Migrant Workers in Trouble: वेतन नहीं मिला तो 7 दिन में1000 KM चलकर घर पहुंचे प्रवासी श्रमिक, बेंगलुरु से पहुंचे ओडिशा

कोविड-19 के बढ़ते मामलों के बीच ओडिशा के तीन निराश्रित प्रवासी श्रमिक सात दिन में 1,000 किलोमीटर पैदल चलकर बेंगलुरु से ओडिशा के कोरापुट आए और फिर यहां से कालाहांडी स्थित अपने-अपने घर पहुंचे.

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कोरापुट (ओडिशा), पांच अप्रैल: कोविड-19 के बढ़ते मामलों के बीच ओडिशा के तीन निराश्रित प्रवासी श्रमिक सात दिन में 1,000 किलोमीटर पैदल चलकर बेंगलुरु से ओडिशा के कोरापुट आए और फिर यहां से कालाहांडी स्थित अपने-अपने घर पहुंचे.

तीनों रविवार को जब अपने घर पहुंचे तो उनकी जेब खाली और हाथों में केवल पानी की बोतलें थीं. उनके पास कुछ था तो वह था इस लंबी यात्रा के दौरान के संघर्ष, कठिनाइयां, शोषण और अनजान लोगों से मिली मदद की कहानियां. COVID-19: कोविड संक्रमण से और बढ़ जाती है स्मृतिक्षय की समस्या: भारत में हुए अध्ययन में पता चला

कालाहांडी जिले के तिंगलकन गांव के बुडू मांझी, कटार मांझी और भिखारी मांझी तीनों को बेंगलुरु में उनका नियोक्ता कथित तौर पर वेतन नहीं दे रहा था, जिससे तंग आकर उन्होंने यह कठिन यात्रा करने की ठानी. उनकी मामूली सी बचत समाप्त हो गई थी उनके पास न तो भोजन था और न ही पैसे .

कोरापुट पहुंचने पर, उन्होंने पोतांगी ब्लॉक के पडलगुडा में स्थानीय लोगों को बताया कि उन्होंने 26 मार्च को अपनी यात्रा शुरू की थी और वे इन सात दिन में रात में भी चले. कुछ जगहों पर उन्हें सवारी भी मिली.

श्रमिकों की परेशानियों को समझते हुए कई लोग अनायास आगे आए और उनकी मदद की. एक दुकानदार ने उन्हें भोजन की पेशकश की, जबकि ओडिशा मोटर वाहन चालक एसोसिएशन की पोतंगी इकाई के अध्यक्ष भगवान पडल ने उन्हें 1,500 रुपये दिए. साथ ही नबरंगपुर के लिए उनके परिवहन की व्यवस्था की, जो कालाहांडी के रास्ते में पड़ता है.

तीनों पुरुष प्रवासी श्रमिकों के उस 12 सदस्यीय समूह का हिस्सा थे, जो दो महीने पहले नौकरी की तलाश में बिचौलियों की मदद से बेंगलुरु गया था. बेंगलुरु पहुंचने के बाद उन्हें काम मिला लेकिन उनके नियोक्ता ने कथित तौर पर उन्हें दो महीने तक काम करने के बावजूद वेतन नहीं दिया. तीनों ने कहा कि जब उन्होंने वेतन मांगा तो उन्हें पीटा गया.

भिखारी माझी ने ‘पीटीआई-’ को बताया, “हम अपने परिवार चलाने के लिए पैसा कमाने की उम्मीद से बेंगलुरु गए थे. लेकिन जब भी हमने वेतन मांगा तो कंपनी के कर्मचारियों ने हमें बकाया भुगतान करने के बजाय हमारी पिटाई की. अब और यातना सहन नहीं कर पा रहे थे, इसलिए हम वहां से चले आए.”

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