मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का अहम फैसला: पति की आय साबित करने का पूरा जिम्मा पत्नी पर नहीं डाला जा सकता, कोर्ट ने गुजारा भत्ता बढ़ाया
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि भरण-पोषण के मामलों में पति की वास्तविक कमाई या आय को साबित करने का पूरा बोझ अकेले पत्नी पर नहीं डाला जा सकता. कोर्ट ने इसे सामाजिक कल्याण से जुड़ा कानून बताते हुए पत्नी और बच्चे का गुजारा भत्ता बढ़ा दिया है.
जबलपुर: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट (Madhya Pradesh High Court) ने वैवाहिक विवादों और भरण-पोषण के मामलों को लेकर एक दूरगामी और अत्यंत महत्वपूर्ण कूटनीतिक फैसला सुनाया है. हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कोई भी ट्रायल कोर्ट या फैमिली कोर्ट (पारिवारिक न्यायालय) भरण-पोषण की राशि तय करते समय पति की कुल आय या कमाई को साबित करने की पूरी जिम्मेदारी (Burden of Proof) अकेले पत्नी के कंधों पर नहीं डाल सकती.
न्यायालय ने कहा कि इस प्रकार का कड़ा दृष्टिकोण अपनाना न्यायसंगत नहीं है. इस टिप्पणी के साथ ही हाई कोर्ट ने महिला को गुजारा भत्ता देने का आदेश जारी किया और साथ ही उसके नाबालिग बच्चे के लिए पूर्व में स्वीकृत भरण-पोषण की राशि में कूटनीतिक रूप से उल्लेखनीय बढ़ोतरी (Enhancement) कर दी. यह भी पढ़ें: HC on Husband Wife and DNA Test: बच्चे की पितृत्व पर सवाल उठाना और पत्नी पर DNA टेस्ट का दबाव बनाना मानसिक क्रूरता: मद्रास हाईकोर्ट
धारा 125 CrPC एक सामाजिक कल्याणकारी प्रावधान
इस मामले की सुनवाई करते हुए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के एकल पीठ के न्यायाधीश जस्टिस गजेंद्र सिंह ने कानून के मूल उद्देश्यों को रेखांकित किया. उन्होंने स्पष्ट किया कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 [अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 144] के तहत की जाने वाली कानूनी कार्रवाई पूरी तरह से एक सामाजिक कल्याणकारी प्रावधान (Social Welfare Proceeding) है.
जस्टिस गजेंद्र सिंह की महत्वपूर्ण टिप्पणी: "भरण-पोषण से जुड़े कानूनों का मुख्य उद्देश्य पीड़ित पत्नी, बच्चों या बुजुर्ग माता-पिता को भुखमरी, बेसहारापन और कंगाली के दलदल से बचाना है। यह कोई विशुद्ध दीवानी (Civil) मुकदमा नहीं है जहां सबूतों का तराजू बेहद तकनीकी हो. चूंकि पत्नियां अक्सर पतियों की वास्तविक व्यावसायिक आय और गुप्त संपत्तियों के दस्तावेजों तक सीधी पहुंच नहीं रखतीं, इसलिए ट्रायल कोर्ट को यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि पत्नी ही पति की पाई-पाई की कमाई का दस्तावेजी सबूत लाकर दे."
पति की आय साबित करने का पूरा जिम्मा पत्नी पर नहीं डाला जा सकता
Trial Court Can't Place Entire Burden Of Proving Husband's Income On Wife: MP High Court Grants Maintenance#Marriage #Maintenance https://t.co/5u6hM5bUbW
— Live Law (@LiveLawIndia) July 6, 2026
पति का कर्तव्य है कि वह अपनी सही आय कोर्ट को बताए
हाई कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि जब पत्नी यह प्राथमिक तौर पर साबित कर देती है कि वह खुद का खर्च उठाने में असमर्थ है और उसका पति पर्याप्त संसाधनों और साधनों (Sufficient Means) से संपन्न है, तो उसके बाद अपनी वास्तविक आय (Actual Net Income) का सही ब्योरा अदालत के सामने पेश करना खुद पति का कानूनी और नैतिक दायित्व बन जाता है.
अदालत ने पाया कि संबंधित मामले में निचली अदालत (Trial Court) ने सबूतों के अभाव का हवाला देकर पत्नी के दावे को कूटनीतिक रूप से कमजोर मान लिया था और पूरी जिम्मेदारी महिला पर ही मढ़ दी थी, जो कि पूरी तरह से कानून की भावना के विपरीत था.
सम्मान के साथ जीने का अधिकार ही वास्तविक भरण-पोषण
हाई कोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न कूटनीतिक नजीरों का हवाला देते हुए दोहराया कि 'भरण-पोषण' का अर्थ केवल जीवित रहने के लिए महज दो वक्त की रोटी या बुनियादी भोजन मुहैया कराना नहीं है.
इसके अंतर्गत पत्नी और बच्चों को उसी जीवन स्तर (Standard of Living) और गरिमा के साथ समाज में रहने का पूरा अधिकार शामिल है, जिसका आनंद उनका पति उठा रहा है. बढ़ती महंगाई, जीवन यापन की लागत और नाबालिग बच्चों की शिक्षा की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के पुराने आदेश को संशोधित किया और पीड़ित परिवार के पक्ष में बढ़ी हुई राहत राशि तत्काल प्रभाव से लागू करने का निर्देश दिया.
(The above story first appeared on LatestLY on Jul 06, 2026 06:54 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

