सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: शादी में 'एडजस्ट' करने या मायके लौटने की सलाह देना ससुराल वालों की 'क्रूरता' नहीं; रिश्तेदारों के खिलाफ केस खारिज
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने वैवाहिक विवादों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है. कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी पत्नी को शादी में 'तालमेल बिठाने' (एडजस्ट करने) या अपने मायके वापस लौट जाने की पारिवारिक सलाह देना, आपराधिक कानून के तहत ससुराल वालों की 'क्रूरता' या प्रताड़ना नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि नैतिक रूप से ऐसी सलाह पर सवाल उठाए जा सकते हैं, लेकिन बिना पुख्ता सबूतों और सक्रिय भागीदारी के इसे आपराधिक अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता.
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नई दिल्ली, 28 मई: भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने वैवाहिक संबंधों में आने वाले बिखराव और ससुराल पक्ष के खिलाफ दर्ज होने वाले आपराधिक मामलों को लेकर एक ऐतिहासिक और मार्गदर्शक फैसला सुनाया है. शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल पत्नी को वैवाहिक जीवन में "एडजस्ट" करने या अपने माता-पिता के घर (मायके) लौट जाने की सलाह देने मात्र के लिए पति के रिश्तेदारों के खिलाफ आपराधिक क्रूरता का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता. न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह (Sanjay Karol and Justice N. Kotiswar Singh) की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि यद्यपि इस तरह की पारिवारिक सलाह या मध्यस्थता न करना नैतिक रूप से विचारणीय हो सकता है, लेकिन जब तक मामले में इन-लॉज (ससुराल पक्ष) की सक्रिय संलिप्तता या मिलीभगत का कोई ठोस सबूत न हो, तब तक इसे स्वतः ही एक आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता. यह भी पढ़ें: ब्लड डोनेशन बैन पर केंद्र का सुप्रीम कोर्ट में बचाव: कहा- व्यक्तिगत अधिकारों से ऊपर है जन स्वास्थ्य और सुरक्षा
नैतिक आचरण और आपराधिक दायित्व के बीच का अंतर
सुप्रीम कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी मध्य प्रदेश के गुना (Guna) से उत्पन्न एक वैवाहिक विवाद में शामिल पति की बहन (ननद) और अन्य रिश्तेदारों के खिलाफ दर्ज क्रूरता, घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न के आपराधिक मुकदमों को पूरी तरह से रद्द (Quash) करते हुए की.
सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि वैवाहिक संबंधों के टूटने के दौरान बिना किसी स्पष्ट तथ्यात्मक आधार के परिवार के सभी सदस्यों पर अंधाधुंध तरीके से आपराधिक कानून लागू नहीं किया जाना चाहिए. न्यायाधीशों ने पाया कि संबंधित मामले में पति के रिश्तेदारों के खिलाफ लगाए गए आरोप पूरी तरह से अस्पष्ट, सामान्य और किसी भी विशिष्ट भौतिक साक्ष्य से परे थे.
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट शब्दों में कहा, "केवल यह आरोप कि परिवार के सदस्यों ने पति का 'समर्थन' किया, मामले में हस्तक्षेप करने में विफल रहे, या शिकायतकर्ता को वैवाहिक रिश्ते में सामंजस्य बिठाने की सलाह दी, बिना किसी अतिरिक्त साक्ष्य के, आपराधिक दायित्व को आकर्षित नहीं करेगा. वास्तव में ऐसी स्थितियां हो सकती हैं जहां कुछ रिश्तेदार मूकदर्शक बने रहें या शिकायतकर्ता की मदद के लिए आगे न आएं; हालांकि, ऐसा आचरण, भले ही नैतिक रूप से संदिग्ध हो, तब तक आपराधिक कल्पेबिलिटी (दोषसिद्धि) के स्तर तक नहीं उठाया जा सकता जब तक कि आसपास की परिस्थितियां कथित अपराधों में उनकी सक्रिय भागीदारी को स्पष्ट रूप से प्रकट न करती हों."
