) एआई के बजाय इस क्षेत्र को चुना है, क्योंकि उपभोक्ता बाजार में अमेरिका और चीन पहले से ही काफी आगे निकल चुके हैं.

जर्मन रिसर्च सेंटर फॉर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (डीएफकेआई) के सीईओ एंटोनियो क्रूगर का भी मानना है कि इंडस्ट्रियल एआई जर्मनी को बराबरी पर आने का एक मौका देता है. इसके लिए, जर्मनी को दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं (अमेरिका और चीन) की तरह खरबों डॉलर के निवेश का जोखिम उठाने की भी जरूरत नहीं है.

क्रूगर ने डीडब्ल्यू को बताया, "इंडस्ट्रियल एआई जर्मनी को अपनी ताकत दिखाने का मौका देता है. हम ऐसे छोटे और विशेष एआई मॉडल्स डिजाइन कर रहे हैं जो जर्मनी के मध्यम और लघु उद्योगों (जिन्हें ‘मिटेलश्टांड' कहा जाता है) के पिछले एक दशक से भी ज्यादा के डेटा का इस्तेमाल करते हैं.”

जर्मनी के मिटेलश्टांड को देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है. इसने वर्षों से उत्पादन, लॉजिस्टिक्स और मशीन-स्तरीय डेटा का विशाल भंडार जमा किया है. यह डेटा अब इंडस्ट्रियल एआई सिस्टम को प्रशिक्षित करने के लिए बेहद अहम साबित हो रहा है.

जर्मनी ने पेश किया भरोसेमंद एआई

जर्मनी की इस रणनीति को ‘भरोसेमंद एआई' के रूप में पेश किया जा रहा है. इसके जरिए यूरोपीय संघ के एआई कानून को अब एक प्रतिस्पर्धी फायदे में बदला जा रहा है. यूरोपीय संघ का जो एआई कानून पहले तरक्की की राह में रुकावट माना जाता था, जर्मनी उसे ही अपनी ताकत बना रहा है. जबकि इस एआई कानून की अक्सर आलोचना होती रही है.

यह कानून निर्माताओं को सुरक्षित और विश्वसनीय सिस्टम बनाने के लिए स्पष्ट और लागू होने योग्य नियम देता है. इससे अब इस कानून को इनोवेशन में बाधा मानने के बजाय एक फायदे के रूप में देखा जा रहा है. इसकी वजह यह है कि स्पष्ट और कड़े नियम होने से कंपनियों को पता है कि उन्हें सुरक्षित और भरोसेमंद सिस्टम कैसे बनाने हैं. इससे जर्मन उत्पाद पर दुनिया का भरोसा बढ़ेगा और उन्हें बाजार में बढ़त मिलेगी.

क्रूगर ने आगे कहा कि अगर जर्मनी एक ऐसा बुनियादी ढांचा तैयार कर लेता है जो इतना भरोसेमंद हो कि कंपनियां अपना डेटा हमें सौंप सकें, तो इससे हमें वैश्विक बाजार में टिके रहने और मुकाबला करने में मदद मिलेगी.

तकनीक पर भरोसे और मजबूती को आधार बनाकर जर्मनी में एआई पर काफी निवेश किया जा रहा है. इसी का एक बड़ा उदाहरण सीमेंस और एनवीडिया की बढ़ती साझेदारी है, जिसका ऐलान सीईएस 2026 में किया गया. ये दोनों कंपनियां मिलकर इंडस्ट्रियल एआई ऑपरेटिंग सिस्टम तैयार कर रही हैं. साथ ही, सीमेंस अब कारखानों को ऑटोमैटिक बनाने वाले अपने हर प्लेटफॉर्म में एआई असिस्टेंट को भी शामिल कर रहा है.

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वहीं दूसरी ओर, बॉश कंपनी अपनी फैक्ट्रियों में मैन्युफैक्चरिंग क्वालिटी को और बेहतर करने के लिए एआई तकनीकों पर लगभग 2.9 अरब डॉलर खर्च कर रही है.

जर्मनी के अर्थव्यवस्था मंत्रालय का अनुमान है कि उद्योगों में बड़े पैमाने पर एआई को अपनाने से, इस साल से वार्षिक वास्तविक जीडीपी विकास दर में कम से कम एक फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है.

