छत्रपति शिवाजी महाराज का शौर्य और पराक्रम भारतीय इतिहास के सबसे महान अध्यायों में एक है. उनका जीवन एक प्रेरणा है, जो न केवल युद्ध में बल्कि राजनीति, प्रशासन एवं समाज सुधारक कार्यों में भी अत्यंत प्रभावी रहा है. उनकी कूटनीति, युद्ध संचालन और विशेषकर गोरिल्ला युद्ध नीति ने मुगल बादशाहों की नींद हराम कर दी थी. उनके जन्मदिन को लेकर विभिन्न विद्वानों में मतभेद है. कोई 6 अप्रैल 1627 को उनकी जन्म तिथि मानता है तो कोई 19 फरवरी 1630 को. यहां हम मराठा राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज की दो जन्म-तिथियों के साथ-साथ उनके शौर्य और पराक्रम पर भी बात करेंगे.
क्यों मनाई जाती है शिवाजी महाराज की दो जयंती
मराठा साम्राज्य के सिरमौर छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म 1630 में हुआ था. पिता का नाम शाहजी तथा मां जीजाबाई थीं. हालांकि उनकी जन्म-तिथि को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं. एक मत के अनुसार उनका जन्म 19 फरवरी 1630 में हुआ था, जबकि कुछ विद्वान 6 अप्रैल 1627 को उनका जन्म मानते हैं. 1968 में महाराष्ट्र सरकार द्वारा इस संदर्भ में कुछ इतिहासकारों की समिति गठित कर बहुमत आधार पर फाल्गुन तृतीया तथा अंग्रेज़ी कैलेण्डर अनुसार 19 फरवरी 1630 को शिवाजी की जयंती पर मुहर लगाते हुए इसी तिथि को राजकीय अवकाश घोषित किया, लेकिन डेमोक्रेटिक फ्रंट सरकार ने फाल्गुन तृतीया को जन्म-तिथि मानते हुए जयंती के भ्रम को बरकरार रखा है.
सामरिक कौशल: शिवाजी महाराज ने अपनी सेना की रणनीतियों में अत्यधिक चतुराई दिखाते हुए पहाड़ी किलों का उपयोग किया और छोटे किलों को नियंत्रण में करने के लिए गुप्त रास्तों का इस्तेमाल किया. उनका ‘गेरिल्ला युद्ध’ (छापामार युद्ध) का तरीका अपनी तरह का अद्वितीय था, जो मुगलों और अन्य दुश्मनों के लिए चुनौतीपूर्ण था.
स्वराज्य की स्थापना: शिवाजी ने हिंदवी स्वराज्य की नींव रखी. उनका सपना था कि भारत में एक स्वतंत्र और आत्मनिर्भर हिंदू राज्य बने. इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए उन्होंने अपने सामरिक, राजनीतिक और कूटनीतिक कौशल का प्रभावी ढंग से उपयोग किया.
राजव्यवस्था और प्रशासन: शिवाजी ने एक मजबूत और सुव्यवस्थित प्रशासन की स्थापना की. उनकी सेना में एक संगठनात्मक ढांचा था, जिसमें नायक, सिपाही, और अधिकारी सभी का एक विशिष्ट स्थान था. शिवाजी ने अपने राज्य में न्याय, धर्म, और संस्कृति की रक्षा के लिए कई कदम उठाए.
शिवाजी के किले और उनके महत्व: शिवाजी ने भारतीय किलों को अपनी सुरक्षा के प्रमुख साधन के रूप में प्रयोग किया. उनका किला निर्माण और उनका किलों पर अधिकार पाने का तरीका बहुत ही कुशल था. जैसे रायगढ़ किला, सिंधुदुर्ग किला, और लोहगड किला, ये सभी किले उनकी सैन्य रणनीतियों का प्रतीक हैं.
हर धर्म-संप्रदाय से प्यार: शिवाजी ने धार्मिक सहिष्णुता का पालन किया और सभी धर्मों का सम्मान किया. उन्होंने अपनी सेना में मुस्लिम सिपाहियों को भी उच्च पद पर रखा, जिससे संदेश मिलता है कि उनका शासन हर धर्म और समुदाय के लिए था.
सिद्धांत और नीति: छत्रपति शिवाजी ने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए ताउम्र अपने शत्रुओं के खिलाफ कड़ी लड़ाई लड़ी. उनकी नीति और शौर्य का मुख्य आधार ‘पृथ्वी की रक्षा’ करना था. इसके लिए उन्होंने अपने प्राणों की परवाह कभी नहीं की.













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