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What Is Virtual Autism: ज्यादा स्क्रीन टाइम से बच्चों में दिखने लगे ऑटिज्म जैसे लक्षण? जानिए क्या है 'वर्चुअल ऑटिज्म', इसके लक्षण और डॉक्टर की राय

स्मार्टफ़ोन, टैबलेट और टीवी स्क्रीन के अत्यधिक संपर्क के कारण छोटे बच्चों में बोलने में देरी, आई-कॉन्टैक्ट में कमी और सामाजिक अलगाव जैसे लक्षण तेजी से बढ़ रहे हैं, जिसे चिकित्सा जगत में अनौपचारिक रूप से 'वर्चुअल ऑटिज्म' कहा जा रहा है. बाल रोग विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि 'वर्चुअल ऑटिज्म' कोई आधिकारिक मेडिकल डायग्नोसिस नहीं है, बल्कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम के कारण भाषा और भावनात्मक विकास में आने वाली रुकावट है.

What Is Virtual Autism: ज्यादा स्क्रीन टाइम से बच्चों में दिखने लगे ऑटिज्म जैसे लक्षण? जानिए क्या है 'वर्चुअल ऑटिज्म', इसके लक्षण और डॉक्टर की राय
What Is Virtual Autism? (Photo Credits: LatestLY)

नई दिल्ली: स्मार्टफोन और डिजिटल उपकरणों के बढ़ते चलन के बीच बाल स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बच्चों के न्यूरोलॉजिकल और सामाजिक विकास को लेकर गंभीर चिंता जताई है. कोरोना महामारी के बाद से दो से चार साल के बच्चों में बोलने में देरी (स्पीच डिले), नजरें न मिलाना और सामाजिक रूप से अलग-थलग रहने जैसे लक्षण बड़े पैमाने पर देखे जा रहे हैं.

चिकित्सा जगत में इस स्थिति को अनौपचारिक रूप से 'वर्चुअल ऑटिज्म' (Virtual Autism) नाम दिया जा रहा है. हालांकि, वरिष्ठ डॉक्टरों और बाल मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि यह कोई स्वीकृत मेडिकल विकार नहीं है, बल्कि अत्यधिक स्क्रीन एक्सपोजर और वास्तविक मानवीय संवाद की कमी का एक विकासात्मक दुष्परिणाम है. यह भी पढ़ें: Delhi H1N1 Surge: दिल्ली में स्वाइन फ्लू के मामलों में भारी उछाल, आंकड़ा 1,777 तक पहुंचा; जानिए लक्षण, जोखिम और रोकथाम के उपाय

क्या है 'वर्चुअल ऑटिज्म' और यह वास्तविक ऑटिज्म से कैसे अलग है?

रोमानियाई मनोवैज्ञानिक डॉ. मारियस जैमफिर द्वारा पहली बार इस्तेमाल किए गए इस शब्द का उपयोग उन बच्चों के लिए किया जाता है, जो अत्यधिक डिजिटल स्क्रीन देखने के बाद ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) जैसे लक्षण प्रदर्शित करने लगते हैं:

  • ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD): यह एक आजीवन रहने वाली न्यूरोडेवलपमेंटल स्थिति है, जिसके पीछे आनुवंशिक (जेनेटिक) और न्यूरोलॉजिकल कारण मुख्य होते हैं.
  • वर्चुअल ऑटिज्म: यह पूरी तरह से वातावरणीय कारकों (Environmental Factors) से प्रेरित व्यवहार संबंधी समस्या है. जब बच्चों का स्क्रीन टाइम शून्य या सीमित कर दिया जाता है और उनके साथ बातचीत बढ़ाई जाती है, तो ये लक्षण अक्सर ठीक (Reversible) हो जाते हैं.
  • डॉक्टरों का स्पष्ट कहना है कि किसी भी बच्चे को केवल स्क्रीन देखने के आधार पर ऑटिस्टिक मान लेना अनुचित है; इसके लिए गहन चिकित्सीय परीक्षण अनिवार्य है.

वर्चुअल ऑटिज़्म का खतरा बढ़ा

 

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स्क्रीन का दिमाग पर असर: शुरुआती सालों में क्यों बिगड़ता है विकास?

