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शरीर के एक प्रोटीन से होगा हड्डी रोगों का पूरा इलाज

उम्र बढ़ने के साथ ही शरीर की हड्डियां कमजोर होने से ऑस्टियोपोरोसिस और ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी बीमारियां घेर लेती हैं.

शरीर के एक प्रोटीन से होगा हड्डी रोगों का पूरा इलाज
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

उम्र बढ़ने के साथ ही शरीर की हड्डियां कमजोर होने से ऑस्टियोपोरोसिस और ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी बीमारियां घेर लेती हैं. इससे निजात दिलाने के लिए वैज्ञानिकों ने शरीर के ही एक प्रोटीन से दवा बनाने पर रिसर्च की है.जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, वैसे-वैसे ही शरीर में कई बीमारियां घर करना शुरू कर देती हैं. महिलाओं के लिए ये मसला थोड़ा और पेचीदा हो जाता है क्योंकि उन्हें मेनोपॉज, हड्डियों की कमजोरी और कई अन्य परेशानियों से लगातार जूझना पड़ता है. इन्हीं परेशानियों में ऑस्टियोपोरोसिस और ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी बीमारियां भी हैं, जो पुरुषों से ज्यादा महिलाओं को परेशान करती हैं. ये दुनिया के सबसे आम और गंभीर हड्डी और जोड़ रोगों में शामिल है. इसके निदान के लिए अब वैज्ञानिकों ने शरीर के ही एक प्रोटीन से इसकी दवा बनाने का जतन किया है.

भारत की वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की लखनऊ में स्थित प्रयोगशाला सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीडीआरआई) के शोधकर्ताओं ने एम्स नई दिल्ली और आईआईटी खड़गपुर संस्थानों के साथ मिलकर दो छोटी प्रोटीन-आधारित दवाएं (पेप्टाइड्स) विकसित की हैं. सीडीआरआई में कार्यरत रहे डॉ. नैबेद्य चट्टोपध्याय इस शोध के प्रमुख वैज्ञानिक हैं. उनके साथ शिवानी शर्मा, चिराग कुलकर्णी समेत कई अन्य वैज्ञानिक भी इस रिसर्च का हिस्सा हैं. डॉ. नैबेद्य बताते हैं कि ये पेप्टाइड्स ऑस्टियोपोरोसिस और ऑस्टियोआर्थराइटिस के इलाज को काफी आसान बना सकते हैं.

प्रयोगशाला और पशु परीक्षणों में ये नई पेप्टाइड थेरेपी काफी सुरक्षित और प्रभावी साबित हुई हैं. विशेषज्ञों को इससे भविष्य में इन जटिल बीमारियों के इलाज में काफी संभावनाएं नजर आ रही हैं.

हड्डी और जोड़ों के रोग की बढ़ती समस्या

एम्स नई दिल्ली के बॉयोटेक्नोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. रूपेश श्रीवास्तव बताते हैं कि ऑस्टियोपोरोसिस की बीमारी में हड्डियां कमजोर और भुरभुरी हो जाती हैं. इससे फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है. मेनोपॉज के बाद महिलाओं और गुर्दे की बीमारी वाले मरीजों को यह काफी प्रभावित करता है.

आंकड़ों की बात करें तो दुनिया में लगभग 20 करोड़ लोग ऑस्टियोपोरोसिस से ग्रस्त हैं. भारत में ऑस्टियोपोरोसिस और ऑस्टियोआर्थराइटिस दोनों ही रोगों में महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में अधिक है. 50 वर्ष की उम्र के बाद 60 से 70 फीसदी महिलाओं में ऑस्टियोआर्थराइटिस के मामले देखने को मिलते हैं जबकि पुरुषों में ये मामले महज 40 फीसदी तक सामने आते हैं. खासकर रजोनिवृत्ति (मेनोपॉज) के बाद की महिलाओं और बुजुर्गों में इन रोगों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.

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इसके अलावा ऑस्टियोआर्थराइटिस की बीमारी मुख्य रूप से अधिक उम्र वाले लोगों या बुजुर्गों पर असर डालती है. इसके कारण मरीजों में विकलांगता होने का खतरा भी बना रहता है. इसमें जोड़ की कार्टिलेज धीरे-धीरे घिस जाती है, जिससे दर्द, अकड़न, सूजन और चलने-फिरने में कठिनाई होती है. डॉ. श्रीवास्तव कहते हैं, "वर्तमान में दोनों बीमारियों के लिए पूरी तरह से ठीक होने वाला इलाज नहीं मिल सका है. कुछ दवाएं हड्डी की मजबूती बढ़ाती तो हैं, लेकिन फ्रैक्चर को पूरी तरह रोक नहीं पातीं."

