जर्मनी और फ्रांस मिलकर लड़ाकू विमान बनाना चाहते थे, लेकिन ये कोशिश परवान नहीं चढ़ सकी. इससे दोनों की सहयोग बढ़ाने की इच्छा कम नहीं हुई है.यूरोपीय संघ की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं रक्षा सहयोग के नए रास्ते तलाश रही हैं, इनमें परमाणु प्रतिरक्षा भी शामिल है. शुक्रवार को जर्मन शहर कोलोन के पास बेंसबर्ग कासल में फ्रेंच राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों और जर्मन चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स के नेतृत्व में दोनों देशों के शीर्ष अधिकारियों की सालाना बैठक हो रही है.
फ्रेंच नेता गुरुवार को जर्मनी पहुंच गए और राष्ट्रपति इमानुएल और चांसलर मैर्त्स ने रात्रिभोज पर अकेले में मुलाकात की. इसके साथ ही फ्रांको जर्मन डिफेंस एंड सिक्योरिटी काउंसिल की नोएरवेनिष लुफ्टवाफे एयर बेस पर बैठक हो रही है. इस एयरबेस पर दो फ्रेंच रफाएल जेट गुरुवार को तैनात किए गए हैं. ये विमान परमाणु हथियारों को ढोने में सक्षम हैं.
यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद की परिस्थितियों में यूरोप अपनी रक्षा पंक्ति मजबूत कर है और एक बार फिर से यूरोपीय देश हथियारों के विकास में गहरी दिलचस्पी ले रहे हैं. डॉनल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद यूरोप के साथ रक्षा संबंधों में अमेरिका का घटता सहयोग भी एक कारण है.
यूरोप की सुरक्षा में नाटो के आगे बड़ी चुनौतियां
फ्रांसिसी राष्ट्रपति के कार्यालय का कहना है कि शुक्रवार की बातचीत से वह "ठोस" परियोजनाओं को आगे ले जाना चाहते हैं ताकि पिछले महीने फ्यूचर कॉमबैट एयर सिस्टम (एफसीएएस) की विकास परियोजना के रद्द होने से जो झटका लगा है उससे उबरा जा सके. माक्रों ने इस परियोजना के रद्द होने पर "गहरा अफसोस" जताया. माना जाता है कि यह परियोजना एयरबस और दासो की उठापटक से फंस गई. इसमें एयरबस जर्मनी और स्पेन का प्रतिनिधित्व कर रही थी जबकि दासो फ्रांस का.
जर्मन सरकार ने इस बात पर जोर दिया है कि भले ही यह परियोजना रद्द हो गई लेकिन उसके जो मुख्य लक्ष्य था वह बना रहेगा. इसमें एक इंटिग्रेटेड डिजिटल "नर्वस सिस्टम" बनाने की कोशिश है जिसके जरिए जेट विमानों को ड्रोन, सेंसर और दूसरी तकनीकों से जोड़ा जाएगा.
फ्रांस की निराशा
दोनों देश उत्साह जगाने वाली बात कह रहे हैं हालांकि मेन ग्राउंड कॉम्बैट सिस्टम (एमजीसीएस) परियोजना को लेकर भी आशंकाएं उठ रही हैं. एमजीसीएस परियोजना के तहत उन टैंकों को बदला जाना है जिसका जर्मनी और फ्रांस फिलहाल इस्तेमाल कर रहे हैं.
जर्मनी की राइनमेटाल कंपनी के इस परियोजना में शामिल होने के बाद से आंतरिक तनाव की खबरें आई हैं. टैंक के कंसेप्ट को लेकर काफी असहमतियां हैं.
इसके अलावा एयर डिफेंस भी एक ऐसा मुद्दा है जिसे लेकर दोनों देशों के बीच सहमति नहीं बन पा रही है. जर्मनी यूरोपीयन स्काई शील्ड इनिशिएटिव के लिए दबाव बना रहा है. इस सिस्टम में अमेरिकी पैट्रियट और इस्राएली अमेरिकी एरो 3 सिस्टम पर बहुत अधिक निर्भरता है. फ्रांस ने इसमें शामिल होने से मना कर दिया है. उसका कहना है कि यह अमेरिका पर यूरोप की निर्भरता को और बढ़ाएगा. फ्रांस का मानना है कि यूरोपीय देशों को अपने रक्षा उद्योग को मजबूत करना चाहिए.
फ्रांस और जर्मनी के रिश्तों के विशेषज्ञ जैकब रॉस ने हाल ही में एक आर्टिकल में लिखा कि ईएसएसआई और जर्मनी के पहले खरीदे अमेरिकी लड़ाकू विमान एफ 35 पर फ्रांस के नेताओं की निराशा एफसीएएस के रद्द होने के बाद "गुस्से में बदल" गई.
