ताइवान के पास फिर मंडराए चीन के लड़ाकू विमान

ताइवान के आसपास दो हफ्तों तक चीनी सैन्य उड़ानों में 'अचानक गिरावट' के बाद फिर से गतिविधि तेज हो गई है.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

ताइवान के आसपास दो हफ्तों तक चीनी सैन्य उड़ानों में 'अचानक गिरावट' के बाद फिर से गतिविधि तेज हो गई है. ताइवान ने 26 चीनी विमान और नौसेना के कई जहाज देखे हैं.ताइवान के आसपास चीन की सैन्य गतिविधि एक बार फिर तेज होती दिख रही हैं. ताइवान के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, द्वीप के आसपास अचानक चीनी सैन्य विमानों की संख्या बढ़ गई है. इससे पहले करीब दो हफ्तों तक ऐसी गतिविधियों में ‘असामान्य' गिरावट देखी गई थी, जिसने जानकारों को हैरान कर दिया था.

समाचार एजेंसी एपी के अनुसार ताइवान ने शनिवार को 26 चीनी सैन्य विमान और सात नौसैनिक जहाज डिटेक्ट किए. इनमें से 16 विमान ताइवान के मध्य और दक्षिण-पश्चिमी वायु रक्षा पहचान क्षेत्र (एडीआईजेड) में दाखिल हुए.

दो हफ्तों की ‘रहस्यमयी' शांति के बाद बढ़ी गतिविधि

ताइवान के रक्षा मंत्रालय के मुताबिक 27 फरवरी से 5 मार्च तक पूरे एक हफ्ते के दौरान कोई भी चीनी सैन्य विमान ताइवान स्ट्रेट की मध्य रेखा पार करके उसके वायु रक्षा पहचान क्षेत्र में नहीं आया. इसके बाद 6 मार्च को केवल दो विमान देखे गए, जबकि अगले चार दिनों तक फिर कोई गतिविधि दर्ज नहीं हुई. इसके बाद बुधवार से शुक्रवार के बीच फिर कुछ विमान देखे गए.

विश्लेषकों का कहना है कि यह गिरावट असामान्य थी, क्योंकि चीन पिछले कई वर्षों से लगभग रोजाना ताइवान के आसपास अपने लड़ाकू विमान और नौसैनिक जहाज भेजता रहा है. कुछ विशेषज्ञों के मुताबिक यह गिरावट चीन की संसद की वार्षिक बैठक के दौरान आई थी. एजेंसी के मुताबिक ऐसे बड़े राजनीतिक कार्यक्रमों के समय पहले भी सैन्य गतिविधि कम देखी गई है, लेकिन इस बार गिरावट पहले की तुलना में कहीं अधिक स्पष्ट थी.

क्या अमेरिका यात्रा से जुड़ा है यह बदलाव?

जानकारों के मुताबिक हालिया गिरावट का एक कारण अमेरिका के साथ संबंधों को बेहतर करना भी हो सकता है. व्हाइट हाउस ने कहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप 31 मार्च से 2 अप्रैल के बीच चीन की यात्रा करेंगे, हालांकि बीजिंग ने अभी तक इस दौरे की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है.

कुछ लोगों का मानना है कि हो सकता है कि चीन इस यात्रा से पहले तनाव कम करने की कोशिश कर रहा हो. वहीं अन्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव चीन की सेना के प्रशिक्षण और आधुनिकीकरण की नई रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है. उनके अनुसार, चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी शायद अपनी विभिन्न सैन्य शाखाओं के बीच संयुक्त प्रशिक्षण के नए मॉडल पर काम कर रही है.

ताइवान पर चीन का दावा और बढ़ता सैन्य दबाव

चीन लंबे समय से ताइवान को अपना हिस्सा बताता रहा है और उसने जरूरत पड़ने पर बल प्रयोग से उसे अपने नियंत्रण में लेने की चेतावनी भी दी है. बीजिंग ने हाल के वर्षों में ताइवान पर सैन्य दबाव बढ़ाने के लिए अपने लड़ाकू विमानों और नौसैनिक जहाजों को लगभग रोज इस द्वीप के आसपास भेजना शुरू किया है.

ताइवान की सेना ने हालांकि साफ किया है कि हालिया गिरावट के बावजूद उसने अपनी रक्षा नीति में कोई बदलाव नहीं किया है. ताइवान के रक्षा मंत्री वेलिंगटन कू ने पहले कहा था कि भले ही सैन्य उड़ानों में कमी आई हो, लेकिन चीन की नौसेना आसपास के समुद्री इलाकों में सक्रिय ही रही है.

चीन और ताइवान के बीच क्या है मसला?

चीन और ताइवान के बीच विवाद की जड़ें 1949 के चीनी गृहयुद्ध में हैं. उस समय चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने मेनलैंड चीन में सत्ता हासिल कर पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना पार्टी की स्थापना की, जबकि हार चुकी कुमिनतांग (राष्ट्रवादी पार्टी) की सरकार ताइवान द्वीप पर चली गई. तब से दोनों क्षेत्र अलग-अलग शासन व्यवस्था के तहत चल रहे हैं.

बीजिंग ताइवान को अपना ही हिस्सा मानता है और "एक चीन” नीति के तहत उसे आखिरकार अपने नियंत्रण में लाने की बात करता है, जरूरत पड़ने पर बल प्रयोग की चेतावनी भी देता रहा है. दूसरी ओर ताइवान ने समय के साथ एक लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था विकसित कर ली है और वहां के बहुत से लोग स्वशासन का समर्थन करते हैं. यही ऐतिहासिक, राजनीतिक और पहचान से जुड़ा विवाद आज तक दोनों पक्षों के बीच तनाव और सैन्य टकराव की आशंका का कारण बना हुआ है. अब विशेषज्ञों का मानना है कि चाहे यह चीन की सैन्य रणनीति में बदलाव हो या कूटनीतिक संदेश, ताइवान स्ट्रेट आने वाले समय में एशिया की सबसे संवेदनशील सुरक्षा चुनौतियों में से एक बना रहेगा.

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