कई शोधों में कुछ नई दवाएं भी ईजाद की गई हैं जो हड्डी को मजबूत तो करती हैं, पर साथ ही उनके साइड-इफेक्ट दिल की बीमारी तक पैदा कर सकते हैं. ये दवाएं भी सीमित समय तक ही असर करती हैं. डॉ. नैबेद्य चट्टोपध्याय बताते हैं कि ऑस्टियोआर्थराइटिस के लिए बनी अब तक की कोई दवा रोग को उलट या ठीक नहीं कर सकती. अधिकांश उपचार केवल दर्द कम करते हैं, जोड़ों में आई कमजोरी या फ्रैक्चर के कारण हुए नुकसान को नहीं रोकते इसलिए अधिक प्रभावी और सुरक्षित उपचार की काफी जरूरत है.

शरीर का ही एक प्रोटीन निभाएगा दो भूमिकाएं

शोधकर्ताओं ने 'स्क्लेरॉस्टिन' नामक प्राकृतिक प्रोटीन पर रिसर्च की. ये हड्डी की कोशिकाओं से बनता है. इसके बारे में डॉ. चट्टोपध्याय ने डीडब्ल्यू को बताया, "ये दो अलग-अलग काम करता है. पहला, यह हड्डी बनने की प्रक्रिया को धीमा करता है जिससे ऑस्टियोपोरोसिस में हड्डियां कमजोर पड़ती हैं. दूसरा, हड्डी में होने वाली असामान्य वृद्धि को ये रोकता है और कार्टिलेज को बचाता है. इससे ऑस्टियोआर्थराइटिस की परेशानी कम होती है."

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डॉ. चट्टोपध्याय ने रिसर्च में पाया कि स्क्लेरॉस्टिन के अलग-अलग हिस्से इन प्रभावों के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं. यदि इन्हें अलग कर दोबारा बनाया जाए तो कई रोगों के इलाज में उपयोग किया जा सकता है. उन्होंने बताया कि रिसर्च की आधुनिक तकनीकों से तीन छोटे पेप्टाइड बनाए गए. इनके नाम SC-1, SC-2 और SC-3 रखा गया. रिसर्च में दो पेप्टाइड्स का असर अधिक देखने को मिला. डॉ. चट्टोपध्याय बताते हैं कि ऑस्टियोपोरोसिस के लिए SC-1 पेप्टाइड ज्यादा असरदार रहा. इसने स्क्लेरॉस्टिन के हानिकारक प्रभावों को रोकने के साथ-साथ हड्डी को बढ़ाने का काम किया. साथ ही मजबूती को भी बढ़ाया. इस पेप्टाइड से हड्डी की संरचना में भी सुधार आया.

उसके अलावा रिसर्च में एक अन्य पेप्टाइड SC-3 का परिणाम ऑस्टियोआर्थराइटिस के लिए काफी सकरात्मक रहा. डॉ. नैबेद्य ने बताया कि हमारी रिसर्च में ये पेप्टाइड स्क्लेरॉस्टिन के सुरक्षात्मक पहलुओं को सामने लेकर आता है. साथ ही जोड़ों में होने वाले नुकसान को भी कम करता है. SC-3 पेप्टाइड हड्डी के असामान्य बढ़ाव को रोकते हुए कार्टिलेज को बचाता है.

कमजोर हड्डियों की कैसे मदद कर रहे पेप्टाइड

डॉ. चट्टोपध्याय बताते हैं कि मेनोपॉज की स्थिति और गुर्दे की बीमारी के कारण हड्डियों को होने वाले नुकसान पर SC-1 की स्थिति जानने के लिए एनिमल टेस्टिंग की गई. इसमें पता चला कि इस पेप्टाइड के उपयोग से हड्डियों की डेन्सिटी यानी घनत्व बढ़ा, हड्डी की संरचना में सुधार आया, हड्डियां मजबूत हुईं और टूटने की आशंका में भी कमी आंकी गई. डॉ. चट्टोपध्याय कहते हैं, "हमारी रिसर्च में गुर्दे की बीमारी वाले जानवरों पर इसका परीक्षण करने पर पता चला कि इससे हड्डी का स्वास्थ्य और गुर्दे की कार्यक्षमता दोनों में काफी सुधार आया. एक खास बात ये भी है कि SC-1 पेप्टाइड छोटा और सरल है, इसलिए अन्य इलाज के तरीकों की तुलना में इससे दवा बनाना काफी सस्ता और आसान है."

