Kerala HC Decision: केरल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, बच्चे के निजी अंग को यौन मंशा से चूमना POCSO के तहत 'पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट'
केरल उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यौन मंशा से बच्चे के निजी अंग (पेनिस) को चूमना पॉक्सो अधिनियम के तहत पैनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट की श्रेणी में आता है.
Kerala HC Decision: केरल उच्च न्यायालय ने बच्चों के संरक्षण से जुड़े कानून पर एक महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या प्रस्तुत की है. अदालत ने फैसला सुनाया है कि यौन मंशा (Sexual Intent) के साथ किसी बच्चे के निजी अंग (पेनिस) को चूमना या मुंह लगाना, यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत पैनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट (Penetrative Sexual Assault) की श्रेणी में आता है.
न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन की एकल पीठ ने 61 वर्षीय व्यक्ति की अपील को खारिज करते हुए यह निर्णय दिया. इसके साथ ही अदालत ने पठानमथिट्टा की विशेष अदालत द्वारा आरोपी को सुनाई गई 20 साल की कठोर कारावास की सजा और 1 लाख रुपये के जुर्माने को बरकरार रखा है. यह भी पढ़े: Disha Salian Death Case: दिशा सालियन मौत मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा आदेश, CBI को FIR दर्ज कर जांच करने के दिए निर्देश
पॉक्सो अधिनियम की धारा 3(d) की कानूनी व्याख्या
अदालत ने पॉक्सो अधिनियम की धारा 3(d) का विश्लेषण करते हुए स्पष्ट किया कि इस कानून के तहत अपराध साबित करने के लिए गहरे पैनेट्रेशन (Deeper Penetration) या ओरल सेक्स की आवश्यकता नहीं है.
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि किसी बच्चे के लिंग, योनि, गुदा या मूत्रमार्ग पर यौन इरादे से मुंह लगाना ही statutory आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त है. जब भी यौन मंशा के साथ मुंह से निजी अंग का स्पर्श होता है, तो वह कार्य धारा 3(d) के तहत पैनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट माना जाएगा और धारा 4 के तहत दंडनीय होगा.
क्या था पूरा मामला?
अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह घटना 26 जनवरी 2020 को घटी थी. आरोपी ने साढ़े 14 साल के एक नाबालिग लड़के को अपनी दुकान में बुलाया. वहां उसने पीड़ित को शराब और गांजे की बीड़ी दी और उसके साथ दो बार यौन उत्पीड़न किया.
पठानमथिट्टा की फास्ट ट्रैक विशेष अदालत ने आरोपी को गंभीर पैनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट (Aggravated Penetrative Sexual Assault) का दोषी ठहराते हुए पॉक्सो अधिनियम की धारा 5(l) और 6 के साथ-साथ किशोर न्याय (JJ) अधिनियम की धाराओं के तहत 20 साल की सजा सुनाई थी.
उच्च न्यायालय ने खारिज की आरोपी की दलीलें
सुनवाई के दौरान आरोपी के वकील ने दलील दी कि पीड़िता के आचरण में समस्याएं थीं और आरोपी को झूठे मामले में फंसाया गया है.
हालांकि, उच्च न्यायालय ने पीड़िता के बयान, मेडिकल साक्ष्यों और दस्तावेजी सबूतों की समीक्षा के बाद गवाही को विश्वसनीय पाया. अदालत ने माना कि आरोपी ने दो बार यह अपराध किया था, इसलिए बार-बार किए गए अपराध से जुड़ी धाराओं के तहत भी सजा पूरी तरह उचित और कानूनी रूप से सही है
(The above story first appeared on LatestLY on Sep 02, 2026 04:14 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

