भारत में शाकाहार: निजी पसंद या जाति की राजनीति?
भारत में कौन क्या खाता है, यह केवल निजी पसंद का मामला नहीं है.
भारत में कौन क्या खाता है, यह केवल निजी पसंद का मामला नहीं है. कई बार व्यक्ति की जाति भी इसमें अहम भूमिका निभाती है. कौन क्या खाता है, ये देश के गहरे सामाजिक बंटवारे का भी एक आईना है.पिछले एक दशक के दौरान भारत में लोगों के खानपान को लेकर बहस तेज हो गई है. साल 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद, भारत के कई हिस्सों में मांसाहार को निशाना बनाने वाले कदमों में तेजी आई है. उत्तर भारत के हिंदी भाषी राज्यों में यह खासतौर पर देखा जा रहा है.
कुछ स्थानों पर प्रशासन ने समय-समय पर स्कूलों के पास, धार्मिक स्थलों के नजदीक और त्योहारों के दौरान, मांसाहारी भोजन पर रोक लगाने या उसे न खाने की सलाह देने वाले नियम जारी किए हैं.
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हाल ही में जम्मू के डोडा जिले में अधिकारियों ने सभी शैक्षणिक संस्थानों में मांस, सीफूड और अंडों के सेवन पर प्रतिबंध लगा दिया. उनका कहना था कि 'धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों' को बनाए रखने, 'सामाजिक सद्भाव' बरकरार रखने और खान-पान से जुड़ी अलग-अलग पसंद के कारण होने वाली 'असुविधा' से बचने के लिए यह जरूरी है.
इस आदेश की आलोचना हुई और इसने व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समावेशिता और धार्मिक संवेदनशीलता के बारे में चिंताएं बढ़ा दीं.
भारत के अलग-अलग शहरों में भोजन संबंधी इस तरह के प्रतिबंध आम लोगों की जिंदगी को प्रभावित करते हैं. मुंबई में रहने वालीं वकील अभिप्सिता पुरकायस्थ ने बताया कि कई लोगों को खान-पान से जुड़ी अपनी पसंद के कारण घर खोजने में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.
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अभिप्सिता ने डीडब्ल्यू को बताया, "मुंबई आकर घर ढूंढ़ते समय मुझे एक मुश्किल नियम से जूझना पड़ा. यह था, शाकाहारी बनो! जब मकान मालिकों को पता चला कि हम मांस खाते हैं, तो उन्होंने हमें घर देने से इनकार कर दिया. आखिरकार हम एक ऊंची इमारत में शिफ्ट हुए, जहां पड़ोसियों ने चिकन न खाने की कसम खाने को कहा. पिछले दो साल से हम अपने चिकन खाने को एक राज की तरह छुपाते रहे हैं और हमेशा डरते रहते हैं कि कहीं कोई हमें देख न ले."
हिंदू सांस्कृतिक पहचान से शाकाहार का जुड़ाव
नई दिल्ली स्थित एक विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नबनीपा भट्टाचार्जी ने एक आपबीती साझा करते हुए बताया कि कैसे एक बार उनके पड़ोसी ने उनके खाने की महक की शिकायत करते हुए उनसे खिड़कियां बंद करने को कहा था.
नबनीपा बताती हैं, "मेरे पड़ोसी ने कभी मेरे खाने का नाम नहीं लिया, बस उसे 'बेनाम' कहती थी. शाकाहारी लोग कभी अपनी खिड़कियां बंद नहीं करते, क्योंकि उनके खाने को लेकर कोई सवाल नहीं उठाया जाता और उसे हमेशा सही माना जाता है. लेकिन मेरा खाना? मेरे खाने पर ही सवाल उठाए जाते थे और मुझसे ही बदलने की उम्मीद की जाती थी."
उनके इस अनुभव से यह सवाल उठता है कि भारतीय समाज के कुछ वर्गों में मांसाहार को क्यों बुरा माना जाता है. इस तरह के व्यवहार से मांसाहारी लोग अक्सर खुद को अलग-थलग महसूस करते हैं.
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नबनीपा भट्टाचार्जी के मुताबिक, शाकाहार का जुड़ाव हिंदू सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय गौरव से है, जो भारत में खाने-पीने से जुड़े सामाजिक नियमों को तय करता है.
80 फीसदी भारतीय खाते हैं मांस!
हिंदू राष्ट्रवादी समूह शाकाहार को 'पारंपरिक' हिंदू मूल्यों की पहचान के तौर पर बढ़ावा देते हैं. ऐसा करते हुए वे अक्सर पूरे भारत की, यहां तक कि हिंदू समुदायों के भीतर भी खान-पान की अलग-अलग आदतों को अनदेखा कर देते हैं.
वे अक्सर मांसाहार को धार्मिक अल्पसंख्यकों और समाज के हाशिए पर रहने वाले समूहों, जैसे कि मुसलमानों, ईसाइयों, आदिवासियों और दलितों से जोड़कर देखते हैं. दलितों को भारत की सदियों पुरानी जाति व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर माना जाता है.
मांसाहार को निशाना बनाने से धार्मिक और जातिगत स्तर पर शर्मिंदगी और अलगाव पैदा होता है. इससे समाज में भेदभाव और बढ़ता है. किरणमयी भुशी, 'द कल्चर एंड पॉलिटिक्स ऑफ फूड इन कंटेम्पररी इंडिया (समकालीन भारत में भोजन की संस्कृति और राजनीति)' की लेखिका हैं.
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उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "भारत में मांसाहार, खासकर बीफ को काफी ज्यादा बुरा माना जाता है. इसे दलितों और आदिवासियों से जोड़ा जाता है. ये लोग किफायती पोषण के लिए बीफ पर निर्भर रहते हैं, जिससे समाज में जातिगत भेदभाव और बहिष्कार की भावना बढ़ती है."
