बेंगलुरु/चेन्नई, 13 जून: भारत में हजारों की संख्या में घरेलू महिलाएं (Housewives) और अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिक इन दिनों वैश्विक प्रौद्योगिकी कंपनियों के लिए डेटा का एक बड़ा नेटवर्क तैयार कर रहे हैं. ये लोग अपने दैनिक कार्यों जैसे फल काटना, कपड़े तह करना और घर को व्यवस्थित करने की गतिविधियों को रिकॉर्ड करते हैं. इस डेटा का उपयोग अगली पीढ़ी के एआई-संचालित ह्यूमनॉइड (AI-Powered Humanoid) (इंसान जैसे दिखने वाले) रोबोट्स को प्रशिक्षित करने के लिए किया जा रहा है. 'स्पेशल एआई' (Spatial AI)—जो मशीनों को त्रिविमीय यानी 3D स्पेस को समझने और उसमें काम करने की क्षमता देती है—के उभरते क्षेत्र ने भारत में डिजिटल श्रम का एक नया बाजार खोल दिया है.
रसोई से लेकर फैक्ट्रियों तक एआई की ट्रेनिंग
चेन्नई की रहने वाली 25 वर्षीय गृहिणी नागीरेड्डी श्रीरामचंद्र के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को सिखाना उनके दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुका है. वह अपने माथे पर स्मार्टफोन बांधकर घर के काम करती हैं और इसकी लाइव रिकॉर्डिंग एआई डेटा कंपनियों को भेजती हैं। इसके बदले उन्हें लगभग 250 रुपये प्रति घंटा मिलते हैं. इस काम पर वे कहती हैं, "सिर्फ घर के काम करने के लिए आखिर कौन आपको 250 रुपये प्रति घंटा देगा? हो सकता है कि भविष्य में मेरे पास खुद का एक रोबोट हो."
चैटबॉट्स और इमेज जेनरेटर के विपरीत, रोबोट्स को इंसानी गतिविधियों की नकल सिखाने के लिए 'ईगोसेंट्रिक डेटा' (Egocentric Data) यानी फर्स्ट-पर्सन विजुअल फुटेज की आवश्यकता होती है. इससे पता चलता है कि इंसानी हाथ वस्तुओं के साथ कैसे व्यवहार करते हैं. श्रीरामचंद्र ये वीडियो 'ऑब्जेक्टवेज' (Objectways) नामक कंपनी के ऐप पर अपलोड करती हैं, जिसके कार्यालय भारत और अमेरिका दोनों जगह हैं.
भारतीय कर्मचारी AI रोबोट को ट्रेनिंग दे रहे हैं; जानिए क्यों
The Indian workers training AI robots to take their jobs.
Paid to have a camera strapped to their foreheads, a growing army of thousands of AI system trainers in the world's most populous country are teaching machines how to move like humans in the real world – from folding… pic.twitter.com/Y7L6belJoc
— AFP News Agency (@AFP) June 11, 2026
बड़े पैमाने पर बढ़ रही है डेटा की मांग
वैश्विक स्तर पर इस तरह के फिजिकल डेटा की मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है. निवेश बैंक मॉर्गन स्टेनली के अनुमान के मुताबिक, साल 2050 तक दुनिया भर में औद्योगिक, वाणिज्यिक और घरेलू क्षेत्रों में एक अरब से अधिक ह्यूमनॉइड रोबोट काम कर रहे होंगे.
ऑब्जेक्टवेज के सीईओ रवि शंकर ने बताया कि वैश्विक ग्राहक कपड़े तह करने, कॉफी बनाने और सैंडविच तैयार करने जैसी विशिष्ट गतिविधियों के वीडियो मांगते हैं. उनका मानना है कि कुछ काम रोबोट्स को संभाल लेने चाहिए ताकि इंसान इससे बेहतर काम कर सकें. कंपनी के स्टूडियो में 21 वर्षीय इंजीनियरिंग ग्रेजुएट रानी एन. जैसी ट्रेनर दिनभर में करीब 90 वीडियो रिकॉर्ड करती हैं, जहां वे एक ही तौलिए को अलग-अलग एंगल से तह करने की प्रक्रिया को दोहराती हैं.
मोशन सेंसर और स्थानीय बोलियों की रिकॉर्डिंग
डेटा संग्रह का यह काम उप-ठेकेदारों के जरिए भारत के असंगठित क्षेत्रों में गहराई तक फैल चुका है. आंध्र प्रदेश की 'कनात कंसल्टिंग सर्विसेज' (Qanat Consulting Services) लगभग 2,000 योगदानकर्ताओं के नेटवर्क को संभालती है. कंपनी के सीईओ तस्लीम पट्टन के अनुसार, कुछ ट्रेनर्स की कलाई, हाथ और पैरों में मोशन-सेंसर बैंड भी बांधे जाते हैं ताकि उनके हिलने-डुलने की सटीक गतिज (Kinetic) जानकारी रिकॉर्ड की जा सके.
वहीं, बेंगलुरु की 'ह्यूमन लैब्स' (Humyn Labs) जैसी कंपनियां केवल वीडियो ही नहीं, बल्कि इंसानी आवाज और बातचीत के लहजे को भी रिकॉर्ड कर रही हैं. यहां क्षेत्रीय राजनीति से लेकर मनोरंजन जैसे विषयों पर स्थानीय चर्चाओं को रिकॉर्ड किया जाता है ताकि रोबोट्स स्थानीय बोलियों और संदर्भों को समझ सकें.
रोजगार के अवसर और भविष्य के जोखिम
भारत तेजी से वैश्विक स्तर पर डेटा लेबलिंग, प्रोसेसिंग और एनोटेशन का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है. बेंगलुरु स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन सेटलमेंट्स की डिजिटल लेबर विशेषज्ञ अदिति सूरी का कहना है कि आने वाले समय में इन सेवाओं में और बढ़ोतरी होगी.
हालांकि, इस तकनीकी विकास ने भविष्य में रोजगार छिनने की चिंताओं को भी जन्म दिया है। भारत सरकार के नीति आयोग (NITI Aayog) ने चेतावनी दी है कि मौजूदा बहसें केवल व्हाइट-कॉलर (कार्यालयी) नौकरियों के नुकसान पर केंद्रित हैं, जबकि देश के 49 करोड़ असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों पर पड़ने वाले प्रभाव की अनदेखी हो रही है. बेंगलुरु की सड़कों पर पिछले 10 साल से फूलों की माला बेचने वाली 55 वर्षीय पोन्नी ने भी हाल ही में सिर पर कैमरा पहनकर माला पिरोने की रिकॉर्डिंग के लिए पैसे लिए थे, लेकिन वे भविष्य को लेकर आशंकित हैं. पोन्नी का कहना है, 'जो अगली पीढ़ी हमारी तरह का शारीरिक श्रम करेगी, उनके सामने आने वाले समय में बड़ी समस्या खड़ी हो सकती है.'













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