Mahashivratri 2026: शिव-शक्ति के मिलन का महापर्व ‘महाशिवरात्रि’ 15 फरवरी को; जानें निशिता काल मुहूर्त और चार प्रहर की पूजा का समय

साल 2026 में महाशिवरात्रि का त्योहार 15 फरवरी को मनाया जाएगा. इस लेख में जानें पूजा के शुभ मुहूर्त, निशिता काल का समय, चार प्रहर की पूजा की समय सारणी और इस पर्व का धार्मिक महत्व.

महाशिवरात्रि 2026 (Photo Credits: File Image)

मुंबई: देवों के देव महादेव के भक्तों को हर साल महाशिवरात्रि का बेसब्री से इंतजार रहता है. हिंदू कैलेंडर के सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र त्योहारों में से एक, महाशिवरात्रि (Maha Shivratri), इस साल रविवार, 15 फरवरी 2026 को दुनिया भर में धूमधाम से मनाई जाएगी. 'शिव की महान रात्रि' के रूप में जाना जाने वाला यह पर्व फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को पड़ता है. ज्योतिषीय गणना के अनुसार, इस वर्ष शिव-शक्ति के मिलन का महापर्व ‘महाशिवरात्रि श्रवण नक्षत्र के विशेष संयोग में मनाया जाएगा, जिसे आध्यात्मिक साधना और ध्यान के लिए अत्यंत फलदायी माना जा रहा है. यह भी पढ़ें: Maghi Ganesh Jayanti 2026: माघी गणेश जयंती 22 या 23 जनवरी को? जानें सही तारीख, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व

महाशिवरात्रि 2026: शुभ मुहूर्त और पूजा का समय

हिंदू पंचांग के अनुसार, महाशिवरात्रि की पूजा के लिए चतुर्दशी तिथि का समय अत्यंत महत्वपूर्ण होता है. मुख्य अनुष्ठान 15 फरवरी की रात से शुरू होकर 16 फरवरी की सुबह तक चलेंगे.

महत्वपूर्ण तिथियां और समय (15-16 फरवरी, 2026):

चार प्रहर की पूजा की समय सारणी

जो श्रद्धालु रात भर जागकर चारों प्रहर की पूजा करना चाहते हैं, उनके लिए समय इस प्रकार है:

पौराणिक इतिहास और महत्व

महाशिवरात्रि से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं. शिव पुराण के अनुसार, इसी दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था, जो चेतना और शक्ति के मिलन का प्रतीक है. एक अन्य मान्यता के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान निकले हलाहल विष को शिव ने इसी दिन अपने कंठ में धारण कर सृष्टि की रक्षा की थी, जिससे वे 'नीलकंठ' कहलाए. भक्त इसी कृतज्ञता को प्रकट करने के लिए यह महापर्व मनाते हैं.

पूजा विधि और परंपराएं

महाशिवरात्रि का पर्व अनुशासन और आत्म-चिंतन का प्रतीक है। इस दिन श्रद्धालु निम्नलिखित परंपराओं का पालन करते हैं:

आध्यात्मिक दृष्टिकोण

खगोलीय रूप से माना जाता है कि महाशिवरात्रि की रात पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में ग्रहों की स्थिति ऐसी होती है कि मानव शरीर में ऊर्जा का संचार प्राकृतिक रूप से बढ़ जाता है. यह समय अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाने और कर्म चक्रों से मुक्ति पाने के लिए सबसे शक्तिशाली माना जाता है.

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