क्या अकेले चलना चाहता है जर्मनी?
मैर्त्स ने यह महत्वाकांक्षा जताई है कि वह जर्मनी को "यूरोप में सबसे मजबूत पारंपरिक सेना" देना चाहते हैं. जर्मनी के नाजी इतिहास की काली छाया के बाद भी जर्मनी के सहयोगी इसका स्वागत कर रहे हैं.
फ्रांस दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार निर्यातक देश है. जर्मन उद्योग के हाल में रक्षा विकास की ओर तेजी से बढ़े कदमों से फ्रांस को प्रतिस्पर्धा बढ़ने का डर और चिंता है. इसके अलावा ग्रेटर यूरोपीयन सॉवरेनिटी को लेकर फ्रांस में शंका है कि क्या जर्मनी उनके रुख को स्वीकार करेगा.
फ्रांस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने समाचार एजेंसी एएफपी से कहा, "यूरोप में ज्यादा रणनीतिक स्वायत्तता का प्रोजेक्ट, मजबूत नाटो के अंदर मजबूत यूरोप जर्मनी के बगैर नहीं हो सकता और जब यह दिख रहा है कि जर्मनी अब अकेले आगे बढ़ रहा है तो हमारी चिंता है कि हम इसे संभाल नहीं पाएंगे."
इन असहमतियों ने दोनों सहयोगियों के लिए यह जरूरी कर दिया है कि वे दूसरे मुद्दों पर तेजी से प्रगति करें. खासतौर से परमाणु प्रतिरक्षा की योजना जिसका नेतृत्व फ्रांस कर रहा है.
माक्रों ने इस साल की शुरुआत में कहा था कि जर्मनी उन आठ देशों में एक है जो इस प्रोजेक्ट में भागीदारी के लिए सहमत हुए हैं. हालांकि उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि फ्रांस परमाणु मुद्दों पर निर्णय लेने के अधिकार पर कड़ा नियंत्रण रखेगा. पश्चिमी यूरोप की दो परमाणु शक्तियों में फ्रांस और ब्रिटेन शामिल हैं.
जर्मन सरकार के एक सूत्र का कहना है कि फ्रांस के नेतृत्व वाले किसी भी प्रोजेक्ट के लिए यह जरूरी है कि वह नाटो का "पूरा करने वाला" बना रहे और यूरोप के भीतर "अलग सुरक्षा क्षेत्र" बनाने से बचे.
उम्मीद की जा रही है कि शुक्रवार की बैठक में फ्रांस और जर्मनी का एक "स्टीयरिंग ग्रुप" बनेगा जो रडार सिस्टम, गहरे हमले की क्षमता और मिसाइल डिफेंस पर सहयोग को गहरा बनाने पर का करेगा. माक्रों और मैर्त्स यूरोपीय प्रतियोगितात्मकता, यूरोपीय संघ के बजट, डिजिटल रेग्यूलेशन और डिसइंफॉर्मेशन से लड़ाई पर भी चर्चा करेंगे.
उम्मीद जगाने वाली बातें
फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों ने गुरुवार को कहा कि वह दोनों देशों को दोबारा करीब आते देख रहे हैं. उन्होंने यह भी कहा कि जर्मनी के साथ सहयोग में वह नई जान फूंकना चाहते हैं और प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर जर्मनी के साथ मिल कर काम करना चाहते हैं. माक्रों ने कहा, "मुझे यकीन है कि मै ऐसा कह सकता हूं, पिछले कुछ महीने में यूरोपीय एजेंडे पर जर्मनी और फ्रांस की वास्तविक घनिष्ठता बढ़ी है."
फ्रेंच राष्ट्रपति का जर्मन चांसलर ने ब्रुल के श्लॉस आगुस्टुसबुर्ग में स्वागत किया. जर्मन चांसल ने ध्यान दिलाया "यह जगह, यह ठिकाना, यह कासल" वही है जहां 65 साल पहले फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति चार्ल्स डे गॉल ने जर्मन चांसलर कोनराड आडेावर के साथ फ्रांको-जर्मन फ्रेंडशिप ट्रीटी की थी. मैर्त्स ने कहा कि आज भी हमारे साझे कामों का आधार वही ट्रीटी है.
जर्मन चांसलर और फ्रेंच राष्ट्रपति के अलावा दोनों देशों के 10 मंत्रालयों के मंत्री और अधिकारी इस बैठक में हिस्सा ले रहे हैं.













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