Patna High Court Decision: पटना हाईकोर्ट का अजीब फैसला, महिला का सलवार उतारना और चेस्ट दबाना 'रेप की कोशिश' नहीं? जानें क्या है पूरा मामला
पटना उच्च न्यायालय ने एक अहम फैसले में 2008 के मामले में आरोपी को बरी कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि महिला के वस्त्र उतारने का प्रयास करना और छेड़छाड़ करना 'मर्यादा भंग' (IPC 354) के दायरे में आता है, न कि 'दुस्कर्म के प्रयास' (IPC 376/511) के तहत. यह मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भी पहुंच गया है.
Patna High Court Decision: पटना उच्च न्यायालय ने वर्ष 2013 के एक मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए 'दुस्कर्म के प्रयास' के आरोपी को बरी कर दिया है. अदालत ने अपने फैसले में कहा कि महिला के वस्त्र (सलवार) उतारने का प्रयास करना और उसके साथ शारीरिक छेड़छाड़ करना आपराधिक कृत्य जरूर है, लेकिन यह कानूनी रूप से 'दुस्कर्म के प्रयास' (Attempt to Rape) की श्रेणी में नहीं आता है. जस्टिस पूर्णेन्दु सिंह की एकल पीठ ने 'हिमांशु कुमार पाठक बनाम बिहार राज्य' मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि इस प्रकार का कृत्य भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354 के तहत महिला की लज्जा भंग करने (Outraging Modesty) के दायरे में आता है.
क्या था पूरा मामला और 2008 की घटना?
यह मामला साल 2008 का है, जब एक महिला ने आरोप लगाया था कि वह अपने पिता के साथ अमरपुर स्थित एक फोटोग्राफी स्टूडियो गई थी. अभियोजन पक्ष के अनुसार, स्टूडियो मालिक ने महिला के पिता को कंप्यूटर पर तस्वीरें देखने के बहाने बाहर इंतजार करने को कहा और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया. महिला का आरोप था कि आरोपी ने अंदर दरवाजा बंद कर उसके वस्त्र उतारने की कोशिश की और शारीरिक छेड़छाड़ की. महिला के शोर मचाने पर जब उसके पिता दरवाजे की तरफ दौड़े, तो आरोपी वहां से भाग निकला. इस मामले में साल 2013 में एक निचली अदालत ने आरोपी को धारा 376/511 (दुस्कर्म का प्रयास) और धारा 342 (गलत तरीके से बंधक बनाना) के तहत दोषी मानते हुए तीन साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी. यह भी पढ़े: Karnataka High Court: पति से ज्यादा कमाने वाली आत्मनिर्भर पत्नी सिर्फ महिला होने के नाते नहीं मांग सकती गुजारा भत्ता; हाईकोर्ट ने बदला फैसला
पटना हाई कोर्ट की अहम टिप्पणियां
निचली अदालत के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने साक्ष्यों में कई गंभीर कमियां पाईं. कोर्ट ने नोट किया कि मामले में कोई मेडिकल रिपोर्ट या पुख्ता चिकित्सीय साक्ष्य मौजूद नहीं था और जांच अधिकारी (IO) का भी अदालत में परीक्षण नहीं कराया गया था. अदालत ने कहा कि जब तक किसी भी स्तर पर शारीरिक पैठ (Penetration) का प्रयास या स्पष्ट रूप से दुस्कर्म करने का कोई अकाट्य कदम साबित नहीं होता, तब तक मेडिकल रिपोर्ट की अनुपस्थिति में आईपीसी की धारा 375 और 376/511 के तहत आरोप तय नहीं किए जा सकते. कोर्ट ने माना कि आरोपी ने महिला को बंधक बनाकर और छेड़छाड़ कर आपराधिक बल का प्रयोग किया, जो धारा 354 के तहत आता है.
आरोपी के बरी होने की तकनीकी वजह
यद्यपि हाई कोर्ट ने माना कि आरोपी का कृत्य महिला की लज्जा भंग करने (धारा 354) से जुड़ा था, लेकिन अदालत ने उसे पूरी तरह बरी कर दिया. कोर्ट ने तकनीकी कारण बताते हुए स्पष्ट किया कि आरोपी पर निचली अदालत में केवल दुस्कर्म के प्रयास और गलत तरीके से बंधक बनाने के तहत मुकदमा चलाया गया था और उसी में सजा हुई थी. चूंकि उस पर धारा 354 के तहत आरोप तय नहीं किए गए थे, इसलिए हाई कोर्ट इस वैकल्पिक धारा के तहत उसकी सजा को बरकरार नहीं रख सका. इसी आधार पर कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को रद्द करते हुए आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया.
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला, जताई चिंता
पटना हाई कोर्ट के इस फैसले को 14 जुलाई 2026 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के समक्ष भी उठाया गया. वरिष्ठ वकीलों ने इस आदेश पर गहरी चिंता व्यक्त की और इसकी तुलना इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक पुराने विवादास्पद फैसले से की, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने इस साल की शुरुआत में रद्द कर दिया था. इस मामले पर संज्ञान लेते हुए मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने भी चिंता जताई. सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में फैसलों से पहले गहन न्यायिक शोध और संवेदनशीलता की अत्यंत आवश्यकता है.
(The above story first appeared on LatestLY on Jul 15, 2026 10:47 AM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

