Afghanistan: तालिबान की अफगानिस्तान में एंट्री से चीन को होगा सीधा फायदा, जानें कैसे

अफगानिस्तान पर 1996 से 2001 तक शासन करने वाले तालिबान ने 15 अगस्त को एक बार फिर युद्धग्रस्त देश पर कब्जा कर लिया. तालिबान ने सैन्य बलों के साथ हफ्तों तक चले संघर्ष के बाद आखिरकार काबुल पर कब्जा कर लिया और उसका लगभग पूरे देश पर नियंत्रण स्थापित हो चुका है.

चीन का झंडा (Photo Credits: PTI)

नई दिल्ली, 24 अगस्त: अफगानिस्तान (Afghanistan) पर 1996 से 2001 तक शासन करने वाले तालिबान ने 15 अगस्त को एक बार फिर युद्धग्रस्त देश पर कब्जा कर लिया. तालिबान ने सैन्य बलों के साथ हफ्तों तक चले संघर्ष के बाद आखिरकार काबुल पर कब्जा कर लिया और उसका लगभग पूरे देश पर नियंत्रण स्थापित हो चुका है. तालिबान के उदय के साथ, एक कट्टर इस्लामी आतंकवादी आंदोलन के कारण अफगानिस्तान और पूरे दक्षिण एशिया पर भी एक गंभीर खतरा मंडरा रहा है.अफगानिस्तान पर तालिबान के अधिग्रहण ने वैश्विक नेताओं के बीच समस्या से निपटने और इस नए संगठन को हथियारों और आतंक के माध्यम से वैश्विक जिहाद का प्रचार करने से रोकने के लिए एक नई भावना को जन्म दिया है.

तमाम भविष्यवाणियां की जा रही हैं कि अफगानिस्तान से अमेरिका के हटने से चीन की क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिति पर आखिर क्या प्रभाव पड़ेगा. कुछ लोगों का तर्क है कि अमेरिकी सेना की वापसी से चीन और हिंद-प्रशांत पर ध्यान केंद्रित करने के लिए अमेरिकी संसाधनों को मुक्त कर दिया जाएगा. सैन्य वापसी चीन के लिए एक प्रकार से शोषण का एक मार्ग खोल रही है. अन्य कुछ लोग इस बात पर जोर दे रहे हैं कि ताइवान अब अधिक असुरक्षित है, क्योंकि बीजिंग ने अमेरिका के संकल्प और क्षमता को देख लिया है और उसमें कमी पाई है. इस मामले की पड़ताल करने के लिए, रेड लैंटर्न एनालिटिका ने मंगलवार को अमेरिकी टी पार्टी मूवमेंट के सह-संस्थापक माइकल जॉन्स से बातचीत की, जो अमेरिकी इतिहास का सबसे बड़ा जमीनी स्तर का राजनीतिक आंदोलन है. यूएस टी पार्टी आंदोलन ने अमेरिकी संविधान, सीमित सरकार और कम करों के पालन का समर्थन किया है और मोटे तौर पर 2010 में अमेरिकी प्रतिनिधि सभा, 2014 में अमेरिकी सीनेट में रिपब्लिकन जीत 2016 में डोनाल्ड ट्रंप की राजनीतिक जीत का नेतृत्व किया है.

माइकल जॉन्स एक प्रमुख अमेरिकी विदेश नीति विशेषज्ञ भी हैं और उन्होंने इससे पहले राष्ट्रपति जॉर्ज एच. डब्ल्यू बुश के लिए व्हाइट हाउस के राष्ट्रपति भाषण लेखक के रूप में कार्य किया है. इसके अलावा उन्होंने अमेरिकी सीनेट में एक वरिष्ठ सहयोगी के रूप में और न्यू जर्सी के पूर्व गवर्नर के तौर पर भी अपनी सेवाएं दी हैं. जॉन्स ने 'द यूएस एंड अफ्रीका स्टैटिस्टिकल हैंडबुक' पुस्तक लिखी है और द वॉल स्ट्रीट जर्नल, द क्रिश्चियन साइंस मॉनिटर, नेशनल रिव्यू और अन्य मीडिया हाउस के लिए लेख भी लिखे हैं.जॉन्स मियामी विश्वविद्यालय से स्नातक हैं, जहां उन्होंने अर्थशास्त्र में पढ़ाई की है. उन्होंने ब्रिटेन में कैंब्रिज विश्वविद्यालय के गोनविल एंड कैयस कॉलेज में विदेश में भी अध्ययन किया है. उनसे पूछा गया कि तालिबान शासन के पुनरुद्धार के बारे में वह क्या सोचते हैं, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर अमेरिका के नेतृत्व वाली उदार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को कमजोर कर सकता है, क्योंकि दुनिया का सबसे शक्तिशाली निरंकुश देश और मानवाधिकार उल्लंघनकर्ता चीन अब एक मुख्य भूमिका में आ गया है. यह भी पढ़े : ‘तालिबानी बयान’ पर केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर-मुख्तार अब्बास नकवी का पटलवार, महबूबा मुफ्ती को दिया करारा जवाब!