भारत की कुल आबादी में लगभग 80 फीसदी हिस्सेदारी वाले सबसे बड़े धार्मिक समुदाय हिंदू में भी कई लोग मांस खाते हैं. हालांकि, उनके खान-पान की आदतें क्षेत्र और जाति के अनुसार अलग-अलग होती हैं.
जहां उत्तर के हिंदी भाषी राज्य मुख्य रूप से शाकाहारी हैं, वहीं दक्षिणी और पूर्वोत्तर राज्यों के लोग प्रमुख रूप से मांसाहारी हैं. कई दलित और आदिवासी नियमित रूप से मांस खाते हैं, जबकि कई अगड़ी जातियों के हिंदुओं में शाकाहारी भोजन का प्रचलन ज्यादा है. हालांकि, अगड़ी जातियों में भी कम लोग ही शाकाहारी हैं. ज्यादातर लोग किसी-न-किसी तरह का मांस खाते हैं.
प्यू रिसर्च सेंटर के साल 2021 के एक सर्वे के अनुसार, कुल मिलाकर लगभग 40 फीसदी भारतीय वयस्क शाकाहारी हैं. हालांकि, इसी साल की नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस) की रिपोर्ट बताती है कि 15 से 49 आयुवर्ग के 80 फीसदी भारतीय किसी-न-किसी तरह का मांस खाते हैं. यह इस आम धारणा के विपरीत है कि भारत के ज्यादातर लोग शाकाहारी हैं.
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विशेषज्ञों ने लंबे समय से भारत की जाति व्यवस्था और खान-पान की आदतों के पारस्परिक संबंध का अध्ययन किया है, जो 'पवित्रता' और 'अशुद्धता' की धारणा पर आधारित है. अध्ययनों से पता चलता है कि किस तरह खान-पान की आदतें जाति व्यवस्था की उत्पत्ति का आधारभूत तत्व थीं और इन्होंने समाज में "ऊंच-नीच" की अवधारणा को आकार दिया.
भुशी ने बताया कि शाकाहारी देश के तौर पर भारत की छवि ज्यादातर अगड़ी जाति के हिंदुओं (खासकर ब्राह्मणों और बनियों) के खान-पान की आदतों के कारण बनी है. ऐतिहासिक रूप से इन समुदायों ने "धार्मिक शुद्धता" और "सामाजिक हैसियत" को दिखाने के लिए शाकाहार अपनाया था.
हालांकि, भुशी ने जोर देकर कहा कि हकीकत इससे अलग है और ब्राह्मणों में भी आहार की परंपरा पर मतभेद है. उदाहरण के लिए, पश्चिम बंगाल में कई ब्राह्मण मछली खाते हैं.
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वहीं दूसरी ओर, संस्कृत की विद्वान पुनीता शर्मा का मानना है कि खान-पान की आदतें ज्यादातर मौसम और भौगोलिक स्थितियो पर निर्भर करती हैं. इनसे यह तय होता है कि खाने-पीने की कौन-सी चीजें वहां कितनी आसानी से मिलती हैं.
पुनीता शर्मा ने रेखांकित किया, "भारत में पुराने समय से ही खाने-पीने की आदतें प्राकृतिक संसाधनों और मौसम के हिसाब से तय होती रही हैं, जो पर्यावरण और खाने की आदतों के बीच गहरे संबंध को दिखाती हैं."
पुनीता के मुताबिक, लोग अपनी परंपराओं और संस्कृति का सम्मान करने के लिए खाने-पीने के नियमों का पालन करते हैं. उनका यह भी दावा है कि "शाकाहारी खाना, मांसाहारी खाने से ज्यादा सेहतमंद होता है और इससे बीमारियां भी कम होती हैं."
शहरीकरण के कारण खान-पान की आदतों में हो रहा बदलाव
पिछले कुछ वर्षों से भारत में खान-पान की आदतें बदल रही हैं. बड़ी संख्या में युवा बेहतर जिंदगी की तलाश में बड़े शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं. वे अब अलग-अलग तरह का खाना खाने लगे हैं, जिनमें मांस भी शामिल है.
भुशी ने बताया, "शहरीकरण और बढ़ती आमदनी के कारण यह बदलाव देखने को मिल रहा है. इसके कारण लोग अब अपने पारंपरिक शाकाहारी खान-पान के नियमों से आगे बढ़कर अलग-अलग तरह का खाना खाने लगे हैं."
इस बीच, शहरी युवाओं में एक नया चलन भी देखा जा रहा है. वे अब तेजी से वीगन जीवनशैली को अपना रहे हैं. 24 साल के उज्ज्वल चक्रवर्ती जैसे कई लोगों के लिए वीगन बनना सिर्फ जीवनशैली का एक विकल्प नहीं है. उनके लिए यह पारंपरिक शाकाहार के जातिगत आधार के खिलाफ एक तरह का विरोध भी है.
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उन्होंने कहा, "भारत में वीगन जीवनशैली अभी नई है और लोग इसे अक्सर जाति-आधारित शाकाहारी जीवनशैली मान लेते हैं. शाकाहार के विपरीत वीगन जीवनशैली जातिगत पहचान से नहीं, बल्कि पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी से जुड़ी है."
उज्ज्वल का मानना है कि सोशल मीडिया पर मौजूद इन्फ्लुएंसर और कार्यकर्ता ही वीगन जीवनशैली को एक अच्छा और नैतिक विकल्प बना रहे हैं, जो जाति-आधारित शाकाहारी नियमों को चुनौती दे रही है.
(The above story first appeared on LatestLY on Oct 20, 2025 04:20 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

