इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बहुत सख़्त और ज़रूरी टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा है कि प्राइवेट अस्पताल मरीजों के साथ ऐसा बर्ताव करते हैं जैसे वो कोई इंसान नहीं, बल्कि पैसे निकालने वाली ATM मशीन हों.
यह तीखी टिप्पणी अदालत ने एक डॉक्टर के खिलाफ चल रहे आपराधिक मामले को रद्द करने से इनकार करते हुए की.
पूरा मामला क्या है?
मामला डॉक्टर अशोक कुमार राय से जुड़ा है, जो एक नर्सिंग होम के मालिक हैं. उनके अस्पताल में एक गर्भवती महिला को सर्जरी के लिए भर्ती किया गया. आरोप है कि जब महिला को भर्ती किया गया, तब अस्पताल में बेहोशी के डॉक्टर (Anesthetist) मौजूद ही नहीं थे.
परिवार वालों से ऑपरेशन के लिए दोपहर 12 बजे के करीब सहमति ले ली गई थी. लेकिन बेहोशी के डॉक्टर के न होने की वजह से ऑपरेशन शाम 5:30 बजे किया गया. इस देरी की वजह से गर्भ में पल रहे बच्चे की मौत हो गई.
कोर्ट ने क्या-क्या कहा?
जस्टिस प्रशांत कुमार की बेंच ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए प्राइवेट अस्पतालों के तौर-तरीकों पर गंभीर सवाल उठाए.
- अस्पताल फंसाते हैं, डॉक्टर बाद में बुलाते हैं: कोर्ट ने कहा, "आजकल यह एक आम चलन बन गया है कि प्राइवेट नर्सिंग होम और अस्पताल मरीजों को इलाज के लिए लुभाते हैं, भले ही उनके पास ज़रूरी डॉक्टर या सुविधाएं न हों. मरीज को भर्ती करने के बाद वे इलाज के लिए डॉक्टर को बुलाना शुरू करते हैं."
- मरीज मतलब ATM मशीन: कोर्ट ने साफ़ शब्दों में कहा, "यह आम जानकारी है कि प्राइवेट अस्पतालों ने मरीजों को सिर्फ पैसा ऐंठने के लिए ATM मशीन या गिनी पिग (प्रयोग की वस्तु) समझना शुरू कर दिया है."
- लापरवाह डॉक्टरों को कोई सुरक्षा नहीं: अदालत ने यह भी माना कि जो डॉक्टर पूरी सावधानी और लगन से अपना काम करते हैं, उन्हें सुरक्षा मिलनी चाहिए. लेकिन ऐसे डॉक्टरों को बिल्कुल भी नहीं बचाया जा सकता जिन्होंने सिर्फ पैसे कमाने के लिए बिना पूरी सुविधा और इंफ्रास्ट्रक्चर के अस्पताल खोल लिए हैं.
डॉक्टर की दलील खारिज
डॉक्टर ने दलील दी थी कि मरीज के परिवार वालों ने सही समय पर ऑपरेशन के लिए सहमति नहीं दी. लेकिन कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा कि परिवार ने तो दोपहर 12 बजे ही सहमति दे दी थी, लेकिन अस्पताल में बेहोशी का डॉक्टर न होने की वजह से ऑपरेशन में देरी हुई, जिसके कारण बच्चे की जान चली गई.
कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड की उस राय को भी मानने से इनकार कर दिया जिसमें डॉक्टर को क्लीन चिट दी गई थी. कोर्ट का कहना था कि बोर्ड के सामने सारे दस्तावेज़ पेश ही नहीं किए गए थे.
16 साल से अटका है एक और मामला
कोर्ट ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि पीड़ित परिवार ने उपभोक्ता अदालत (Consumer Court) में भी एक शिकायत दर्ज की थी, जो पिछले 16 सालों से अटकी हुई है और उस पर कोई फैसला नहीं हुआ है.
अंत में, हाईकोर्ट ने कहा कि पहली नज़र में डॉक्टर के खिलाफ मामला बनता है और उनके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने का कोई कारण नहीं है. यह फैसला प्राइवेट अस्पतालों की जवाबदेही तय करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है.













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