जन्म के पहले तीन साल बच्चे के मस्तिष्क के विकास के लिए सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण माने जाते हैं:

  • दोतरफा संवाद का अभाव: स्क्रीन केवल एकतरफा (Passive) दृश्य और आवाज प्रदान करती है.  बच्चे जब माता-पिता के चेहरे के हाव-भाव, आवाज के उतार-चढ़ाव और शारीरिक स्पर्श के बिना बड़े होते हैं, तो उनका भाषाई विकास रुक जाता है.
  • ओवरस्टिम्यूलेशन: तेज गति से बदलते कार्टून और वीडियो बच्चों के अविकसित तंत्रिका तंत्र (Nervous System) को अत्यधिक उत्तेजित कर देते हैं, जिससे उनका ध्यान केंद्रित करने का दायरा घट जाता है और वे वास्तविक दुनिया से ऊबने लगते हैं.
  • सेंसरी अनुभवों की कमी: छूने, भागने-दौड़ने और खिलौनों के साथ खेलने के बजाय स्क्रीन पर अंगुलियां चलाने से बच्चों का मोटर स्किल विकास प्रभावित होता है.

सरकारी हस्तक्षेप केंद्रों (DEIC) की स्थिति और विशेषज्ञ स्टाफ की कमी

दिल्ली, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र के जिला प्रारंभिक हस्तक्षेप केंद्रों (District Early Intervention Centres - DEIC) की समीक्षा में विकासात्मक विकारों के मामलों में उछाल दर्ज किया गया है.

  • उदाहरण के लिए, भोपाल के डीईआईसी में अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच ऑटिज्म जैसे लक्षणों वाले 31 बच्चे पहुंचे, जिनमें से एक मामले में अत्यधिक स्क्रीन टाइम को प्राथमिक कारण माना गया.
  • समीक्षा रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि कई सरकारी केंद्रों पर स्पीच थेरेपिस्ट, ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट और क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट के पद रिक्त हैं, जिससे समय पर जांच और निरंतर थेरेपी सत्र आयोजित करने में चुनौतियां आ रही हैं.

माता-पिता किन संकेतों पर रखें नजर?

यदि आपका बच्चा निम्नलिखित में से किसी भी लक्षण को लंबे समय तक प्रदर्शित कर रहा है, तो तुरंत पेशेवर सलाह लेनी चाहिए:

  • नाम पुकारने पर कोई प्रतिक्रिया या ध्यान न देना.
  • उम्र के अनुसार शब्द न बोल पाना या अचानक पहले सीखे हुए शब्दों को बोलना बंद कर देना.
  • आंखों से संपर्क (Eye Contact) चुराना और अकेले रहने को प्राथमिकता देना.
  • मोबाइल या रिमोट छीनने पर अत्यधिक आक्रामक होना, चीखना या रोना.
  • सहपाठियों या परिवार के सदस्यों के साथ खेलने और घुलने-मिलने में झिझक.

प्रारंभिक हस्तक्षेप और पेरेंटिंग गाइडलाइंस

स्वास्थ्य दिशा-निर्देशों के अनुसार, 2 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए किसी भी प्रकार का स्क्रीन टाइम पूरी तरह प्रतिबंधित होना चाहिए. बड़े बच्चों के लिए भी इसे सीमित और अभिभावक की निगरानी में रखा जाना चाहिए.

समाधान केवल मोबाइल फोन छीन लेने में नहीं है, बल्कि उस समय को सार्थक गतिविधियों में बदलने में है. बच्चों को किताबें पढ़कर सुनाना, उनके साथ खुले मैदान में आउटडोर खेल खेलना, रसोई या घर के कामों में शामिल करना और उनसे निरंतर बातचीत करना ही उनके मानसिक और सामाजिक विकास का सबसे प्राकृतिक और प्रभावी उपचार है. यदि विकासात्मक देरी बनी रहती है, तो बिना देर किए पीडियाट्रिशियन और डेवलपमेंटल थेरेपिस्ट से संपर्क करना चाहिए.

(The above story first appeared on LatestLY on Sep 21, 2026 05:39 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).