नई दिल्ली: वैश्विक वित्तीय शासन (Global Financial Governance) के क्षेत्र में भारत ने एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है. वरिष्ठ भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी विवेक अग्रवाल (Vivek Agarwal) को टेरर फंडिंग और मनी लॉन्ड्रिंग (Terror Funding and Money Laundering) पर नजर रखने वाली वैश्विक संस्था 'फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स' (FATF) का उपाध्यक्ष (Vice-President) चुना गया है. यह पहला मौका है जब कोई भारतीय अधिकारी इस अंतर-सरकारी निकाय के इतने शीर्ष और प्रभावशाली पद पर आसीन होगा. विवेक अग्रवाल का कार्यकाल जुलाई २०२६ से जून २०२७ तक रहेगा.
पेरिस में आयोजित एफएटीएफ की पूर्ण बैठक (Plenary Meeting) के समापन पर इस ऐतिहासिक नियुक्ति की घोषणा की गई. विदेश मंत्रालय ने इस कूटनीतिक सफलता को भारत के लिए एक "बड़ी जीत" बताया है, जो अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश के बढ़ते प्रभाव को दर्शाती है.
कौन हैं आईएएस विवेक अग्रवाल?
विवेक अग्रवाल १९९४ बैच के मध्य प्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी हैं और वर्तमान में केंद्र सरकार में संस्कृति सचिव (Union Culture Secretary) के पद पर कार्यरत हैं. वित्तीय खुफिया जानकारी और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के क्षेत्र में उनका लंबा अनुभव रहा है.
संस्कृति मंत्रालय में जिम्मेदारी संभालने से पहले, वह केंद्रीय वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग में अतिरिक्त सचिव थे. इस दौरान उन्होंने फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट-इंडिया (FIU-IND) के निदेशक के रूप में काम किया और एफएटीएफ में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व भी किया. पंजाब विश्वविद्यालय से कॉमर्स और लॉ की डिग्री लेने वाले अग्रवाल ने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस (LSE) से भी विशेष पढ़ाई की है.
इस नियुक्ति के क्या हैं मायने?
यह नियुक्ति वैश्विक स्तर पर वित्तीय अपराधों के खिलाफ नीतियां बनाने में भारत की आवाज और प्रभाव को मजबूत करेगी. उपाध्यक्ष के रूप में, विवेक अग्रवाल एफएटीएफ अध्यक्ष (यूके के जाइल्स थॉमसन) की सहायता करेंगे और डिजिटल भुगतान व वर्चुअल एसेट्स (क्रिप्टोकरेंसी) से जुड़े अवैध वित्तीय खतरों से निपटने के लिए सदस्य देशों के बीच आम सहमति बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे.
विशेषज्ञों का मानना है कि यह चुनाव मनी लॉन्ड्रिंग और टेरर फंडिंग के खिलाफ भारत के मजबूत कानूनी ढांचे की वैश्विक स्वीकार्यता है. इस शीर्ष पद पर रहने से भविष्य में भारत के लिए एफएटीएफ की पूर्ण अध्यक्षता का दावा करने की राह भी आसान हो सकती है.
क्या है FATF और भारत की स्थिति?
जी-7 (G7) देशों द्वारा १९८९ में स्थापित एफएटीएफ एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है, जिसका काम मनी लॉन्ड्रिंग, आतंकवादी वित्तपोषण और सामूहिक विनाश के हथियारों के प्रसार के खिलाफ वैश्विक मानक तय करना है. भारत साल २००६ में इस संस्था में पर्यवेक्षक (Observer) के रूप में शामिल हुआ था और २०१० में इसे पूर्ण सदस्यता मिली थी.
सितंबर २०२४ में अपनाई गई भारत की नवीनतम 'पारस्परिक मूल्यांकन रिपोर्ट' (Mutual Evaluation Report) में भारत के प्रयासों की काफी सराहना की गई थी, जिसके बाद भारत को उन चुनिंदा जी-२० देशों की श्रेणी (Regular Follow-up) में जगह मिली जो अंतरराष्ट्रीय मानकों का कड़ाई से पालन करते हैं.
प्रतिक्रियाएं और भविष्य की चुनौतियां
इस ऐतिहासिक चयन पर खुशी जताते हुए राजस्व सचिव अरविंद श्रीवास्तव ने इसे देश के लिए एक "गौरवपूर्ण मील का पत्थर" बताया. वहीं विवेक अग्रवाल ने कहा कि यह नियुक्ति अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली को सुरक्षित, समावेशी और लचीला बनाने के भारत के सामूहिक प्रयासों का सम्मान है.
एक तरफ जहां देश भर में इस फैसले का स्वागत हो रहा है, वहीं एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया जैसे कुछ नागरिक समाज संगठनों ने एफएटीएफ की उन सिफारिशों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है, जिसमें भारत को गैर-लाभकारी संगठनों (NGOs) के नियमन में अधिक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने और वित्तीय अपराधों से जुड़े मामलों के मुकदमों में होने वाली देरी को कम करने का सुझाव दिया गया था.













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