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दिल्ली HC का पुरुष के हक़ में बड़ा फैसला, भरण-पोषण के मामले में पति की आयकर जानकारी के लिए पत्नी नहीं कर सकती RTI का इस्तेमाल

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि कोई पत्नी भरण-पोषण (मासिक भत्ते) के मुकदमे में पति की आयकर जानकारी हासिल करने के लिए आरटीआई (RTI) एक्ट का इस्तेमाल नहीं कर सकती. कोर्ट ने इसे व्यक्तिगत जानकारी मानते हुए आरटीआई के दायरे से बाहर रखा है.

दिल्ली HC का पुरुष के हक़ में बड़ा फैसला, भरण-पोषण के मामले में पति की आयकर जानकारी के लिए पत्नी नहीं कर सकती RTI का इस्तेमाल

नई दिल्ली. दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने वैवाहिक विवादों और सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम के अंतर्संबंधों पर एक बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि कोई भी पत्नी अपने भरण-पोषण (मेंटेनेंस) के मामले में सबूत के तौर पर इस्तेमाल करने के लिए आरटीआई अधिनियम, 2005 का सहारा लेकर अपने पति के आयकर रिटर्न (ITR) या वित्तीय विवरण की जानकारी हासिल नहीं कर सकती. जस्टिस पुरूषेंद्र कुमार कौरव की एकल पीठ ने कहा कि आयकर विवरण एक 'व्यक्तिगत जानकारी' है, जिसे आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(j) के तहत सार्वजनिक प्रकटीकरण से छूट प्राप्त है.

केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) का आदेश रद्द

हाई कोर्ट ने यह फैसला उस पति की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया, जिसने केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के 22 जुलाई 2021 के एक आदेश को चुनौती दी थी. सीआईसी ने अपने आदेश में आयकर विभाग को निर्देश दिया था कि वह वित्तीय वर्ष 2007-08 से पति की शुद्ध कर योग्य आय (Net Taxable Income) का विवरण उसकी पत्नी को सौंपे.  यह भी पढ़े:  HC on Maintenance for Wife: पत्नी पढ़ी लिखी हो तब भी मिलना चाहिए मेंटेनेंस, तलाक मांगने से खत्म नहीं होता अधिकार; दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला

हाई कोर्ट ने सीआईसी के इस निर्देश को कानूनन अमान्य ठहराते हुए रद्द कर दिया. कोर्ट ने कहा कि निजी वैवाहिक विवादों को किसी व्यक्ति की गोपनीय वित्तीय जानकारी में ताक-झांक करने का आधार नहीं बनाया जा सकता, विशेषकर तब जब वैवाहिक कानूनों के तहत ऐसे खुलासे के लिए पहले से ही कानूनी उपाय मौजूद हैं.

दोनों पक्षों की दलीलें और निजता का अधिकार

मामले की सुनवाई के दौरान पति के वकील ने तर्क दिया कि आयकर रिकॉर्ड का किसी भी सार्वजनिक गतिविधि या जनहित से कोई संबंध नहीं है. इसलिए इसे साझा करना निजता के अधिकार का सीधा उल्लंघन होगा. सीआईसी ने केवल वैवाहिक विवाद लंबित होने के कारण इस संवेदनशील डेटा को उजागर करने का गलत आदेश दिया था.

दूसरी ओर, पत्नी के वकील ने दलील दी कि अपने मेंटेनेंस के दावे को मजबूती से अदालत के सामने रखने के लिए पति की वास्तविक आय जानना उसका वैध अधिकार है. उचित न्याय के लिए यह वित्तीय जानकारी अत्यंत आवश्यक है.

धारा 8(1)(j) पर हाई कोर्ट की व्याख्या

अदालत ने आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(j) के वैधानिक ढांचे का बारीकी से परीक्षण किया. कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले 'गिरीश रामचंद्र देशपांडे बनाम केंद्रीय सूचना आयुक्त' का हवाला देते हुए दोहराया कि आयकर रिटर्न पूरी तरह से व्यक्तिगत जानकारी है.

जस्टिस कौरव ने अपने फैसले में कहा कि कानून का सामान्य नियम यही है कि व्यक्तिगत जानकारी को तब तक उजागर नहीं किया जा सकता जब तक कि उसमें कोई बड़ा व्यापक जनहित (Larger Public Interest) शामिल न हो. आरटीआई का मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक प्राधिकरणों में पारदर्शिता लाना है, न कि व्यक्तिगत विवादों के लिए निजी जानकारी का जरिया बनना.

आरटीआई वैवाहिक कानूनों का विकल्प नहीं

हाई कोर्ट ने पत्नी के तर्कों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि आरटीआई तंत्र को निजी मुकदमों में सबूत इकट्ठा करने के समानांतर उपकरण (Parallel Tool) में नहीं बदला जा सकता. अदालत ने रेखांकित किया कि वैवाहिक कानूनों के तहत पत्नियों के पास पहले से ही पर्याप्त कानूनी उपाय मौजूद हैं.

सुप्रीम कोर्ट के 'रजनेश बनाम नेहा' मामले के फैसले का जिक्र करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि मेंटेनेंस के मामलों में दोनों पक्षों को अपनी आय, संपत्ति और देनदारियों का विस्तृत हलफनामा (Affidavit) अदालत के समक्ष दाखिल करना अनिवार्य होता है. यदि पत्नी को पति की आय की जानकारी चाहिए, तो उसे आरटीआई के बजाय संबंधित फैमिली कोर्ट या सक्षम अदालत के माध्यम से ही वित्तीय खुलासे की मांग करनी चाहिए.

(The above story first appeared on LatestLY on Jul 18, 2026 03:19 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).