Health Insurance Policy: स्वास्थ्य बीमा बदलने की सोच रहे हैं? कब और कैसे करें पोर्ट, जान लें ये अहम बातें
Health Insurance Policy Porting

How to port Health Insurance Policy: आज के समय में हेल्थ इंश्योरेंस (Health Insurance) यानी स्वास्थ्य बीमा के बहुत सारे विकल्प बाजार में उपलब्ध हैं. अब ग्राहक एक ही कंपनी पर निर्भर नहीं रहते, क्योंकि इंटरनेट और इंश्योरेंस से जुड़ी वेबसाइट्स की मदद से पॉलिसियों को समझना आसान हो गया है. अगर कोई व्यक्ति अपनी मौजूदा पॉलिसी से संतुष्ट नहीं है, तो वह उसे बदल भी सकता है, और खास बात यह है, कि पुराने फायदे जैसे नो-क्लेम बोनस (No-Claim Bonus) या वेटिंग पीरियड (Waiting Period) की छूट भी बरकरार रहती है. बीमा कंपनी को इसी तरह बदलने की प्रक्रिया को ‘पोर्टिंग’ (Porting) कहा जाता है.

क्या है पॉलिसी पोर्ट करना?

जब आप अपनी मौजूदा स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी को किसी दूसरी बीमा कंपनी में रिन्यूअल (Renewal) के समय ट्रांसफर करते हैं, तो इसे पोर्टिंग कहा जाता है. इसका मतलब यह है, कि आप बीमा कंपनी बदल सकते हैं, लेकिन अब तक के जो फायदे आपने कमाए हैं, जैसे नो-क्लेम बोनस या वेटिंग पीरियड की छूट वो नए बीमाकर्ता के साथ भी जारी रहते हैं. यह उपभोक्ताओं को एक बेहतर विकल्प चुनने की आज़ादी देता है.

हालांकि, कई बीमा विशेषज्ञों का मानना है, कि पॉलिसी पोर्ट करते समय जल्दबाज़ी न करें. यह एक उपयोगी अधिकार जरूर है, लेकिन इसे सिर्फ ठोस कारणों की वजह से ही इस्तेमाल करना चाहिए. बिना सोचे-समझे की गई पोर्टिंग आपके फायदे की जगह नुकसान भी कर सकती है.

लोग क्यों करते हैं हेल्थ इंश्योरेंस पोर्ट?

कई बार लोग अपनी हेल्थ पॉलिसी को इसलिए पोर्ट करते हैं, क्योंकि प्रीमियम ज्यादा हो जाता है, या क्लेम प्रक्रिया में दिक्कत आती है. बेहतर सुविधाएं जैसे ओपीडी (OPD) कवर या खराब ग्राहक सेवा भी इसकी वजह बनती हैं. शादी, बच्चों का जन्म या किसी की तबीयत बिगड़ने पर लोग अपनी बीमा जरूरतें फिर से तय करते हैं. हालांकि, बिना ठोस कारण के सिर्फ सुविधा होने पर पॉलिसी बदलना सही नहीं होता है.

कब और कैसे करें पोर्ट?

पोर्टिंग सिर्फ पॉलिसी के रिन्यूअल के वक्त ही संभव है. इसके लिए आपको नई बीमा कंपनी को कम से कम 45 दिन पहले सूचना देनी होती है, हालांकि 60 दिन पहले प्रक्रिया शुरू करना ज्यादा सही रहता है. यह पूरा सिस्टम बीमा नियामक संस्था आईआरडीएआई (IRDAI) द्वारा नियंत्रित होता है. पोर्टिंग के दौरान आपके पुराने फायदे जैसे वेटिंग पीरियड और बोनस बरकरार रहते हैं. नई बीमा कंपनी जरूरी दस्तावेज मिलने के सात दिन के भीतर फैसला लेती है.

पॉलिसी पोर्ट करने की स्टेप बाय स्टेप प्रक्रिया

रिसर्च करें और तुलना करें

पोर्टिंग से पहले अलग-अलग बीमा कंपनियों की पॉलिसियों का अच्छे से रिसर्च करें. कवरेज, प्रीमियम और नेटवर्क हॉस्पिटल्स के आधार पर उनकी तुलना जरूर करें.

दस्तावेज जमा करें

नई बीमा कंपनी में पोर्टिंग के लिए रिक्वेस्ट जमा करें. इसके साथ पॉलिसी प्रस्ताव फॉर्म, केवाईसी (KYC) दस्तावेज और मौजूदा पॉलिसी व क्लेम से जुड़ी जानकारी भी दें.

जरूरी डॉक्युमेंट्स सबमिट करे

नई बीमा कंपनी में पोर्टिंग प्रक्रिया के दौरान आपको कुछ जरूरी दस्तावेज जमा करने होते हैं, जैसे की प्रस्ताव फॉर्म, केवाईसी डॉक्यूमेंट, मौजूदा पॉलिसी और क्लेम का पूरा विवरण. इसके बाद बीमा कंपनी अंडरराइटिंग प्रोसेस (Underwriting Process) के तहत आईआरडीएआई पोर्टल से आपकी जानकारी लेकर जरूरी जांच करती है, जिसमें मेडिकल टेस्ट या फोन पर वेरिफिकेशन शामिल हो सकता है.

मंजूरी और पेमेंट

जब आपकी पोर्टिंग रिक्वेस्ट मंजूर हो जाती है, तो आपको नया प्रीमियम भरना होता है. इसके बाद आपकी पुरानी पॉलिसी से जुड़े फायदे जैसे वेटिंग पीरियड और नो-क्लेम बोनस नई पॉलिसी में भी जारी रहते हैं, लेकिन सिर्फ मौजूदा सम एश्योर्ड (Sum Assured) तक ही.

पोर्टिंग से पहले किन बातों का ध्यान रखें?

सिर्फ कम प्रीमियम देखकर अपनी हेल्थ पॉलिसी को बदलना समझदारी नहीं है. नया प्लान लेते समय यह जरूर जांचें कि पहले वाले फायदे जैसे नो-क्लेम बोनस और वेटिंग पीरियड की छूट आपको मिल रही है, या नहीं मिल रही है. साथ ही सब-लिमिट (Sub-Limit), को-पेमेंट (Co-Payment) की शर्तें और नई कंपनी का क्लेम सेटलमेंट रिकॉर्ड भी देख लें. ध्यान रहे, अगर आपने बीमा कवर की राशि बढ़ाई है, तो उस अतिरिक्त रकम पर नए वेटिंग पीरियड लागू हो सकते हैं.

हेल्थ इंश्योरेंस पोर्टिंग एक समझदारी भरा फैसला तब बनता है, जब इसे सही वजह और सही समय पर किया जाए. लेकिन सिर्फ सुविधा देखकर या जल्दबाज़ी में पॉलिसी बदलना नुकसानदेह हो सकता है. इसलिए पहले पूरी रिसर्च करें, अपने डॉक्यूमेंट तैयार रखें और सोच-समझकर यह कदम उठाएं.