बिहार: कैसा है डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक का असर
बिहार में सरकारी अस्पतालों में काम करने वाले डॉक्टर अब प्राइवेट प्रैक्टिस नहीं कर सकेंगे.
बिहार में सरकारी अस्पतालों में काम करने वाले डॉक्टर अब प्राइवेट प्रैक्टिस नहीं कर सकेंगे. राज्य सरकार ने इस पर पूर्ण प्रतिबंध का आदेश जारी किया है.बिहार में सरकारी अस्पतालों में काम करने वाले डॉक्टर अब प्राइवेट प्रैक्टिस नहीं कर सकेंगे. राज्य सरकार ने इस पर पूर्ण प्रतिबंध का आदेश जारी किया है. सरकार इसे रोगी कल्याण की दिशा में एक अहम कदम मान रही है. उम्मीद है कि इससे सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों की मौजूदगी में इजाफा होगा तथा मरीजों को बेहतर चिकित्सा सुविधा मिल सकेगी.
इसी महीने मुख्यमंत्री का पद छोड़ने वाले नीतीश कुमार के नेतृत्व में राज्य में स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार के लिए कई कदम उठाए गए. लेकिन ये देखना जरूरी होगा कि जिस राज्य में पहले से ही रोगी-चिकित्सक का अनुपात कम है और अस्पतालों में कहीं इंफ्रास्ट्रक्चर तो कहीं मानव संसाधनों की कमी है, वहां प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक से आमजन को कितना फायदा हो सकेगा.
दरअसल, इस निर्णय के पीछे एक विशेषज्ञ समिति की मुख्य भूमिका रही, जिसका गठन बीते जनवरी माह में किया गया था. समिति के सदस्यों का मानना था कि अगर इसे प्रभावी तरीके से लागू किया गया तो स्वास्थ्य सेवाओं में उल्लेखनीय सुधार होंगे. राज्य सरकार ने बिहार स्वास्थ्य सेवा संवर्ग, बिहार चिकित्सा शिक्षा सेवा संवर्ग व अन्य से जुड़े डॉक्टरों पर इस फैसले को तत्काल प्रभाव से लागू करने तथा नियम तोड़ने वाले डॉक्टरों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने का निर्देश भी दिया है. इससे संबंधित गाइडलाइन यथाशीघ्र जारी करने की बात कही गई है. यह भी कहा गया है, जो चिकित्सक लिखित रूप से प्राइवेट प्रैक्टिस नहीं करने का शपथ पत्र देंगे, उन्हें नॉन प्रैक्टिस अलाउंस (एनपीए) देकर सरकार उनके आर्थिक नुकसान की भरपाई करेगी.
ऐसा नहीं है कि पहले ऐसी कोशिश नहीं की गई थी. 2000 में प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक लगाने की कोशिश की गई. लेकिन, डॉक्टरों के भारी विरोध के कारण यह प्रभावी रूप से लागू नहीं हो सका. एक साल बाद ही रोक हट गई. 2005 में एक बार सरकार ने बीच का रास्ता अपनाते हुए विशेषज्ञ चिकित्सकों को इसकी अनुमति दी गई, किंतु ड्यूटी आवर में इसे कदाचार माना गया. इसके अतिरिक्त बायोमीट्रिक अटेंडेंस की व्यवस्था जैसे अन्य उपायों के जरिए समय-समय पर अस्पतालों में डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के प्रयास भी किए गए. किंतु, व्यावहारिक तौर पर उल्लेखनीय सफलता नहीं मिल सकी. विभिन्न स्वास्थ्य संगठनों के आंकड़ों के अनुसार राज्यभर में चार हजार सरकारी चिकित्सक प्राइवेट प्रैक्टिस करते हैं.
सरकारी अस्पतालों पर भरोसा बढ़ाने की कोशिश
बिहार सरकार ने 2026-27 के बजट में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए 21 हजार करोड़ से भी ज्यादा का प्रावधान किया है, जिससे बुनियादी ढांचे का आधुनिकीकरण किया जाएगा. साथ ही, राज्य के 10 जिलों में नए मेडिकल कॉलेज व अस्पताल से चिकित्सा शिक्षा के विस्तार तथा कार्यरत अस्पतालों के पुनर्विकास और ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र को चिकित्सकीय तथा अन्य संसाधनों से सुदृढ़ करने का लक्ष्य रखा है. वहीं, ग्रामीण क्षेत्र में ब्लॉक स्तर के सभी सीएचसी (सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र) को विशेष अस्पताल के रूप में विकसित करने तथा 36 जिला अस्पतालों को सुपरस्पेशियलिटी अस्पताल में अपग्रेड करने की योजना है. इसके अतिरिक्त स्वदेशी चिकित्सा पद्धतियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक तथा तिब्बी कालेज की स्थापना की जा रही है.
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हालांकि, यह भी सच है कि राज्य सरकार की ओर से चिकित्सकीय सुविधाओं में बढ़ोतरी से सरकारी अस्पतालों में मरीजों की संख्या में वृद्धि हुई है. यहां मुफ्त दवाएं भी दी जा रही हैं तथा विभिन्न तरह की निःशुल्क जांच की सुविधा भी लोगों को मिल रही है. गांव-गांव में आशा-ममता कार्यकर्ता की सक्रियता से लोग जागरूक भी हुए. सरकारी अस्पतालों में एंबुलेंस सेवा शुरू हुई, जिससे दूर-दराज के इलाकों के लोगों को काफी फायदा हुआ. सरकारी अस्पतालों पर लोगों का भरोसा अपेक्षाकृत बढ़ा है. फिर, निजी अस्पतालों की महंगी स्वास्थ्य सेवा ले पाना भी आम आदमी के वश का नहीं रह गया है.
