What is Bhondla 2025: नवरात्रि में भोंडला और हड़गा की धूम, जानें महाराष्ट्र की पारंपरिक पूजा की खासियत
भोंडला (Photo: X|@SharmilaOswal)

What is Bhondla 2025: भोंडला (Bhondla), जिसे कुछ क्षेत्रों में हड़गा (Hadga) भी कहा जाता है, एक पारंपरिक महाराष्ट्रीयन पर्व है, जो नवरात्रि के नौ दिनों तक बहुत धूम धाम से मनाया जाता है. भोंडला एक महाराष्ट्रीयन त्योहार है, जो हस्त नक्षत्र की वर्षा और भरपूर फसल के बाद, नवरात्रि के दौरान कोजागिरी तक मनाया जाता है. यह प्रकृति माता का आभार व्यक्त करने के लिए किया जाने वाला एक अनुष्ठान है, जो मानव जाति को विभिन्न प्रकार से आशीर्वाद देती है. भोंडला के आयोजन में एक लकड़ी के आसन पर हाथी का चित्र बनाकर उसे फूलों से सजाया जाता है. लेकिन हाथी ही क्यों? इसका कारण है कि नवरात्रि के दौरान आकाश में "हस्त" नामक नक्षत्र उभरता है, जो हाथी के आकार का माना जाता है. उसी हस्त नक्षत्र की प्रतीकात्मक पूजा के रूप में हाथी की तस्वीर को पूजनीय माना जाता है. यह भी पढ़ें: Kanya Puja Quotes: कन्या पूजन पर ये कोट्स शेयर कर दें अष्टमी और नवमी पूजा की बधाई

महाराष्ट्र में भोंडला को अलग- अलग नामों से भी जाना जाता है. भोंडला को हडगा या भुलाबाई भी कहते हैं.

कोंकण में भोंडला मनाया जाता है.

विदर्भ: इस क्षेत्र में इस त्योहर को भुलाबाई के नाम से जाना जाता है.

दरअसल, 'भोला' का अर्थ भगवान शिव शंकर और भुलाबाई का अर्थ उमा-पार्वती है. इसलिए इस खेल का नाम भुलाबाई पड़ा. महिलाएं और लड़कियाँ इस त्योहार को बड़े उत्साह से मनाती हैं. प्राचीन काल में, ऐसे त्योहार महिलाओं को उनके दैनिक कार्यों से छुट्टी देने के लिए मनाए जाते थे. आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में यह परंपरा उत्साह के साथ जारी है.

खिरापाट और उसका सांस्कृतिक महत्व

भोंडला उत्सव के बाद बांटी जाने वाली खिरापाट का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व होता है. यह प्रसाद भगवान शिव और देवी पार्वती को प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है और फिर खेलने वाली महिलाओं और बच्चियों को बांटा जाता है. परंपरा के अनुसार, खिरापाट सूखे मेवे, फल, मिठाई आदि से बनाया जाता है. कुछ स्थानों पर एक विशेष क्रम भी अपनाया जाता है, जैसे पहले दिन 1 वस्तु, दूसरे दिन 2, और इस तरह नवमी तक बढ़ते हुए, दशहरे के दिन 10 वस्तुओं वाली विशेष खिरापाट तैयार की जाती है.

हाथी और पारंपरिक गीत

भोंडला में हाथी को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है. विशेष रूप से कोंकण क्षेत्र में, घर के मध्य भाग में लकड़ी के आसन पर रंगोली से हाथी की आकृति बनाई जाती है. छोटी बच्चियां उसके चारों ओर घेरा बनाकर घूमती हैं और पारंपरिक गीत गाती हैं. ‘ऐलमा पैलमा’ जैसे गीतों की लय पर थिरकते हुए ये बच्चियां पारंपरिक संस्कृति को जीवंत करती हैं.

चूँकि यह खेल हर दिन अलग-अलग घरों में आयोजित होता है, इसलिए हर दिन कुछ नया स्वाद, नया माहौल और मेज़बान का अलग आतिथ्य देखने को मिलता है. इससे न केवल सांस्कृतिक जुड़ाव मज़बूत होता है, बल्कि समुदाय में आपसी मेल-जोल और सौहार्द भी बढ़ता है.