सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: अपनी मर्जी से सेक्स वर्क करने वाले वयस्कों पर पुलिस नहीं कर सकती कार्रवाई, 'जबरन पुनर्वास' पर भी लगाई रोक
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि वयस्कों द्वारा अपनी मर्जी से सेक्स वर्क करना भारतीय कानून के तहत अवैध नहीं है. कोर्ट ने कहा कि अनैतिक व्यापार अधिनियम (ITPA) के तहत पुलिस के पास सहमति से यह कार्य करने वाले वयस्कों को गिरफ्तार करने या प्रताड़ित करने का कोई अधिकार नहीं है. इसके साथ ही, अदालत ने किसी भी सेक्स वर्कर को उसकी इच्छा के विरुद्ध जबरन पुनर्वास केंद्र में भेजने पर भी रोक लगा दी है.
नई दिल्ली, 1 जून: भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने देश में सेक्स वर्क (Sex Work) और उससे जुड़े कानूनी प्रावधानों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि वयस्कों द्वारा अपनी मर्जी से किया जाने वाला सेक्स वर्क (Voluntary Sex Work) भारतीय कानून के तहत अवैध नहीं है. कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि पुलिस के पास अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम (ITPA) के तहत अपनी सहमति से इस पेशे में शामिल वयस्कों को गिरफ्तार करने, परेशान करने या उनका उत्पीड़न करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। अदालत ने साफ किया कि यद्यपि वेश्यालय (Brothel) चलाना अभी भी गैरकानूनी है, लेकिन छापेमारी के दौरान पाई जाने वाली स्वैच्छिक सेक्स वर्कर्स को पीड़ित नहीं बनाया जा सकता और न ही उन्हें हिरासत में लिया जा सकता है. यह भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: शादी में 'एडजस्ट' करने या मायके लौटने की सलाह देना ससुराल वालों की 'क्रूरता' नहीं; रिश्तेदारों के खिलाफ केस खारिज
जस्टिस पारदीवाला और जस्टिस महादेवन की बेंच का फैसला; 'बचाव' की जरूरत नहीं
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने करीब 70 साल पुराने आईटीपीए (ITPA) कानून के प्रावधानों का गहन विश्लेषण करते हुए यह फैसला दिया. बेंच ने अपने आदेश में कहा कि इस कानून की धाराएं पुलिस को उन वयस्कों पर कार्रवाई करने का अधिकार बिल्कुल नहीं देतीं जो अपनी स्वतंत्र इच्छा से इस कार्य में लगे हैं.
लाइव लॉ (Live Law) की रिपोर्ट के अनुसार, पीठ ने बेहद सरल तर्क देते हुए कहा, "चूंकि ऐसी महिलाएं अपनी मर्जी से इस पेशे में शामिल हैं, इसलिए उन्हें जबरन 'बचाने' (Rescue) का सवाल ही पैदा नहीं होता." यह फैसला व्यावसायिक यौन शोषण के लिए होने वाली मानव तस्करी के पीड़ितों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए दायर एक विविध याचिका पर सुनवाई के दौरान आया है.
इच्छा के विरुद्ध 'जबरन पुनर्वास' असंवैधानिक; सहमति सर्वोपरि
सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्वास की आड़ में होने वाली प्रशासनिक मनमानी पर रोक लगाते हुए आदेश दिया कि किसी भी सेक्स वर्कर को उसकी मर्जी के खिलाफ पुनर्वास प्रक्रिया से नहीं गुजारा जा सकता. बेंच ने कहा, "पुनर्वास का संवैधानिक अधिकार राज्य को यह दायित्व सौंपता है कि वह पीड़ितों को सहायता और साधन प्रदान करे. हालांकि, यह अधिकार राज्य को किसी भी पीड़ित की इच्छा के विरुद्ध उस पर जबरन पुनर्वास प्रक्रिया थोपने की अनुमति नहीं देता है."
अदालत ने इसके साथ ही आईटीपीए की धारा 17 में अंतर्निहित उन पितातुल्य (Paternalistic) धारणाओं को खारिज कर दिया, जिसके तहत अब तक वेश्यालयों या संबंधित परिस्थितियों से छुड़ाए गए सभी व्यक्तियों के साथ एक जैसा व्यवहार किया जाता था—चाहे वे तस्करी के शिकार हों, मजबूर हों, या अपनी मर्जी से काम कर रहे हों.
'वन-साइज़-फिट्स-ऑल' दृष्टिकोण खारिज; मजिस्ट्रेटों को दिए निर्देश
अदालत ने मौजूदा न्यायिक व पुलिस प्रक्रिया को 'वन-साइज़-फिट्स-ऑल' (सभी के लिए एक ही पैमाना) बताते हुए कहा कि यह दृष्टिकोण मजिस्ट्रेटों के सामने पेश किए जाने वाले व्यक्तियों की विविध वास्तविकताओं को समझने में विफल रहता है. अब से, जब भी किसी वयस्क को धारा 17 के तहत कोर्ट में पेश किया जाएगा, तो मजिस्ट्रेट को सबसे पहले यह प्रारंभिक जांच (Threshold Inquiry) करनी होगी कि क्या वह महिला अपनी मर्जी से इस काम में है और क्या वह सुरक्षात्मक कस्टडी में जाने के लिए सहमत है.
वरिष्ठ अधिवक्ता अपर्णा भट द्वारा प्रस्तुत 'विक्टिम प्रोटेक्शन प्लान' को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने माना कि व्यावसायिक यौन शोषण के लिए होने वाली तस्करी के पीड़ितों को केवल बचाव और पुनर्वास की एक निष्क्रिय वस्तु (Passive Objects) नहीं माना जा सकता. उनके निर्णयों, स्वायत्तता और व्यक्तिगत परिस्थितियों को ही अधिकारियों के हर फैसले का आधार बनना चाहिए. अदालत की इस व्यवस्था से देश भर में पुलिस की कार्यप्रणाली और मजिस्ट्रेटों के निर्णयों में बड़ा बदलाव आने की उम्मीद है.