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Who Is Revanth Reddy: वह शख्स जिसने तेलंगाना में कांग्रेस को दिलाई जीत, यहां पढ़े रेवंत रेड्डी के बारे में डिटेल्स

अनुमुला रेवंत रेड्डी वह शख्‍स हैं, ज‍िनके नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने तेलंगाना में अपनी किस्मत में नाटकीय बदलाव देखा है. उप-चुनावों में अपमानजनक हार और पार्टी के भीतर से गंभीर चुनौती के बावजूद, उन्होंने आगे बढ़कर कांग्रेस का नेतृत्व किया.

Who Is Revanth Reddy: वह शख्स जिसने तेलंगाना में कांग्रेस को दिलाई जीत, यहां पढ़े रेवंत रेड्डी के बारे में डिटेल्स
Chairman A. Revanth Reddy ( Hindustan Times )

हैदराबाद, 3 दिसंबर: अनुमुला रेवंत रेड्डी वह शख्‍स हैं, ज‍िनके नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने तेलंगाना में अपनी किस्मत में नाटकीय बदलाव देखा है. उप-चुनावों में अपमानजनक हार और पार्टी के भीतर से गंभीर चुनौती के बावजूद, उन्होंने आगे बढ़कर कांग्रेस का नेतृत्व किया. आलाकमान के पूर्ण समर्थन और एक प्रभावी रणनीति के साथ, रेवंत रेड्डी ने देश की सबसे पुरानी राजनीति‍क पार्टी को उसके गढ़ में बहुत जरूरी जीत दिलाई.

कुछ महीने पहले तक कांग्रेस पार्टी तेलंगाना में कमज़ोर नज़र आ रही थी. लेक‍िन पड़ोसी राज्य कर्नाटक में जीत ने पार्टी में नई जान फूंक दी. भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) को लगातार तीसरी बार सत्ता में आने से रोकने के प्रयास में कांग्रेस सत्ता-विरोधी कारक को भुनाने में सफल रही. रेवंत रेड्डी एकमात्र ऐसे नेता हैं, जिन्होंने न केवल अपने गृह निर्वाचन क्षेत्र कोडंगल और कामारेड्डी में प्रचार किया, जहां उन्होंने मुख्यमंत्री केसी राव को चुनौती दी, बल्कि पूरे राज्य में चुनावी रैलियों को संबोधित किया. यह भी पढ़े: मतगणना: मप्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सत्ता के करीब पहुंची भाजपा, तेलंगाना में कांग्रेस 

रेवंत रेड्डी ने पार्टी की संभावनाओं को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में 55 सार्वजनिक बैठकों को संबोधित किया. टीपीसीसी प्रमुख ने बीआरएस और भाजपा के असंतुष्ट नेताओं से संपर्क किया और उन्हें कांग्रेस पार्टी में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया. पार्टी के भीतर कुछ विरोध का सामना करने के बावजूद वह केंद्रीय नेतृत्व को टिकट देने के लिए मनाने में भी सफल रहे. हालांकि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का एक वर्ग रेवंत रेड्डी को बाहरी व्यक्ति मानता है, यहां तक कि पार्टी के भीतर उनके आलोचक भी मानते हैं कि उनकी कड़ी मेहनत ने पार्टी की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

केसीआर और उनके परिवार के कटु आलोचक, रेवंत रेड्डी की आक्रामक राजनीति ने कई लोगों को पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी की याद दिला दी, जो अविभाजित आंध्र प्रदेश में कांग्रेस पार्टी के सबसे लोकप्रिय नेताओं में से एक थे. कांग्रेस पार्टी, जो तेलंगाना राज्य बनाने का श्रेय लेने के बावजूद 2014 और 2018 में सत्ता में नहीं आ सकी, एक ऐसे नेता की तलाश में थी, जो अपने पारंपरिक गढ़ में पार्टी की किस्मत को पुनर्जीवित कर सके.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि रेवंत रेड्डी ने केंद्रीय नेतृत्व की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए सभी बाधाओं को पार कर लिया. जब रेवंत रेड्डी को 2021 में तेलंगाना में पार्टी का नेतृत्व करने के लिए कांग्रेस नेतृत्व द्वारा चुना गया था, तो सबसे पुरानी पार्टी में इस पद के लिए कई वरिष्ठ दावेदार चौंक गए थे, क्योंकि उन्होंने 2018 विधानसभा चुनावों से ठीक पहले तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) को छोड़ दिया था. उनकी नियुक्ति से पार्टी के भीतर लगभग विद्रोह शुरू हो गया था और एक वरिष्ठ नेता ने तो यहां तक आरोप लगाया था कि पार्टी के एक केंद्रीय नेता ने उन्हें इस पद पर नियुक्त करने के लिए रेवंत रेड्डी से रिश्वत ली थी.

