Kullu Dussehra 2019: हिमाचल प्रदेश में कुल्लू दशहरा की हुई शानदार शुरुआत, 14 अक्टूबर को होगा इस उत्सव का समापन, जानिए इसका महत्व

जब देश के बाकी हिस्सों में दशहरा खत्म हो जाता है, तब हिमाचल प्रदेश के कुल्लू स्थित ढालपुर मैदान में विश्व प्रसिद्ध कुल्लू दशहरा उत्सव की शुरुआत होती है. यहां यह उत्सव 8 अक्टूबर से शुरू हुआ है और समापन 14 अक्टूबर को किया जाएगा. इस उत्सव का आयोजन 17वीं शताब्दी से किया जा रहा है.

कुल्लू दशहरा 2019 (Photo Credits: ANI)

Kullu Dussehra 2019: हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) के कुल्लू (Kullu) स्थित ठारा करडु की सौह यानी ढालपुर मैदान (Dhalpur Ground) में मंगलवार (8 अक्टूबर) से अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा (Kullu Dussehra) का शानदार आगाज हो चुका है. आस्था, श्रद्धा और एकता का प्रतीक कहे जाने वाले इस महाकुंभ को देखने के लिए दुनियाभर से लोग जुट रहे हैं. यहां इस दशहरा उत्सव (Dussehra Utsav) का आयोजन 17वीं सदी से लगातार किया जा रहा है, जो करीब एक हफ्ते तक पूरे जोश और उत्साह के साथ मनाया जाता है. खास बात तो यह है कि जब देश के बाकी हिस्सों में दशहरा खत्म हो जाता है, तब यहां विश्व प्रसिद्ध कुल्लू दशहरा उत्सव की शुरुआत होती है. यह उत्सव 8 अक्टूबर से शुरू हुआ है और समापन 14 अक्टूबर को किया जाएगा.

कुल्लू दशहरा उत्सव का शुभारंभ हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल बंदारू दत्तात्रेय ने किया और भगवान रघुनाथ जी की रथ यात्रा में भी शामिल हुए. बताया जा रहा है कि 14 अक्टूबर को इस उत्सव के समापन समारोह में राज्य के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर भी शामिल होंगे.

कुल्लू दशहरा उत्सव की शानदार शुरुआत-

कुल्लू दशहरा उत्सव का महत्व

कुल्लू दशहरा का यह उत्सव बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है. यहां यह उत्सव लंकापति रावण की हार और श्रीराम की जीत का जश्न मनाने के लिए आयोजित किया जाता है. प्रचलित पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक साधु की सलाह पर राजा जगत सिंह ने कुल्लू में भगवान रघुनाथ की प्रतिमा की स्थापना की. उन्होंने श्रीराम के राज्य अयोध्या से एक प्रतिमा लाकर कुल्लू में रघुनाथ जी की स्थापना करवाई थी. कहा जाता है कि राजा जगत सिंह किसी असाध्य बीमारी से पीड़ित थे, जिससे मुक्ति पाने के लिए एक ब्राह्मण ने उन्हें रघुनाथ जी की स्थापना करने की सलाह दी थी. यह भी पढ़ें: Dussehra 2019: पीएम मोदी ने दिल्ली के द्वारका में किया रावण का दहन, लोगों ने लगाए 'जय श्री राम' के नारे, देखें वीडियो  

एक अन्य प्रचलित कथा के अनुसार, 16वीं शताब्दी में जब राजा जगत सिंह को पता चला कि मणिकर्ण के एक गांव में दुर्गादत्त नाम के ब्राह्मण के पास बेशकीमती मोती है तो राजा के मन में उस बहुमूल्य रत्न को पाने का लालच जाग गया. उन्होंने अपने सैनिकों को उस ब्राह्मण से वो रत्न लाने का आदेश दिया. राजा के सैनिक उस ब्राह्मण को कई तरह की यातनाएं देते हैं. आखिर में इन यातनाओं से मुक्त होने के लिए दुर्गादत्त ने अपने परिवार के साथ आत्महत्या कर ली, लेकिन मरने से पहले उसने राजा को श्राप दिया कि राजा जब भी चावल खाएंगे, उन्हें चावल कीड़े के रूप में दिखाई देंगे और पानी रक्त की तरह दिखाई देगा. इस श्राप के बाद से राजा का स्वास्थ्य खराब होने लगा था.

इस श्राप से मुक्ति पाने के लिए राजा एक ब्राह्मण से संपर्क करते हैं तो वह ब्राह्मण उन्हें भगवान रघुनाथ जी की प्रतिमा लगवाने को कहता है. रघुनाथ जी प्रतिमा को कुल्लू में स्थापित करने के बाद राजा का स्वास्थ्य ठीक होने लगता है और उसे श्राप से मुक्ति मिलती है. कहा जाता है कि राजा ने खुद को भगवान रघुनाथ जी के लिए समर्पित कर दिया और तब से यहां हर साल कुल्लू दशहरा का उत्सव बहुत धूमधाम से मनाया जाता है.

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