जोखिम से बचने की आदत बन सकती है बड़ी बाधा

इंडस्ट्रियल एआई में इतनी ज्यादा संभावना होने के बावजूद, जर्मनी के सामने एक पुरानी समस्या खड़ी है- जोखिम लेने से डरना. अक्सर यह शिकायत की जाती है कि जर्मनी के बड़े कारोबारी फैसले लेने में बहुत समय लगाते हैं और हिचकिचाते हैं. इसी वजह से जर्मनी में कई एआई प्रोजेक्ट्स सिर्फ ट्रायल तक ही सीमित रह जाते हैं और कभी पूरी तरह लागू नहीं हो पाते.

बीएमडब्ल्यू के एआई और डिजिटलाइजेशन लीड ईशांश गुप्ता ने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा, "जर्मन कंपनियां अक्सर अपने एआई प्रोडक्ट्स को बाजार में उतारने से पहले उन्हें बिल्कुल परफेक्ट बनाने की कोशिश करती हैं. इसके उलट, चीन और अमेरिका शुरुआती वर्जन ही लॉन्च कर देते हैं और फिर ग्राहकों से मिलने वाले सुझाव या शिकायत के आधार पर उनमें सुधार करते रहते हैं.”

बीएमडब्ल्यू के इस अधिकारी का मानना है कि इंडस्ट्रियल एआई तभी पूरी तरह से सफल होगा जब जर्मन कारोबारी इस तकनीक को अपना पूरा समर्थन देंगे. साथ ही, इसके लिए ऐसे एआई मॉडल्स की जरूरत होगी जो कॉजल इनसाइट उपलब्ध करा सकें, यानी ‘कारणों' की गहराई समझा सकें. बाजार के जानकारों का कहना है कि ऐसी स्थिति आने में अभी 5 साल तक का समय लग सकता है.

आज के एआई सिस्टम मुख्य रूप से विशाल डेटा में आंकड़ों का तालमेल बैठाकर काम करते हैं. वे पैटर्न और संबंधों को तो पहचान लेते हैं, लेकिन वे यह नहीं समझते कि कोई चीज ‘क्यों' हो रही है. इसी वजह से, कारखानों और पेचीदा औद्योगिक कामों में उनका इस्तेमाल सीमित हो जाता है.

भविष्य में, इंडस्ट्रियल एआई जर्मनी के मैन्युफैक्चरर्स को कारोबार के बड़े संकटों से निपटने में मदद कर सकता है. जैसे कि सामान की आपूर्ति में अचानक आने वाली दिक्कतें, बिजली और ईंधन की बदलती कीमतें, या नए उत्पाद को जल्दी मार्केट में उतारने की जरूरत.

गुप्ता ने एक उदाहरण देते हुए कहा, "मान लीजिए कि आप यह पता लगाना चाहते हैं कि पोलैंड में हुई किसी हड़ताल का आपकी सप्लाई चेन पर क्या असर पड़ेगा. कॉजल एआई मॉडल की मदद से कंपनी के अधिकारी घर बैठे यह पता लगा सकते हैं कि अगर वे आपूर्तिकर्ता बदल दें, काम को दूसरी फैक्ट्री में शिफ्ट कर दें या कर्मचारियों की ड्यूटी में बदलाव करें, तो उससे क्या नतीजा निकलेगा. वे यह आकलन कर सकते हैं कि उनके काम पर कितना असर पड़ेगा.”

चीन से मुकाबला करने में मददगार हो सकते हैं इंडस्ट्रियल एआई

जर्मनी की यह इंडस्ट्रियल एआई रणनीति एक ऐसे नाजुक मोड़ पर आई है जब देश की अर्थव्यवस्था संकट में है. जर्मनी न केवल वैश्विक स्तर पर एआई की रेस में पीछे छूट रहा है, बल्कि उसकी सबसे बड़ी ताकत मैन्युफैक्चरिंग भी चीन के मुकाबले तेजी से पिछड़ रही है.

