PM Modi Degree Row: क्या है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री से जुड़ा विवाद? दिल्ली हाईकोर्ट कल 20 अगस्त को सुनाएगा अपना फैसला

PM Modi Degree Row: दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) कल यानी 20 अगस्त को एक अहम फैसला सुनाने जा रहा है, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) की स्नातक की डिग्री से जुड़ा है. मामला साल 2016 का है, जब केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने आदेश दिया था कि दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) पीएम मोदी की बीए की डिग्री की जानकारी सार्वजनिक करे. इस आदेश को चुनौती देते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. इस मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (Solicitor General Tushar Mehta) ने दलील दी थी कि सीआईसी का आदेश सही नहीं है और इसे रद्द किया जाना चाहिए.

उन्होंने कहा कि रिकॉर्ड अदालत (Delhi High Court) में पेश किए जा सकते हैं, लेकिन उन्हें सार्वजनिक करने से किसी व्यक्ति के प्रचार या राजनीतिक मकसद को बढ़ावा ही मिलेगा.

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RTI का दायरा बढ़ने से क्या होगा?

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने यह भी कहा कि अगर सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम का दायरा बहुत ज्यादा  बढ़ा दिया गया, तो सरकारी संस्थानों का कामकाज प्रभावित हो सकता है.

आखिर क्या है पूरा विवाद?

यह विवाद एक आरटीआई आवेदन से शुरू हुआ था, जो नीरज नाम के एक व्यक्ति ने दायर किया था. इसी आधार पर, केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने 21 दिसंबर 2016 को आदेश दिया था कि 1978 में बीए पास (BA Pass) करने वाले सभी छात्रों के रिकॉर्ड की जांच की जा सकती है. प्रधानमंत्री मोदी ने भी उसी वर्ष स्नातक की पढ़ाई पूरी की थी. हालांकि, 23 जनवरी 2017 को उच्च न्यायालय ने सीआईसी के आदेश पर रोक लगा दी थी.

दिल्ली विश्वविद्यालय (Delhi Univercity) का कहना है कि छात्रों की डिग्रियों से जुड़ी जानकारी "न्यायिक क्षमता" यानी भरोसे के तहत रखी जाती है और बिना किसी जनहित के इसका खुलासा नहीं किया जा सकता. दूसरी ओर, सीआईसी का मानना है कि विश्वविद्यालय सार्वजनिक संस्थान हैं और उनके रजिस्टर में दर्ज डिग्रियों को सार्वजनिक दस्तावेज माना जाना चाहिए.

कल HC सुनाएगा अपना फैसला

अब सबकी नजर कल आने वाले उच्च न्यायालय के फैसले पर है. यह देखना दिलचस्प होगा कि अदालत सीआईसी के आदेश को बरकरार रखती है या दिल्ली विश्वविद्यालय और केंद्र सरकार (Modi Government) की दलीलों को सही मानते हुए उसे खारिज कर देती है.

यह फैसला न केवल प्रधानमंत्री मोदी की डिग्री विवाद को प्रभावित करेगा, बल्कि आने वाले समय में आरटीआई अधिनियम की सीमाओं के बारे में भी एक बड़ा संकेत देगा.