मामले की पृष्ठभूमि: हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील
इस कानूनी विवाद की शुरुआत साल 2019 में महिला की शादी के बाद हुई थी. वैवाहिक कलह बढ़ने के बाद, महिला ने अपने पति और सास, भाई (जेठ/देवर), बहन (ननद) और भाभी सहित पूरे विस्तारित परिवार के खिलाफ शारीरिक और मानसिक क्रूरता के साथ-साथ लगातार दहेज की मांग करने का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई थी. इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने तत्कालीन भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A (क्रूरता), धारा 34 (समान मंशा) और दहेज निषेध अधिनियम की धाराओं के तहत प्राथमिकी (FIR) दर्ज की थी। इसके अलावा, पीड़िता ने मजिस्ट्रेट अदालत में एक अलग घरेलू हिंसा का मामला भी दायर किया था.
पति के रिश्तेदारों ने इन कार्यवाहियों को रद्द कराने के लिए पहले मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (High Court) का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन हाई कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी. उच्च न्यायालय के इसी इनकार से व्यथित होकर पति की बहन और अन्य करीबियों ने अंततः सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी.
अलग-अलग निवास स्थान और विशिष्ट दावों का अभाव
सुप्रीम कोर्ट ने जब इस मामले की केस डायरी और दलीलों की गहन समीक्षा की, तो पाया कि मारपीट, उपेक्षा और प्रत्यक्ष उत्पीड़न के मुख्य आरोप विशेष रूप से केवल पति के खिलाफ ही केंद्रित थे. इसके विपरीत, व्यापक परिवार (ससुराल पक्ष) के खिलाफ लगाए गए आरोपों में किसी भी स्वतंत्र या विशिष्ट प्रत्यक्ष कृत्य का अभाव था. पीठ ने नोट किया कि अपीलकर्ताओं में से किसी को भी कोई स्वतंत्र भूमिका नहीं सौंपी गई थी जिससे प्रथम दृष्टया अपराध साबित हो सके.
इसके अलावा, साक्ष्यों के रिकॉर्ड से यह भी साफ हुआ कि पीड़ित पत्नी मुख्य रूप से मध्य प्रदेश के श्योपुर (Sheopur) में अपने पति के साथ रहती थी, जबकि उसके आरोपित ससुराल वाले काफी दूर शिवपुरी (Shivpuri) में अलग रहते थे. पीठ ने माना कि इस भौगोलिक अलगाव (Geographic Separation) ने रिश्तेदारों द्वारा दैनिक आधार पर किए जाने वाले कथित उत्पीड़न के दावों को पूरी तरह कमजोर कर दिया. कोर्ट ने इस तथ्य को भी संज्ञान में लिया कि इन कानूनी कार्यवाहियों के लंबित रहने के दौरान ही, एक फैमिली कोर्ट के डिक्री आदेश द्वारा इस विवाह को पहले ही कानूनी रूप से भंग (तलाक) किया जा चुका है.
वैवाहिक बिखराव में न्यायिक संवीक्षा की आवश्यकता
अपने इस फैसले के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों (Lower Courts) को एक कड़ा निर्देश जारी किया है. कोर्ट ने कहा कि किसी भी वैवाहिक विवाद के भावुक क्षणों में परिवार के दूर के सदस्यों या विस्तारित रिश्तेदारों को आपराधिक मुकदमों में घसीटने की बढ़ती प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया जाना चाहिए और निचली अदालतों को ऐसे मामलों में उच्च स्तर की न्यायिक संवीक्षा (Heightened Judicial Scrutiny) अपनानी चाहिए.
अदालत ने सचेत करते हुए कहा, "यह असामान्य नहीं है कि जब वैवाहिक संबंध बिगड़ते हैं, तो भावनात्मक उथल-पुथल और कड़वाहट के कारण आरोप लगाए जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप अक्सर जीवनसाथी के पूरे परिवार को आपराधिक मुकदमेबाजी में खींच लिया जाता है." सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यद्यपि घरेलू हिंसा के पीड़ितों के लिए सुरक्षात्मक कानून बेहद महत्वपूर्ण और आवश्यक हैं, लेकिन आपराधिक कानून को व्यक्तिगत शिकायतें निकालने या पारिवारिक हिसाब-किताब चुकता करने के उपकरण के रूप में बदलने की अनुमति कतई नहीं दी जा सकती.
(The above story first appeared on LatestLY on May 28, 2026 10:54 AM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