दशकों तक चीन, जर्मन कंपनियों के लिए ‘सोने की खान' जैसा रहा, जिसने उन्हें न सिर्फ एक बहुत बड़ा बाजार दिया, बल्कि सस्ते और भरोसेमंद पुर्जे और कच्चा माल भी मुहैया कराया. लेकिन अब हालात बदल गए हैं. जर्मन सांख्यिकी एजेंसी ‘डेस्टैटिस' के मुताबिक, साल 2025 में चीन को होने वाला जर्मन निर्यात गिरकर 81.8 अरब यूरो रह गया है, जो पिछले 10 सालों में सबसे कम है.

यूरोपीय संघ के ‘यूरोस्टैट' के आंकड़ों के मुताबिक, 2022 के उच्च स्तर की तुलना में चीन को होने वाले जर्मन निर्यात में लगभग एक-चौथाई की गिरावट आई है. इसमें सबसे बड़ी गिरावट कारों की डिलीवरी में देखी गई है, जो 66 फीसदी तक कम हो गई है. इसके अलावा, जर्मन निर्माताओं को अपने अन्य प्रमुख विदेशी बाजारों में भी चीन से कड़ी टक्कर मिल रही है.

चीन के मामलों में विशेषज्ञ न्यूयॉर्क की रिसर्च संस्था ‘रोडियम ग्रुप' की इस महीने की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि बर्लिन यानी जर्मन सरकार को अब "कमान अपने हाथ में लेने की जरूरत है. उसे उद्योगों के साथ मिलकर लंबी अवधि की औद्योगिक और तकनीकी प्राथमिकताएं तय करनी चाहिए और उन्हें पूरा करने के लिए ठोस नीतियां बनानी चाहिए.”

मैर्त्स ने फंडिंग के साथ अपने सपने को पूरा किया

जर्मन चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स ने पिछले साल देश का हाई-टेक एजेंडा लॉन्च किया था, जिसमें 2029 तक 18 अरब यूरो की फंडिंग देने का वादा किया गया है. इस योजना में एआई को उन 6 खास तकनीकों में रखा गया है जिन्हें सरकार सबसे पहले विकसित करना चाहती है. अन्य पांच तकनीकें हैं- क्वांटम कंप्यूटिंग, माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स, बायोटेक, फ्यूजन और क्लाइमेट-न्यूट्रल मोबिलिटी.

पिछले महीने दावोस में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में एक भाषण में मैर्त्स ने कहा, "आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के लिए इंडस्ट्रियल स्केल की जरूरत होती है. जर्मनी के पास औद्योगिक डाटा का दुनिया का सबसे बड़ा भंडार है. यही कारण है कि हम हाई-परफॉर्मेंस एआई गीगाफैक्ट्री बना रहे हैं, डेटा सेंटर का विस्तार तेज कर रहे हैं और एक मजबूत एआई इकोनॉमी के लिए डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर रहे हैं.”

डॉयचे टेलीकॉम के मुताबिक, जर्मनी का नया इंडस्ट्रियल एआई क्लाउड अपनी क्षमता के एक-तिहाई से भी ज्यादा हिस्से पर काम करना शुरू कर चुका है. इस प्लेटफॉर्म से म्यूनिख की कंपनी ‘एजाइल रोबोट्स' जुड़ी है, जो एआई और रोबोटिक्स को साथ लाती है. साथ ही, फिजिक्स-एक्स भी इसका हिस्सा बनी है, जो टेक्निकल सिमुलेशन की विशेषज्ञ है और नए प्रोडक्ट्स बनाने के समय को कम करने में मदद करती है.

भले ही इंडस्ट्रियल एआई में जर्मनी की किस्मत बदलने की ताकत है, लेकिन डीएफकेआई के क्रूगर का मानना है कि शायद यह भी लंबी अवधि में मैन्युफैक्चरिंग में आ रही गिरावट को रोकने के लिए काफी न हो. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "अगले पांच से दस सालों में, अर्थव्यवस्था में औद्योगिक उत्पादन की बड़ी भूमिका तो रहेगी, लेकिन यह सबसे प्रमुख सेक्टर नहीं रह जाएगा. जर्मनी को धीरे-धीरे एक ‘सर्विस इकोनॉमी' में बदलना होगा, खासकर डिजिटल सेवाओं के क्षेत्र में.”

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