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ऑस्टियोआर्थराइटिस के लिए बेहतर परिणाम देने वाले पेप्टाइड SC-3 को रिसर्च के दौरान उन जोड़ों में परखा गया जिनमें चोट लगी थी या सर्जरी के दैरान क्षतिग्रस्त हुए थे. वैज्ञानिकों को इसके काफी बेहतर परिणाम देखने को मिले. डॉ. चट्टोपध्याय ने बताया कि इस पेप्टाइड के उपयोग से कार्टिलेज को काफी फायदा हुआ. उनके टूटने में कमी आई. इसके अलावा जोड़ों के आसपास अनचाही अतिरिक्त हड्डी बनने से भी इस पेप्टाइड ने रोका. इसके अलावा कार्टिलेज के नीचे की हड्डी में संतुलन भी बेहतर हुआ.

डॉ. चट्टोपध्याय ने बताया कि कई बार हड्डियों को मजबूती देने वाली दवाओं को कई सप्ताह तक सीधे जोड़ में इंजेक्शन दिया जाता है. इस पेप्टाइड की दवा का असर कई हफ्तों के इंजेक्शनों से ज्यादा असरदार साबित हुआ. उनका कहना है कि शरीर के अंदर इन पेप्टाइड्स का काम काफी प्रभावी रहा. इन पेप्टाइड्स ने जोड़ों को अकड़ने और दर्द से बचाया, साथ ही प्राकृतिक कुशनिंग यानी हड्डी की सुरक्षा को भी सुनिश्चित किया.

क्यों अधिक सुरक्षित है ये इलाज

डॉ. चट्टोपध्याय का कहना है कि अभी मौजूद दवाएं अक्सर महत्वपूर्ण प्रोटीन को पूरी तरह रोक देती हैं. जिससे गंभीर दुष्प्रभाव होते हैं. इसके उलट ये पेप्टाइड्स दवाओं के तौर पर संतुलित तरीके से और कमजोर जगह पर पहुंच कर काम करते हैं. इसके चलते इम्यूनिटी कमजोर नहीं होने पाती. इसके अलावा इलाज के दौरान इन पेप्टाइड्स से तैयार हुई दवा लंबे समय तक और व्यापक रूप से उपयोग करना संभव है. वह कहते हैं, "इस रिसर्च में अब तक का हर ट्रायल सफल रहा है. रिसर्च का अगला कदम ह्यूमन ट्रायल यानी मानव क्लिनिकल परीक्षण है. इसके जरिए इस दवा की सुरक्षा और प्रभावशीलता सुनिश्चित की जा सकती है."

आयु बढ़ने के साथ-साथ हड्डी और जोड़ के रोग तेजी से बढ़ रहे हैं. भारत में ये चुनौती और गंभीर है क्योंकि बढ़ती जनसंख्या में बुजुर्गों की संख्या भी अधिक हो रही है. इसके साथ ही मधुमेह (डायबिटीज) और गुर्दे की बीमारी के मामले बढ़ रहे हैं. ये रोग हड्डी स्वास्थ्य को और ज्यादा बिगाड़ते हैं. इस लिहाज से इन पेप्टाइड्स से बनी दवाएं अगर ह्यूमन ट्रायल में सफल हो जाती हैं तो ये नई पेप्टाइड थेरेपी लाखों मरीजों का जीवन सुधार सकती हैं.” इसके अलावा ये दवाएं इलाज को सस्ता बना सकती हैं और हड्डी और जोड़ चिकित्सा के अनुसंधान में भारत को अग्रणी बना सकती हैं.

डॉ. चट्टोपध्याय का कहना है कि रिसर्च का मानव परीक्षण सफल हुआ तो SC-1 और SC-3 दुनिया की पहली ऐसी दवाएं बन सकती हैं जो हड्डियों के नुकसान और फ्रैक्चर दोनों के लिए अचूक बाण का काम करेगी. वह कहते हैं, "ये दवाएं शरीर के प्राकृतिक प्रोटीन पर आधारित हैं, इसलिए इनमें इम्यूनिटी के दबने या हृदय-सम्बंधी गंभीर साइड-इफेक्ट का खतरा बहुत कम पाया गया. हमारी इस रिसर्च के सकरात्मक परिणाम लाइलाज कही जाने वाले ऑस्टियोपोरोसिस और ऑस्टियोआर्थराइटिस बीमारियों से पीड़ित लोगों के लिए नई उम्मीद लेकर आएंगे."

(The above story first appeared on LatestLY on Feb 02, 2026 07:40 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).