लेक‍िन कांग्रेस आलाकमान दृढ़ रहा. अपने आक्रामक दृष्टिकोण और जन अपील के लिए जाने जाने वाले, उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा जाता था, जो अपने पूर्व गढ़ में सबसे पुरानी पार्टी की किस्मत पलट सकता था. लेक‍िन तेलंगाना में कांग्रेस नेताओं का एक वर्ग अभी भी रेवंत रेड्डी से सहमत नहीं है, लेकिन उनके पास आलाकमान की पसंद को स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. रेवंत 2018 में कांग्रेस के टिकट पर अपने गृह क्षेत्र कोडंगल से विधानसभा चुनाव हार गए थे, लेकिन 2019 में मल्काजगिरी संसदीय क्षेत्र से लोकसभा के लिए चुने गए.

अपने आसपास के विवादों के बावजूद, 53 वर्षीय तेजतर्रार नेता को कई लोग एकमात्र ऐसे नेता के रूप में देखते हैं, जो केसीआर और परिवार का मुकाबला कर सकते हैं. राजनीतिक विश्लेषक पलवई राघवेंद्र रेड्डी ने कहा,“इसमें कोई संदेह नहीं है कि पार्टी की जीत का श्रेय रेवंत रेड्डी को जाता है. उनके नेतृत्व में पार्टी ने गति पकड़ी और आक्रामक तरीके से केसीआर पर हमला किया.”

अच्छे वक्तृत्व कौशल के साथ, रेवंत रेड्डी कथित घोटालों और विभिन्न मोर्चों पर इसकी विफलता पर बीआरएस सरकार पर हमला करने में मुखर हैं. युवाओं के बीच भी उनकी अच्छी पकड़ है. यह आश्चर्य की बात नहीं है कि अभियान के दौरान, बीआरएस नेताओं और उनकी मित्र पार्टी  एआईएमआईएम के नेताओं ने रेवंत रेड्डी पर हमला किया और उन्हें आरएसएस का आदमी करार दिया.

रेवंत रेड्डी ने स्वीकार किया कि वह अपने छात्र जीवन के दौरान एबीवीपी के साथ थे, लेकिन उन्होंने आरएसएस के साथ किसी भी तरह के जुड़ाव से इनकार किया. दिलचस्प बात यह है कि रेवंत रेड्डी राज्य के तीनों प्रमुख राजनीतिक खिलाड़ियों में से एक हैं. महबूबनगर जिले के कोडंगल निवासी रेवंत 2003 में टीआरएस (अब बीआरएस) के साथ अपना राजनीतिक करियर शुरू किया. चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिलने पर उन्होंने दो साल बाद पार्टी छोड़ दी.

एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ते हुए, वह 2006 में जिला परिषद प्रादेशिक समिति (जेडपीटीसी) के सदस्य बने. वह 2008 में एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में आंध्र प्रदेश विधान परिषद के लिए चुने गए. उसी वर्ष वह तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) में शामिल हो गए. 2009 में वह कोडंगल से आंध्र प्रदेश विधानसभा के लिए चुने गए. वह टीडीपी अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू के करीबी बन गए। टीडीपी के प्रमुख चेहरों में से एक के रूप में उभरते हुए, वह विधानसभा के भीतर और बाहर दोनों जगह अपनी अभिव्यक्ति से प्रभावशाली थे.

एक विश्लेषक ने कहा, "वह बहसों में उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं और हमेशा तथ्यों और आंकड़ों के साथ तैयार होकर आते हैं." रेवंत रेड्डी 2014 में कोडंगल से फिर से चुने गए. लेक‍िन, आंध्र प्रदेश के विभाजन ने तेलंगाना में टीडीपी को कमजोर कर दिया था. 2015 में, भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) ने उन्‍हें तब पकड़ा, जब वह विधान परिषद चुनावों में टीडीपी उम्मीदवार को वोट देने के लिए नामांकित विधायक एल्विस स्टीफेंसन को रिश्वत देने की कोशिश करे रहे थे. एसीबी ने स्टीफेंसन की शिकायत पर जाल बिछाया था और जब रेवंत रेड्डी तीन अन्य लोगों के साथ 50 लाख रुपये नकद लेकर विधायक के घर आए, तो एसीबी अधिकारियों ने उन्‍हें गिरफ्तार कर लिया.

यह एपिसोड कैमरे पर रिकॉर्ड किया गया था. जमानत मिलने से पहले रेवंत रेड्डी छह महीने से अधिक समय तक जेल में थे. तब से वह लो प्रोफाइल बने हुए हैं. अक्टूबर 2017 में उन्होंने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया और टीडीपी भी छोड़ दी. उन्होंने 'केसीआर के निरंकुश शासन से तेलंगाना की मुक्ति' के लिए लड़ने की कसम खाई और बाद में कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए.

उन्होंने कांग्रेस के भीतर एक मजबूत नेटवर्क बनाया और जल्द ही शीर्ष नेतृत्व के करीबी बन गए. उन्हें टीपीसीसी के कार्यकारी अध्यक्ष के पद से पुरस्कृत किया गया. 2018 के चुनावों के प्रचार के दौरान, उन्होंने खुद को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश करके विवाद पैदा कर दिया. विधानसभा चुनाव में हार के बावजूद पार्टी ने उन्हें कुछ महीने बाद हुए लोकसभा चुनाव में उतारा और जीत के बाद उन्होंने पार्टी में अपनी स्थिति मजबूत कर ली.

(The above story first appeared on LatestLY on Dec 03, 2023 04:37 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).