इस पर जॉन्स ने जवाब दिया कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) और तालिबान के बीच संबंध एक विकसित संबंध है, जिसे वर्तमान में कम आंका गया है. तालिबान मुद्दे में चीन की भूमिका वह है, जो काफी हद तक जांच के योग्य है. उन्होंने कहा कि सीसीपी और तालिबान के बीच यह संबंध अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा पैदा कर सकता है. उन्होंने आगे विस्तार से बताया कि तालिबान के पुनरुत्थान के संदर्भ में, कई लोगों की राय है कि तालिबान नीति में काफी बदलाव आया है, लेकिन यह सच नहीं है. तालिबान कभी नहीं बदल सकता. जॉन्स ने कहा कि वैश्विक जिहाद फैलाने का उनका इरादा और इसे हासिल करने के लिए वे जो क्रूरता करते हैं, वह वही है. इस प्रक्रिया में, उन्हें पाकिस्तान की आईएसआई से परिष्कृत मार्गदर्शन की पेशकश की जा रही है और सीसीपी द्वारा संरक्षण दिया जा रहा है.

यह तथ्य कि 9/11 की साजिश ओसामा बिन लादेन द्वारा रची गई थी और यह सच भी है, लेकिन उस समय तालिबान शासन द्वारा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इसे बहुत बढ़ावा दिया गया था, जिसने उसे सुरक्षित पनाहगाह की पेशकश की थी. तालिबान का उदय वास्तव में पाकिस्तान की भागीदारी से विकसित हुआ है. उसकी काबुल में ऐसी सरकार देखने की इच्छा के साथ ही उसना ऐसा किया. उन्होंने कहा कि इस प्रकार, सीसीपी को छोड़कर कोई भी सरकार तालिबान को मान्यता नहीं दे रही है और किसी को भी ऐसा नहीं करना चाहिए. यह पूछे जाने पर कि ब्रिटेन का करीबी सहयोगी होने के नाते, अमेरिका तालिबान को मान्यता देने के ब्रिटेन के फैसले की व्याख्या कैसे करता है. इस समूह द्वारा की गई अत्यधिक क्रूरता की ओर इशारा करते हुए, जॉन्स ने कहा कि इस समूह को कभी भी मान्यता नहीं दी जानी चाहिए. हालांकि, उन्होंने टिप्पणी की कि बोरिस जॉनसन ने कहा है कि उन्हें तालिबान के साथ बात करने की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन उनकी कोई यूके राजनयिक मान्यता नहीं बढ़ाई गई है (कम से कम अभी तक नहीं).

इस प्रक्रिया में चीन के दीर्घकालिक लक्ष्यों के बारे में पूछे जाने पर, जॉन्स ने कहा कि चीन अपनी पहचान के साथ सामने आया है और यह वास्तव में अमेरिका से आगे निकलने और विभिन्न क्षेत्रों में अपना एकाधिकार विकसित करने की एक आक्रामक योजना के साथ आगे बढ़ रहा है. मध्य एशिया पर हमेशा नियंत्रण रखना शी-जिनपिंग सरकार की योजना और नीति है. जॉन्स ने चीन की बेल्ट एंड रोड पहल का उदाहरण दिया, जिसकी दो योजनाओं को क्रियान्वित किया जाना है. पहला काबुल और पाकिस्तान के बीच यात्रा को सुविधाजनक बनाना, जो कि व्यापक परिवहन का हिस्सा होगा और दूसरा, अफगानिस्तान बहुत खनिज समृद्ध है और इसके प्रमुख संसाधन चीन के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं. उन्होंने कहा कि चीन धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है और अपने प्रभाव को व्यापक बनाने की कोशिश कर रहा है.

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