एसआईआर के मुद्दे पर बंगाल सरकार और चुनाव आयोग के बीच टकराव चरम पर पहुंच गया है. खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस मुद्दे पर दायर मामले में सुप्रीम कोर्ट में दलीलें पेश की.पश्चिम बंगाल में एसआईआर के एलान के बाद से ही ममता बनर्जी और उनकी सरकार चुनाव आयोग के साथ दो-दो हाथ करने के मूड में है. लेकिन अब इस प्रक्रिया के अंतिम दौर में पहुंचने पर यह टकराव चरम पर पहुंच गया है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इसके खिलाफ लगातार सड़कों पर उतरती रही हैं. उन्होंने इस मामले में चुनाव आयोग को आड़े हाथों लेते हुए उस पर केंद्र और बीजेपी के इशारों पर काम करने का आरोप लगाया है. उन्होंने एसआईआर के विरोध में आयोग को आधा दर्जन पत्र लिखे हैं.
मुख्यमंत्री के साथ ही उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस भी इस मुद्दे पर हमलावर है. यही वजह है कि इसकी सुनवाई के दौरान कई जगह तोड़-फोड़ और आगजनी भी हो चुकी है. ममता का आरोप है कि हड़बड़ी में शुरू की गई इस कवायद का मकसद वैध मतदाताओं के नाम सूची से हटाना है. उनके मुताबिक, इसके आतंक के कारण अब तक सौ से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. उन्होंने इसके खिलाफ बड़े पैमाने पर आंदोलन की भी चेतावनी दी है.
ममता बनर्जी का आरोप है कि ड्राफ्ट मतदाता सूची में भारी तादाद में जीवित लोगों को मृत बताते हुए उनके नाम काट दिए गए हैं. ऐसे ही कुछ वोटरों के साथ ममता फिलहाल दिल्ली में हैं. वहां सोमवार को उन्होंने चुनाव आयोग के दफ्तर में जाकर अधिकारियों से मुलाकात की थी. लेकिन घंटे भर की बैठक के बाद बाहर निकलने पर पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने उनका अपमान किया है और किसी भी सवाल का संतोषजनक जवाब नहीं दिया है. हालांकि बाद में आयोग के जारी बयान में ममता के आरोपों को झूठा करार दिया गया.
सुप्रीम कोर्ट में ममता बनर्जी
एसआईआर के जरिए आम लोगों को परेशानकरने का आरोप लगाते हुए तृणमूल कांग्रेस नेताओं के अलावा खुद ममता बनर्जी ने भी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और आयोग के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है. बुधवार को इन पर होने वाली सुनवाई में शामिल होकर अपना पक्ष रखने के लिए खुद ममता भी सुप्रीम कोर्ट में मौजूद थीं.
यह देश में अपने किस्म का पहला मामला है जब किसी मुख्यमंत्री ने शीर्ष अदालत में किसी याचिका की पैरवी की हो. यहां इस बात का जिक्र प्रासंगिक है कि ममता के पास वकालत की डिग्री भी है.
ममता ने सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत से पांच मिनट बोलने की अनुमति मांगी. मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि बंगाल में एसआईआर का मकसद वोटरों के नाम काटना है. किसी न किसी बहाने लोगों के नाम सूची से हटाए जा रहे हैं. उनका सवाल था कि दो साल का काम दो महीने में कैसे पूरा हो सकता है. उनका आरोप था कि इसके जरिए बंगाल को निशाना बनाया जा रहाहै. उन्होंने यह भी पूछा कि असम में यह कवायद क्यों नहीं की जा रही है.
ममता ने अदालत से लोकतंत्र की रक्षा करने की गुहार लगाते हुए कहा कि मतदाता सूची से 58 लाख लोगों के नाम हटा दिए गए हैं. उनमें से कई लोग जीवित हैं. उनका कहना था कि अदालत के निर्देश के बावजूद आधार कार्ड के साथ ही दूसरे दस्तावेज भी मांगे जा रहे हैं.
सुनवाई के बाद अदालत ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया. इस मामले की अगली सुनवाई नौ फरवरी को होगी.
अहम चुनावी मुद्दा
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि एसआईआर के मुद्दे पर ममता और चुनाव आयोग की लड़ाई अप्रैल में होने वाले चुनाव तक जारी रहने की संभावना है. तृणमूल कांग्रेस इसे केंद्र और बीजेपी के खिलाफ सबसे प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में है.
राजनीतिक विश्लेषक और करीब चार दशकों से ममता की राजनीतिको करीब से देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार पुलकेश घोष डीडब्ल्यू से कहते हैं, "ममता भले बीते 15 साल से सत्ता में हों, उनके तेवर अब भी विपक्षी नेता की तरह ही हैं. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में भी कहा कि वे आम लोगों की लड़ाई लड़ रही हैं, अपनी पार्टी की नहीं."
उनका कहना था कि बंगाल में एसआईआर के कारण होने वाली मौतों और लोगों को सुनवाई के दौरान होने वाली परेशानी की खबरें मीडिया में छाई रही हैं. ममता ने इसे केंद्र और बीजेपी के खिलाफ एक बड़ा मुद्दा बना लिया है. वे केंद्र पर आयोग के जरिए बदले की राजनीति करने का आरोप लगा रही हैं. उनकी इस मुहिम को आम लोगों का भी समर्थन मिल रहा है.
एक अन्य राजनीतिक विश्लेषक शिखा मुखर्जी डीडब्ल्यू से कहती हैं, "ममता यह नैरेटिव बनाने में कामयाब होती नजर आ रही हैं कि केंद्र सरकार ने एसआईआर को बंगाल के आम लोगों के खिलाफ अपना प्रमुख राजनीतिक हथियार बना लिया है. वे आम लोगों की नब्ज पकड़ने में माहिर रही हैं. इसी वजह से इस मुद्दे को जोर-शोर से उठा रही हैं. यह सिलसिला चुनाव तक जारी रहेगी, इसमें कोई संदेह नहीं है."
विश्लेषकों का कहना है कि बीजेपी भी इस मुद्दे पर बैकफुट पर नजर आ रही है. उसे फिलहाल इसकी काट नहीं सूझ रही है. ममता पर सीमा पार से घुसपैठ को बढ़ावा देने जैसे उसके आरोप भी दमदार साबित नहीं हुए हैं. इसकी वजह यह है कि एसआईआर की ड्राफ्ट सूची में कहीं भी बांग्लादेशी या रोहिंग्या वोटरों के नाम सूची में होने का जिक्र नहीं है.













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