Independence Day 2025: जब एक कलम ने खींच दी 2 देशों के बीच खूनी लकीर, कैसे हुआ भारत-पाकिस्तान का विभाजन?
(Photo : X)

Partition of India and Pakistan: हम सब भारत के विभाजन की भयावहता को जानते हैं. लेकिन उस कहानी के पीछे एक और कहानी है - एक ऐसी लकीर की कहानी जिसे सिर्फ 72 दिनों में खींच दिया गया और जिसने इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया. यह कहानी है रैडक्लिफ लाइन की, और उस ब्रिटिश वकील की जिसने इसे खींचा, जबकि वह पहले कभी भारत आया भी नहीं था.


कौन थे सिरिल रैडक्लिफ और उन्हें क्यों चुना गया?

सिरिल रैडक्लिफ (Cyril Radcliffe) ब्रिटेन के एक जाने-माने वकील थे. कला और साहित्य में रुचि रखने वाले रैडक्लिफ को भारत के बारे में कोई खास जानकारी नहीं थी. उन्होंने पहले कभी भारत की धरती पर कदम नहीं रखा था. और शायद यही उनकी सबसे बड़ी योग्यता मानी गई.

ब्रिटिश सरकार और भारतीय राजनीतिक दलों (कांग्रेस और मुस्लिम लीग) को एक ऐसा व्यक्ति चाहिए था जो "निष्पक्ष" हो. उनका मानना था कि जिसे भारत के जटिल सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक ताने-बाने की समझ नहीं होगी, वह बिना किसी भेदभाव के सिर्फ तथ्यों के आधार पर फैसला लेगा. इसी सोच के साथ, उन्हें भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा खींचने वाले दो सीमा आयोगों (बंगाल और पंजाब के लिए) का अध्यक्ष बना दिया गया. उन्हें एक ऐसा काम सौंपा गया था जिसके लिए उनके पास न तो अनुभव था और न ही समय.


असंभव डेडलाइन: 72 दिनों का दबाव और राजनीति

रैडक्लिफ 8 जुलाई 1947 को भारत पहुंचे और उन्हें 15 अगस्त 1947 तक अपना काम पूरा करने का निर्देश दिया गया. यानी, उनके पास 4000 किलोमीटर से ज़्यादा लंबी सीमा रेखा खींचने और करोड़ों लोगों की किस्मत का फैसला करने के लिए सिर्फ 72 दिन थे. यह डेडलाइन लगभग असंभव थी और इसके पीछे गहरी राजनीति थी.

ब्रिटेन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आर्थिक रूप से कमज़ोर हो चुका था और जल्द से जल्द भारत से निकलना चाहता था. लॉर्ड माउंटबेटन, भारत के आखिरी वायसरॉय, ने स्वतंत्रता की तारीख को जून 1948 से खिसकाकर 15 अगस्त 1947 कर दिया. इस जल्दबाज़ी का मतलब था कि सीमांकन का काम भी जल्दबाज़ी में ही निपटाना होगा. इस दबाव में एक तार्किक और मानवीय बंटवारा करना नामुमकिन था.


पुराने नक्शे और अधूरी जानकारी का कहर

रैडक्लिफ और उनकी टीम को जो नक्शे और जनगणना के आंकड़े दिए गए, वे पुराने, अधूरे और अक्सर गलत थे. उनके पास ज़मीन पर जाकर हर गाँव, हर खेत का सर्वे करने का समय ही नहीं था. उन्होंने दिल्ली में एक दफ्तर में बैठकर, नक्शों पर धार्मिक आधार पर आबादी को देखते हुए लाइनें खींच दीं.

इसका नतीजा भयानक हुआ. कई मामलों में:

  • एक ही गांव के दो हिस्से हो गए; एक भारत में, दूसरा पाकिस्तान में.
  • किसी का घर भारत में था तो उसका खेत पाकिस्तान में.
  • नदियों और नहरों को इस तरह बाँटा गया कि एक देश के हिस्से में पानी का स्रोत आ गया तो दूसरे के हिस्से में सूखी ज़मीन.

यह सिर्फ ज़मीन का बंटवारा नहीं था; यह समुदायों, परिवारों और जिंदगियों का क्रूर विभाजन था, जो सिर्फ कागज़ पर एक लकीर खींचकर कर दिया गया.


मानवीय त्रासदी: जब ऐलान हुआ और इंसानियत हारी

सबसे अजीब बात यह थी कि सीमा रेखा का अंतिम नक्शा 12 अगस्त 1947 तक तैयार हो गया था, लेकिन इसे 17 अगस्त को सार्वजनिक किया गया, यानी भारत की आज़ादी के दो दिन बाद. इस देरी के पीछे का कारण आज भी बहस का विषय है, लेकिन इसके परिणाम विनाशकारी थे.

जब लोगों को पता चला कि उनका घर, गांव या शहर अब दूसरे देश का हिस्सा बन गया है, तो अफरातफरी मच गई. दोनों तरफ से लाखों लोग विस्थापित हुए. इतिहास का सबसे बड़ा पलायन शुरू हुआ. इस दौरान हुए भीषण दंगों में 10 से 20 लाख लोग मारे गए और अनगिनत लोग लापता हो गए. यह एक मानवीय त्रासदी थी, जिसे शायद टाला जा सकता था अगर प्रक्रिया को थोड़ा और समय और संवेदनशीलता के साथ पूरा किया जाता. लोग जो सदियों से एक साथ रहते आए थे, वे अचानक एक-दूसरे के दुश्मन बन गए.


विरासत: 79 साल बाद भी एक नासूर

आज, भारत के विभाजन को लगभग 79 साल हो चुके हैं, लेकिन रैडक्लिफ लाइन आज भी दक्षिण एशिया की राजनीति में एक संवेदनशील मुद्दा है.

  • कश्मीर विवाद की जड़ें इसी अधूरे बंटवारे में हैं.
  • पंजाब और बंगाल का विभाजन आज भी दोनों देशों के लोगों के दिलों में एक दर्द की तरह है.
  • यह सीमा रेखा लगातार तनाव, घुसपैठ और सैन्य संघर्ष का कारण बनी रहती है.

सिरिल रैडक्लिफ ने अपने काम के लिए मिली फीस लेने से इनकार कर दिया और भारत से जाने के बाद कभी वापस नहीं आए. उन्हें शायद अंदाज़ा हो गया था कि अनजाने में ही सही, उन्होंने एक ऐसे ज़ख्म को जन्म दे दिया है जो सदियों तक रिसता रहेगा. यह "खून की लकीर" आज भी हमें याद दिलाती है कि नक्शों पर खींची गई एक सीधी रेखा असल जीवन में कितनी टेढ़ी और दर्दनाक हो सकती है.