डॉक्टरों के ड्यूटी से गायब रहने की शिकायत आम
पीएचसी (प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र) या सीएचसी को सुविधा संपन्न किया गया. लेकिन, पीएचसी (प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र) से लेकर जिला मुख्यालय के सदर अस्पताल या फिर मेडिकल कालेज के अस्पतालों से डॉक्टरों के गायब रहने या फिर अपने जूनियर डॉक्टर के भरोसे अस्पताल को छोड़ देने की शिकायत आम है. चिकित्सकों के अनुपस्थित रहने से जरूरतमंद मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता है. फिर, इलाज में लापरवाही की शिकायत को लेकर मरीजों के परिजन और चिकित्सकों के बीच नोक-झोंक या फिर मारपीट की घटनाएं भी खूब बढ़ी हैं.
नाम नहीं प्रकाशित करने की शर्त पर एक मेडिकल कॉलेज अस्पताल के अधीक्षक कहते हैं, ‘‘चिकित्सा सेवा की शर्त ही है सेवा. हर संभव कोशिश की जाती है कि मरीज को यथाशीघ्र उपचार मिल जाए. किंतु यह कितनी जल्दी मिल सकेगा, यह वहां उपलब्ध मानव संसाधन व अन्य बुनियादी सुविधाओं की स्थिति पर निर्भर करता है.'' इमरजेंसी की स्थिति में स्वजन इलाज के दौरान तत्काल सुधार चाहते हैं, लेकिन यह मरीज की अवस्था पर निर्भर करता है. पीएमसीएच जैसे अस्पताल में तो एक-एक विशेषज्ञ चिकित्सक आउटडोर में सौ से अधिक मरीज आज भी देख रहे.
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सामाजिक कार्यकर्ता संतोष कुमार सिंह कहते हैं, ‘‘प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक के आदेश को व्यावहारिक तौर पर लागू करना काफी मुश्किल है. किसी व्यक्ति के स्किल विशेष पर नियंत्रण कर पाना आसान नहीं है.'' इस संदर्भ में यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि तय कार्यावधि में वे कैसे परफॉर्म करते हैं. इसी के आधार पर उन्हें रिवॉर्ड या दंड दिया जाए. जैसा कि निजी अस्पतालों में होता है, यानी टारगेट-बेस्ड काम. सरकार की मंशा तभी सफल होगी, जब चिकित्सकों की उपलब्धता के साथ-साथ मानक के अनुरूप सभी सुविधाएं अस्पताल में सुनिश्चित हों. अगर, ओटी नहीं होगी, दवाइयां नहीं रहेंगी, सर्पोटिव स्टॉफ पर्याप्त नहीं होंगे तो फिर डॉक्टर बेहतर सेवा मरीजों को कैसे दे सकेंगे.
एक लाख आबादी पर मात्र एक डॉक्टर
तमाम प्रयासों के बावजूद सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता मामले में बिहार राष्ट्रीय मानक से नीचे है. दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी राष्ट्रीय गुणवत्ता आश्वासन मानक (एनक्यूएएस) प्रमाणन के मामले में बिहार की उपलब्धि निराशाजनक है. साफ-सफाई, संक्रमण नियंत्रण, उपकरणों की उपलब्धता, सेवा की गुणवत्ता व मरीजों की सुविधा व अधिकार पर ये मानक तय किए जाते हैं. केवल 11.72 प्रतिशत अस्पताल ही इन मानकों को पूरा करते हैं. राज्य में 2025 तक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या 13,150 हो गई है, लेकिन प्रति एक लाख की आबादी पर केवल एक चिकित्सक व 21 बेड ही उपलब्ध हैं. बिहार आर्थिक सर्वे के आंकड़ों (2019-2025) के अनुसार प्रति दस लाख की आबादी पर स्वास्थ्य केंद्रों का अनुपात 114 से बढ़कर 126 हो गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक सकारात्मक संकेत अवश्य हो सकता है, किंतु संख्या बढ़ाने के साथ-साथ गुणवत्ता में सुधार के लिए इन स्वास्थ्य केंद्रों पर डॉक्टरों की उपलब्धता, पैरामेडिकल स्टाफ, दवाइयां तथा अन्य बुनियादी सुविधाओं व आधारभूत संरचनाओं पर काम करने की आवश्यकता है.
मेडिकल की पढ़ाई कर रही स्नेहा प्रकाश कहती हैं, ‘‘प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक के आदेश से डॉक्टरों के सरकारी सेवा में जाने में कमी भी आ सकती है. जो अपनी क्लिनिक या नर्सिंग होम में अच्छी कमाई कर रहे, वे पूरी तरह से प्राइवेट अस्पतालों में शिफ्ट हो सकते हैं.'' यह अनुचित भी नहीं है. हर किसी को अपनी आर्थिक समृद्धि के बारे में सोचने और उसके अनुसार प्रयास करने का अधिकार है. फिर, दबाव से सेवा की गुणवत्ता में सुधार की बात सोचना भी वाजिब नहीं है. वहीं, पत्रकार अमिताभ प्रकाश कहते हैं, ‘‘सरकारी अस्पतालों पर लोगों का भरोसा कहीं टूट न जाए, इसे ध्यान में रखकर प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक को लागू करने की दिशा में पहल तो कर दी गई है, किंतु इस पर कितना अमल होगा, यह निगरानी करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी.'' उनका मानना है कि इसके लिए भी एक कारगर तंत्र विकसित करना होगा.